पश्चिम एशिया संकट : भारतीय नाविकों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य पर बढ़ रहा है, जो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है. यह संकट भारत पर भी भारी आर्थिक दबाव डाल सकता है.

-समीर भट्टाचार्य-

प्रधानमंत्री ने हाल ही में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की चौथी विशेष बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से उत्पन्न हो रही स्थिति की समीक्षा की गयी और विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा उठाये गये उपायों का आकलन किया गया. बैठक में बताया गया कि एलपीजी की खरीद के स्रोतों में विविधता लायी गयी है और प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का कुल भंडार और आपूर्ति पर्याप्त बनी हुई है.

ईरान संकट अब फारस की खाड़ी तक सीमित नहीं रह गया है. जो टकराव कभी ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के इर्द-गिर्द केंद्रित था, वह अब पूरे पश्चिम एशिया के सामरिक भूगोल को बदल रहा है. इस संकट का केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य से पश्चिम की ओर लाल सागर और बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य की तरफ खिसक रहा है. इससे यह आशंका बढ़ गयी है कि विश्व के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण समुद्री संकरे मार्ग पर भी अगला बड़ा संघर्ष भड़क सकता है. यदि बाब अल मंदेब में लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है, तो वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री स्थिरता प्रभावित होगी.

साथ ही, समुद्री व्यापार पर अत्यधिक निर्भर देशों, खासकर भारत पर भारी आर्थिक दबाव पड़ेगा. दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले लगभग पांचवें हिस्से का कच्चा तेल होर्मुज से होकर गुजरता है. पर जैसे-जैसे ईरान से जुड़ा तनाव बढ़ा और होर्मुज की संवेदनशीलता स्पष्ट होती गयी, वैसे-वैसे क्षेत्रीय देशों ने वैकल्पिक निर्यात मार्ग तलाशने शुरू किये. सऊदी अरब ने अपने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल लाल सागर स्थित यनबू बंदरगाह तक पहुंचाना शुरू कर दिया, जिससे होर्मुज को दरकिनार करते हुए निर्यात संभव हो सका.

इस रणनीतिक परिवर्तन ने बाब अल मंदेब का महत्व और बढ़ा दिया है. यमन, जिबूती और इरिट्रिया के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग अदन की खाड़ी को लाल सागर से जोड़ता है. यही मार्ग स्वेज नहर तक पहुंच प्रदान करता है. यदि होर्मुज को फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार माना जाये, तो बाब अल मंदेब आज वैश्विक व्यापार का प्रवेश द्वार बन चुका है. इस बदलाव के कारण यमन का हूती आंदोलन अधिक सामरिक महत्व प्राप्त कर चुका है. हाल में सऊदी अरब के विरुद्ध समुद्री नाकाबंदी की उनकी घोषणा तथा बाब अल मंदेब से गुजरने वाले जहाजों का आवागमन नियंत्रित करने व पारगमन शुल्क लगाने की मंशा दर्शाते हैं कि समुद्री दबाव अब भू राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है. दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक को बाधित करने की आशंका ही बीमा प्रीमियम, माल भाड़े और समुद्री परिवहन लागत बढ़ाने के लिए काफी है. यदि बाब अल मंदेब लंबे समय तक असुरक्षित बना रहता है, तो वैश्विक व्यापार पर इसके गंभीर परिणाम होंगे, क्योंकि विश्व के करीब 12 फीसदी व्यापार का आवागमन स्वेज नहर से होता है.

व्यवधान की स्थिति में एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना पड़ेगा, जिससे 7,000 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी होगी और यात्रा अवधि दो सप्ताह तक बढ़ सकती है. पहले से ही भू राजनीतिक विभाजन के दबाव से जूझ रही वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को एक और बड़ा झटका लगेगा. भारत के लिए यह परिस्थिति जटिल चुनौती प्रस्तुत करती है. भारत का लगभग पूरा विदेशी व्यापार मात्रा के आधार पर समुद्री मार्गों से संचालित होता है. वहीं स्वेज नहर भारत को यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट से जोड़ने वाला प्रमुख समुद्री प्रवेश द्वार है. भारत के कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक-चौथाई से एक-तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है.

भारत अपने कच्चे तेल की लगभग 85 फीसदी जरूरत आयात के माध्यम से पूरी करता है. यद्यपि, खाड़ी क्षेत्र से आने वाले अधिकांश ऊर्जा आयात होर्मुज के पूर्वी भाग से आते हैं, फिर भी पश्चिमी सऊदी अरब से कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों, द्रवीकृत प्राकृतिक गैस तथा अन्य वाणिज्यिक माल के निर्यात के लिए बाब अल मंदेब अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है. यदि इस जलमार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहता है, तो परिवहन लागत बढ़ेगी, आपूर्ति में देरी होगी तथा ईंधन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने के कारण घरेलू महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा. यह संकट भारत की समुद्री रणनीति के महत्व को भी और अधिक रेखांकित करता है. जब सागर और महासागर जैसी पहलों को भारत आगे बढ़ा रहा है तथा पश्चिमी हिंद महासागर में अपनी नौसैनिक उपस्थिति का विस्तार कर रहा है, तब बाब अल मंदेब की सुरक्षा पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है.

भारत पहले ही अदन की खाड़ी में निरंतर नौसैनिक तैनाती और समुद्री डकैती विरोधी अभियानों के माध्यम से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा करने की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है. पर मिसाइल हमलों, ड्रोन, समुद्री डकैती और प्रॉक्सी युद्ध में केवल नौसैनिक उपस्थिति पर्याप्त नहीं होगी. इसके लिए खुफिया जानकारी साझा करने, समुद्री गतिविधियों की बेहतर निगरानी, क्षेत्रीय साझेदारों के साथ गहरा समन्वय तथा लाल सागर और अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र के तटीय देशों के साथ अधिक सुदृढ़ सहयोग की जरूरत होगी. भारत के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है. चुनौती अब केवल खाड़ी क्षेत्र से तेल आपूर्ति की सुरक्षा तक सीमित नहीं रही. अब जरूरत उस संपूर्ण समुद्री नेटवर्क की सुरक्षा सुनिश्चित करने की है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र को यूरोप और अफ्रीका से जोड़ता है. संघर्ष के क्षेत्रों में घरेलू और विदेशी ध्वज वाले जहाजों पर काम करने वाले भारतीय नाविकों पर होते हमले भी चिंता की बात है. दुनियाभर की हर शिपिंग कंपनी में भारतीय नाविकों की बहुतायत है.

इसकी एक वजह यह है कि अपने यहां अच्छे समुद्री ट्रेनिंग स्कूल हैं. अंग्रेजी बोलने के मामले में भारतीय नाविक दूसरे देशों के नाविकों की तुलना में बेहतर हैं और ये पश्चिमी देशों के नाविकों की तुलना में कम वेतन में काम भी करते हैं. पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से अब तक 10 नाविकों समेत 16 भारतीयों के मारे जाने के आंकड़े हैं. जबकि कुछ लापता हैं. सीसीएस की बैठक में प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को नाविकों और उनके परिवारों को समय पर सूचना, आपातकालीन सहायता और परामर्श प्रदान करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया. जाहिर है, ऊर्जा सुरक्षा के साथ नाविकों की रक्षा भी भारत की प्राथमिकता में है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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