प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से संबोधन में नशे के खिलाफ जंग का आह्वान किया है. उन्होंने बच्चों को रीलबाजी से दूर रहकर किताबें पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया है. केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के अनुसार, जंक फूड, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग की तिकड़ी से बर्बाद होते युवा नौकरियों के लिए अनफिट हो रहे हैं. लॉकडाउन के दौरान देश में करोड़ों बच्चे ऑनलाइन गेमिंग के नाम पर जुआ और सट्टेबाजी की लत का शिकार हो गये.
बीते वर्ष अगस्त में संसद में पारित कानून में लिखा था कि ऑनलाइन मनी गेमिंग से परिवार और समाज के साथ अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है. आइटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, ऑनलाइन मनी गेमिंग कंपनियों की आड़ में मनी लॉन्ड्रिंग, साइबर अपराध और टैक्स चोरी जैसे गंभीर वित्तीय अपराध बढ़ रहे हैं. संसद से बने नये कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद ऑनलाइन गेमिंग का मकड़जाल भारत में कम नहीं हो रहा. बच्चों और युवाओं को गेमिंग के नशे से बचाने के लिए इन छह कानूनी पहलुओं को समझना बेहद आवश्यक है. पहला-संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, सट्टेबाजी, लॉटरी, जुआ पर कानून बनाने और टैक्स वसूली के लिए राज्यों को अधिकार हैं. ताश के पत्तों से कुछेक हजार रुपये का जुआ खेलने वालों को पुलिस जेल में डाल देती है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, गैंबलिंग एक्ट के अनुसार, देश में 2021 में 1.64 लाख, 2022 में 1.69 लाख और 2023 में 1.66 लाख लोगों के खिलाफ मुकदमे दायर हुए. पर ऑनलाइन सट्टेबाजी के संगठित अपराधों को रोकने के लिए केंद्र सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा रही. नये कानून में गैर-कानूनी एप्स को ब्लॉक करने और अवैध पेमेंट गेटवे को रोकने के लिए राज्यों की पुलिस को अधिकार नहीं हैं. गेमिंग विधेयक को लोकसभा में मात्र सात मिनट में और राज्यसभा में 26 मिनट में चर्चा के बगैर ही पारित कर दिया गया था. पीआइबी द्वारा जारी बैकग्राउंडर नोट में गैंबलिंग, लॉटरी और सट्टेबाजी को रोकने की बात कही गयी है. पर कानून में स्पष्ट तौर पर इस बारे में कोई प्रावधान न होने से लोगों में भ्रम बढ़ रहा है.
दूसरा-सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री एल मुरगन ने विगत मार्च में लोकसभा में जवाब दिया था. उनके अनुसार, सभी तरह के ऑनलाइन मनी गेम के विज्ञापन, प्रमोशन और संचालन पर पूर्ण प्रतिबंध है. इसका उल्लंघन करने वालों के अभियोजन के साथ नये कानून के अनुसार भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है. गेमिंग एप्स को ब्लॉक करने के लिए केंद्र सरकार आइटी कानून की धारा-69-ए के तहत कार्रवाई कर सकती है. थिंक टैंक सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज (सीएएससी) ने सुप्रीम कोर्ट में 2,000 से ज्यादा एप्स का विवरण देकर उन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने पिछले साल 17 अक्तूबर और फिर तीन नवंबर को केंद्र सरकार से कार्रवाई के लिए लिखित आदेश जारी किया. पिछले एक साल से केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले में कोई जवाब या स्टेटस रिपोर्ट दायर नहीं की.
तीसरा-संसदीय समिति की रिपोर्ट और एनआइए जांच के अनुसार, गेमिंग की चैट से युवाओं को कट्टरपंथ और आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है. चीनी गेमिंग एप फीविन की इडी जांच में म्यूल खातों और क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट के जरिये खरबों के लेन-देन का खुलासा हुआ था. चीनी एप्स को सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए 2020 में सरकार ने सैकड़ों चाइनीज एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया था. गेमिंग के नये कानून के बाद ड्रीम-11 कंपनी 26 करोड़ यूजर्स के डाटा के दम पर वित्तीय और एआइ सेक्टर में कारोबार बढ़ा रही है. गेमिंग के डाटा के कारोबार से बच्चों की सुरक्षा में सेंध लगने के साथ साइबर अपराध बढ़ रहे हैं. संसद ने 2023 में डाटा सुरक्षा कानून बनाया था, जिसे लागू न करने से डाटा के अवैध कारोबार के साथ टैक्स चोरी बढ़ रही है. चौथा-विधि आयोग की 2018 में पेश रिपोर्ट के अनुसार, महाभारत काल में जुए के खिलाफ कानून होता, तो द्रौपदी दांव पर नहीं लगती.
वर्ष 2021 में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा में कहा था कि ऑनलाइन गैंबलिंग और सट्टेबाजी रोकने के लिए राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है. उसके बाद तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे कई राज्यों ने कानून बनाकर गेमिंग कंपनियों की नकेल कसने की कोशिश की. पर राज्यों के दखल को रोकने के लिए केंद्र ने 2023 में गेमिंग कंपनियों को इंटरमीडियरी का सुरक्षा कवच और स्व-नियमन का विशेषाधिकार दे दिया. अधिकांश राज्यों में जुआ और सट्टेबाजी रोकने के लिए पहले से ही कानून बने हुए हैं. लेकिन केंद्र सरकार के नये कानून से भ्रम बढ़ रहा है, जिसका फायदा गेमिंग कंपनियां उठा रही हैं. पांचवां-हेरफेर करने वाले फीचर्स, लत वाले एल्गोरिदम और बॉट्स के माध्यम से गेमिंग कंपनियां सालाना कई लाख करोड़ की ठगी का कारोबार कर रही हैं.
कई गेमिंग एप कंपनियों ने लगभग 2.5 लाख करोड़ की जीएसटी और 58 हजार करोड़ की आयकर चोरी की थी. जीएसटी वसूली की प्रक्रिया के खिलाफ कई कंपनियां अदालत गयीं. सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने 27 मई के आदेश से अपीलों को निरस्त करते हुए टैक्स वसूली का मार्ग प्रशस्त कर दिया. विदेशों से संचालित हो रहे एप्स को रोकने और उनसे टैक्स वसूली के लिए इंटरपोल की मदद से सरकार ने प्रभावी कारवाई नहीं की है. नये कानून की आड़ में सट्टेबाजी और गैंबलिंग के एप्स को शिक्षा और खेल के नाम पर मान्यता और वित्तीय प्रोत्साहन देने से यह नासूर और बढ़ेगा. छठा-जुआ और सट्टेबाजी के नाम पर गांवों में गरीबों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करके जेल में बंद कर दिया जाता है.
लेकिन ऑनलाइन गेमिंग की आड़ में गैंबलिंग और सट्टेबाजी के संगठित अपराधियों के खिलाफ सरकार ठोस कार्रवाई नहीं कर रही. अठारह साल से कम उम्र के बच्चे गेमिंग कंपनियों के साथ अनुबंध नहीं कर सकते. तो फिर इ-स्पोर्ट्स और सोशल गेमिंग की आड़ में नाबालिग बच्चों को गेमिंग के नशे के शिकंजे में फंसाने के लिए नये कानून में इजाजत क्यों दी जा रही है? गेमिंग की लत की वजह से बच्चों और युवाओं में अवसाद, आत्महत्या और नाबालिग अपराध के मामले बढ़ रहे हैं. समाज में ऑनलाइन गेमिंग से बढ़ रहे डिजिटल नशे के खिलाफ नये कानून के अनुसार केंद्र सरकार को जल्द और ठोस कार्रवाई करने की जरूरत है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
