इकांशा खंडूजा-प्रथा मिश्रा
भारत दुनिया के दो सबसे बड़े घरेलू जल सुरक्षा कार्यक्रम संचालित कर रहा है. पहला जल जीवन मिशन (जेजेएम) है, जिसने 2019 से अब तक लगभग 12.7 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल जल कनेक्शन से जोड़ा है. दूसरा 'अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन' (अमृत) है, जिसने 2015 से अब तक भारतीय शहरों में दो करोड़ से अधिक घरेलू नल जल कनेक्शन और 1.5 करोड़ सीवर कनेक्शन उपलब्ध कराये हैं. लेकिन जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सिर्फ बुनियादी ढांचा ही जल सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पायेगा.
भारत को जल आपूर्ति योजनाओं के संचालन और रखरखाव में विश्वसनीय सेवा वितरण, जलस्रोतों की सततशीलता और सामुदायिक स्वामित्व सुनिश्चित करना होगा. सीइइडब्ल्यू-यानी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वॉटर का आकलन है कि देश के 15 में से 11 नदी बेसिन पानी की कमी का सामना कर रहे हैं. अस्सी करोड़ से अधिक लोग पानी की कमी का सामना कर रहे हैं और 2031 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में काफी गिरावट आने का अनुमान है. लगभग प्रत्येक चार भूजल भंडारों में से एक से सुरक्षित सीमा से अधिक जल दोहन हो रहा है और सतह पर मौजूद 70 फीसदी पानी दूषित है.
ऐसे में, राज्यों के भीतर विश्वसनीय जलापूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अंतर-राज्यीय सहयोग महत्वपूर्ण हो गया है. हाल ही में हरियाणा और राजस्थान ने 1994 के जल-विभाजन समझौते के तहत ऊपरी यमुना के जल में राजस्थान की हिस्सेदारी लागू करने के लिए एक कार्यान्वयन समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं. राजस्थान को हथिनी कुंड बैराज से प्रस्तावित 295 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन के जरिये मॉनसून के दौरान बहने वाला लगभग 58 करोड़ घन मीटर पानी मिलेगा. वहीं, नर्मदा जल के मामले में गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान ने नदी जल उपयोग पर एकमुश्त समझौता किया है.
जलवायु परिवर्तन के कारण जब पानी के बहाव का समय, मात्रा और विश्वसनीयता का अनुमान लगाना कठिन होता जा रहा है, तब ऐसे समझौते महत्वपूर्ण हो जाते हैं. हालांकि, जलवायु परिवर्तन इन समझौतों को मुश्किल बनायेंगे. ऐसे में, न केवल इन समझौतों का, बल्कि देश की व्यापक घरेलू जल सुरक्षा का भी परीक्षण होगा. सीइइडब्ल्यू का आकलन है कि देश के लगभग चार में से तीन जिले चरम मौसमी घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं, जबकि 40 फीसदी से अधिक जिले पेयजल, स्वच्छता और स्वच्छता सेवाओं के लिए उच्च से बहुत उच्च जलवायु जोखिम का सामना कर रहे हैं. अल नीनो से प्रभावित मॉनसून के कारण करीब 60 फीसदी जिलों में बारिश की कमी या भारी कमी दर्ज की गयी है.
इस साल प्रमुख जलाशयों में क्षमता का 34 फीसदी पानी बचा है, जो पिछले वर्ष इसी समय करीब 57 फीसदी था. इस कारण मराठवाड़ा में सौ से अधिक गांव पानी के टैंकरों पर निर्भर हो गये हैं. यह स्थिति 2023-24 के अल नीनो की याद दिलाती है, जिससे भारत को अब तक के सबसे गर्म वर्ष का सामना करना पड़ा था और कम बारिश से कर्नाटक के प्रमुख जलाशयों में पानी घटकर क्षमता का 16 फीसदी रह गया था और बेंगलुरु के करीब आधे बोरवेल सूख गये थे. इससे शहर की लगभग एक-तिहाई आबादी की पेयजल उपलब्धता प्रभावित हुई थी. इसलिए, भारत को अब बुनियादी ढांचा तैयार करने से आगे बढ़कर जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन (क्लाइमेट-रिस्पॉन्सिव वाटर गवर्नेंस) की दिशा में आगे बढ़ना होगा. इसके लिए ये बदलाव बहुत जरूरी हैं.
पहला, जल क्षेत्र से जुड़े योजना निर्माण में जलवायु जोखिम की जानकारियां शामिल करनी होगी, और इसे स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनाना होगा. अति-स्थानीय और अंतर-विषयक जलवायु जोखिम आकलन 'जोखिम की अधिकता वाले क्षेत्रों' और उनके पीछे के कारकों को पहचानन में मदद कर सकता है. नीतिगत विकल्पों के तहत जल संतुलन को समझने से प्रभावी समाधानों का पता लगाने में मदद मिल सकती है. सीइइडब्ल्यू के शोध में पाया गया है कि चेन्नई नदी बेसिन के छह में से तीन उप-बेसिनों के जल निकायों के सामने बहुत उच्च से उच्च जलवायु जोखिम मौजूद है. पर फसली क्षेत्र के 13 फीसदी हिस्से तक सूक्ष्म-सिंचाई (माइक्रो-इरिगेशन) को बढ़ाकर और उपचारित प्रयुक्त जल के 40 फीसदी हिस्से को दोबारा इस्तेमाल कर 2050 तक पानी की अपूरित मांग को लगभग 63 फीसदी तक घटाया जा सकता है. इस साल शुरू हुए जल जीवन मिशन 2.0 ने पहले से ही साक्ष्य-आधारित नियोजन और शोध-संचालित नवाचार के जरिये क्लाइमेट रेजिलिएंस को अनिवार्य बनाया है.
दूसरा, पानी की मांग का प्रबंधन करने, ताजे पानी के विकल्प के रूप में उपचारित प्रयुक्त जल के दोबारा इस्स्तेमाल को स्वीकार बनाने और सामुदायिक स्वामित्व लाने के लिए व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रमों में निवेश करना होगा. स्वच्छ भारत मिशन और अटल भूजल योजना के अनुभव इस दिशा में उपयोगी हैं. गुजरात के पायलट प्रोजेक्ट भी सीख देते हैं कि कैसे स्वयं सहायता समूहों और प्राथमिक कृषि ऋण समितियों जैसी उच्च सामाजिक प्रभाव वाले संस्थानों को संचालन व रखरखाव शुल्क के भुगतान के लिए ग्राम जल व स्वच्छता समितियों से जोड़ा जा सकता है. तीसरा, कृषि जल प्रबंधन को पेयजल सुरक्षा के केंद्र में लाना होगा. देश के कुल जल उपयोग में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 90 फीसदी है. सूक्ष्म-सिंचाई (माइक्रो-इरिगेशन) का विस्तार, मिट्टी की नमी का प्रबंधन, फसल विविधीकरण और सिंचाई के लिए उपचारित प्रयुक्त जल के इस्तेमाल से ताजे पानी के संसाधनों पर दबाव कम हो सकता है.
सीइइडब्ल्यू का आकलन है कि देश में करीब 13.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए उपचारित प्रयुक्त जल को दोबारा इस्तेमाल करने की क्षमता मौजूद है. लगभग 16 राज्यों ने यह नीति अपनायी है; जिनमें से लगभग 50 फीसदी नेशनल फ्रेमवर्क, 2023 पर आधारित हैं. अगला कदम, इस नीति को शहरों के अनुसार ठोस कार्य योजनाओं में बदलकर उपचारित प्रयुक्त जल का दोबारा इस्तेमाल को जमीन पर उतारना है. जलवायु अनिश्चितता की वृद्धि के इस दौर में भारत की जल-सुरक्षा की सफलता केवल नल कनेक्शनों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जायेगी कि क्या परिवारों को साल भर सुरक्षित पेयजल सेवाएं मिल रही हैं. यह वादा पूरा करने के लिए अति-स्थानीय स्तर पर जोखिम आकलन, सामुदायिक भागीदारी और कृषि में जल के समझदारीपूर्ण उपयोग पर आधारित जलवायु-अनुकूल शासन बेहद अहम भूमिका निभायेगा.
(ये लेखिकाद्वय के निजी विचार हैं, जो काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीइइडब्ल्यू) से जुड़ी हैं.)
