गंभीर संकट में सतर्कता जरूरी

देश के कुछ हिस्सों में सामुदायिक संक्रमण की चर्चा शुरू हो गयी है. इसे समझने के लिए दो बातें जरूरी है. पहला, क्या संक्रमित पाया गया व्यक्ति किसी ऐसे देश से आया है, जहां संक्रमण फैला है और दूसरा, क्या वह किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया है.

डॉ ललित कांत

पूर्व प्रमुख, संक्रामक रोग विभाग, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर)

delhi@prabhatkhabar.in

देश के कुछ हिस्सों में सामुदायिक संक्रमण की चर्चा शुरू हो गयी है. इसे समझने के लिए दो बातें जरूरी है. पहला, क्या संक्रमित पाया गया व्यक्ति किसी ऐसे देश से आया है, जहां संक्रमण फैला है और दूसरा, क्या वह किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया है. इसके लिए उसकी हिस्ट्री देखी जाती है. अभी तक के आकलन से स्पष्ट है कि पॉजिटिव पाये जा रहे लोग किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आ चुके हैं. जब संक्रमण के स्रोत का पता नहीं चल पाता है, तो मान लिया जाता है कि समुदाय में संक्रमण हो रहा है.

जो लोग जांच में शामिल हैं, वही लोग सरकार से सवाल पूछते हैं. सारी जानकारी तो उन्हीं के पास होती है, वही इसे स्पष्ट कर सकते हैं. अगर खुद सरकार ही यह कह रही है, तो इसका मतलब है कि ये लोग संक्रमण का पता नहीं कर पा रहे हैं कि संक्रमण कहां से हुआ है. अब सरकार की तरफ से सामुदायिक संक्रमण की बात इसलिए कही जा रही हैं, क्योंकि ऐसा होने पर जांच और इलाज की प्रक्रिया में फर्क आ जाता है. जब तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात नहीं होती, तब तक हम संपर्क का पता लगाते हैं और संभावित लोगों को क्वारंटीन कर देते हैं.

अगर कम्युनिटी ट्रांसमिशन शुरू हो जाता है, तो यह प्रक्रिया बंद हो जाती है. सारा ध्यान मरीज के देखभाल पर आ जाता है. इसके बाद सारा इंतजाम, जैसे अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन आदि की व्यवस्था, पर फोकस किया जाता है. संक्रमण का सामुदायिक स्तर पर फैलाव तो होना ही है. अमेरिका, ब्रिटेन, इंडोनेशिया जैसे तमाम देशों ने स्पष्ट किया है कि वहां सामुदायिक स्तर पर संक्रमण हुआ. भारत में कोई अलग से ट्रांसमिशन की बात नहीं हो रही है.

जिस देश में कोरोना संक्रमण पहुंचा है, वहां कम्युनिटी ट्रांसमिशन हुआ है. ऐसी स्थिति में पाबंदी खत्म हो जाती है. क्योंकि, आपके पास इतने मामले हो जाते हैं कि अगर कुछ लोग इधर-उधर हो गये, तो उससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है. लॉकडाउन का मकसद ही यही था कि जब हम इससे बाहर आयेंगे, तो अधिक मामलों को कैसे संभालेंगे. यह स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के लिए तैयारी की अवधि थी. चीन ने तो 10 दिन में एक नया अस्पताल खड़ा कर दिया था.

दिल्ली के मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि मामले बढ़ने पर 50,000 बेड का इंतजाम है. पिछले दो महीने में विशेषकर दिल्ली और महाराष्ट्र ने जो भी संभव था, उन्होंने करने का प्रयास किया. महाराष्ट्र में स्टेडियम लिये गये हैं. उसके अंदर अस्पताल जैसी व्यवस्था की गयी है. केवल बेड लगाना ही पर्याप्त नहीं होता है, उसके लिए और भी इंतजाम करने होते हैं. ऑक्सीजन और खाने-पीने आदि की भी व्यवस्था करनी होती है. सरकारें अपने स्तर पर काम कर रही हैं. कितना भी अमीर देश हो, उसका स्वास्थ्य तंत्र इस समस्या से निपटने में कामयाब नहीं हो पाया, क्योंकि ऐसी दशा में मरीजों की तादाद बहुत अधिक हो जाती है.

हमारे यहां संकट गंभीर है. लोगों के पास खाने-पीने और पैसे आदि की दिक्कत आ गयी है, इसलिए आर्थिक कामकाज में थोड़ी सहूलियत दी जा रही है. लोग कब तक इस संकट को झेलते रहेंगे. कब तक शिविर लगाकर भारत सरकार या किसी अन्य राज्य की सरकार लोगों को खिला सकती है. अन्य विकल्पों पर भी तो विचार करना ही होगा.

सरकार ने पिछले तीन महीने से लोगों को इस बीमारी से जुड़ी हर जानकारी दी और जागरूक किया. आप बाहर कम निकलिए, मास्क पहनिए और 20 सेकेंड तक साबुन से हाथ धोइए. अब लोगों को समझना चाहिए कि मॉल में जाने से संक्रमण हो सकता है, तो उन्हें खुद अपना बचाव करना चाहिए. सरकार हमेशा के लिए तो ताला नहीं लगा सकती है.

जहां तक निजी अस्पतालों में जाने का सवाल है, तो हमें यह मानकर ही चलना चाहिए कि वहां एक बिजनेस है. सरकारी अस्पतालों के मामले में कहा जा सकता है कि उन्हें अपनी क्षमता और सुविधा का विस्तार करना चाहिए और वे कर भी रहे हैं. संक्रमण रोकने के लिए चार बातें महत्वपूर्ण हैं, टेस्ट करना, पता चलने पर उनका इलाज करना, उनके संपर्क का पता लगाना और खोजकर संपर्क में आये लोगों को क्वारंटीन में रखना. मास्क लगाना, साबुन से हाथ धोना और सामाजिक दूरी बनाकर रखना अनिवार्य है. हमारे देश में गरीबी बहुत है, संकटग्रस्त लोगों की आबादी अधिक है.

पीने के लिए पानी तक नहीं मिलता, वहां साबुन से हाथ धोना कैसे हो पायेगा. घनी बस्तियों में आप सोशल डिस्टेंसिंग की बात नहीं कर सकते हैं. जहां लोग खाने के लिए मोहताज हैं, उन्हें आप बाहर निकलने से कब तक रोक पायेंगे. दवाई और वैक्सीन अभी नहीं है. दुनियाभर में बचाव ही एकमात्र उपाय है. हमारे देश में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. अमीर से अमीर देशों की व्यवस्था चरमरा गयी, तो हमारे यहां तो पहले से ही अनेक समस्याएं हैं और संसाधनों का अभाव है. कहीं भी इलाज आसानी से नहीं हो पाया. यह बहुत बड़ी विपदा है, हमें खुद ही बचाव करना है. हम सावधान होंगे, तो मामलों को कम करने में अपनी जिम्मेदारी निभायेंगे.

(बातचीत पर आधारित)

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Author: डॉ ललित

Published by: Prabhat Khabar

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >