सराहनीय है एकीकृत पेंशन योजना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन की एक नयी योजना को मंजूरी देकर बेहद अहम पहल की है. इस योजना को एकीकृत पेंशन योजना (यूनिफाइड पेंशन स्कीम- यूपीएस) का नाम दिया गया है तथा यह आगामी वित्त वर्ष के प्रारंभ में यानी एक अप्रैल, 2025 से लागू हो जायेगी.

Unified Pension Scheme: इस योजना से केंद्र सरकार के 23 लाख कर्मचारियों व उनके परिवारों को प्रत्यक्ष रूप आर्थिक फायदा मिलेगा. ज्ञात रहे कि देश में बीते कई वर्षों से सरकारी कर्मचारियों के लिए वाजपेयी सरकार द्वारा 2004 में शुरू की गयी नयी पेंशन स्कीम के प्रति असंतोष व्याप्त था. मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान विपक्षी दलों ने इसे एक राजनीतिक मुद्दा बनाया और कुछ राज्यों में पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस ) को फिर से लागू कर दिया गया. सबसे पहले यह घोषणा राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार ने की थी. इसका दबाव केंद्र सरकार पर लगातार बना रहा था. पिछले वित्त वर्ष 2023 के केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने टीवी सोमनाथन की अध्यक्षता में पेंशन की नयी योजना बनाने के संबंध में एक कमिटी बनाने की घोषणा की थी. इस कमेटी को अपना एक प्रारूप इस साल लोकसभा चुनाव से पहले पूर्व प्रस्तुत करना था, जो नहीं हो पाया. मोदी सरकार ने अपने तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने से पहले ही एक नयी और बेहतरीन योजना को मंजूर कर दिया.

इस नयी पेंशन योजना के आने के बाद से एक चर्चा जोरों पर है कि क्या सरकार पुरानी पेंशन योजना, जो अंग्रेजों के दौर से शुरू होकर 2004 तक तक लागू रही, की तरफ वापस मुड़ रही है. इस पक्ष पर यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है. ज्ञात रहे कि पुरानी पेंशन योजना के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को अपनी सेवा के कार्यकाल के दौरान पेंशन कोष में कुछ भी अंशदान नहीं देना होता था तथा सेवानिवृत्ति पर पेंशन और मृत्यु होने पर परिवार को मिलने वाली पेंशन 100 प्रतिशत सरकारी अंशदान के माध्यम से ही प्राप्त होती थी. स्वतंत्र भारत में इस योजना को 57 साल तक उपयोग में लाया गया. वर्ष 2004 में इसे समाप्त कर एक ऐसी पेंशन योजना को लागू किया गया, जिसमें सरकारी कर्मचारियों को अपनी सेवा के कार्यकाल के दौरान पेंशन हेतु अपने वेतन का एक हिस्सा नियमित रूप से अंशदान के रूप में देना था.

अब 2025 से लागू होने वाली यूनिफाइड पेंशन स्कीम ( यूपीएस) में भी सरकारी कर्मचारियों को 2004 की नयी पेंशन स्कीम की तरह ही अपने वेतन का 10 प्रतिशत अंशदान पेंशन कोष में जमा करवाना होगा, पर अब इसमें सरकार का अंशदान और बढ़ेगा. यह समझना जरूरी है कि सरकारी कर्मचारियों को पेंशन हेतु अपना अंशदान जमा करवाना होगा, उसमें कोई रियायत नहीं दी गयी है. बीस वर्षों के बाद भारत में सरकारी कर्मचारियों को पेंशन के संबंध में यूपीएस के रूप में एक नयी योजना उपलब्ध हुई है, जो 2004 की नयी पेंशन स्कीम से कई मामलों में बहुत बेहतर है. मसलन, अब सरकारी कर्मचारियों को एक निश्चित रकम की गारंटी पेंशन के रूप में उपलब्ध होने की रहेगी, जो कि एनपीएस में नहीं थी, जबकि कर्मचारी अपने वेतन का 10 प्रतिशत अंशदान के रूप में दे रहा था.

इस नयी योजना के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि 25 वर्ष तक काम करने के बाद ही अंतिम वर्ष के मूल वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा हर हालत में पेंशन की रकम के रूप में मिलेगा. वहीं अगर सेवा 25 वर्षों से कम की है, तो पेंशन की रकम सेवा के वर्षों के अनुपात में निश्चित होगी. इस योजना का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अगर सेवा न्यूनतम 10 वर्षों के लिए की गयी है, तो मासिक पेंशन की रकम 10,000 रुपये निश्चित रहेगी. यह बहुत सराहनीय है. एक अन्य सकारात्मक पक्ष यह भी है कि पेंशनधारी की मृत्यु होने पर मासिक पेंशन का 60 प्रतिशत हिस्सा पारिवारिक पेंशन के रूप में कर्मचारी के प्रतिनिधि को प्रति माह मिलेगा. इस योजना के अंतर्गत महंगाई भत्ते को भी पेंशन की रकम में सम्मिलित किया गया है, जो एनपीएस में नहीं था. हर तीन वर्ष के बाद पेंशन फंड में सरकारी अंशदान की सीमा की बढ़ोतरी के लिए मूल्यांकन किया जायेगा, जो वर्तमान में 18.5 प्रतिशत पर निश्चित किया गया है. कर्मचारी का अंशदान भविष्य में 10 प्रतिशत ही यथावत रहेगा, उसमें इससे अधिक की बढ़ोतरी नहीं होगी.

ऐसे प्रावधानों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि मोदी सरकार की यह पेंशन योजना 2004 की पेंशन योजना का एक बेहतर विकल्प है. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि 2004 की योजना से इस योजना में आने वाले कर्मचारियों को एरियर के रूप में भी भुगतान किया जायेगा, जिसका आर्थिक खर्च करीब 800 करोड़ रुपये का होगा. जहां तक पूर्ववर्ती योजना से एकीकृत पेंशन योजना की तुलना का प्रश्न है, तो यह बताना जरूरी है कि मोदी सरकार ने इस योजना के द्वारा पूरी कोशिश की है कि पुरानी पेंशन योजना के लाभों को वापस कर्मचारियों को उपलब्ध कराया जाए. परंतु फिर भी कुछ आयामों पर आज भी पुरानी पेंशन योजना तुलनात्मक रूप से सरकारी कर्मचारियों के लिए ज्यादा सहानुभूति रखती है.

एक, उसमें न्यूनतम 20 वर्षों के बाद वेतन के 50 प्रतिशत की रकम का पेंशन के रूप में मिलना निश्चित था, जो अब 25 वर्ष है. दूसरा, यूनिफाइड पेंशन स्कीम के अंतर्गत सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली ग्रेच्युटी की रकम पुरानी पेंशन योजना की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत से कम रहेगी, जो इस योजना के अंतर्गत आने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए एक आर्थिक नुकसान होगा. लेकिन दूसरी तरफ इस योजना में पुरानी पेंशन योजना की तुलना में कुछ बेहतर पक्ष भी हैं, जैसे- फैमिली पेंशन के अंतर्गत अब 60 प्रतिशत का हिस्सा दिया जायेगा, जबकि पहले यह 30 प्रतिशत ही था और न्यूनतम पेंशन की सीमा को भी 9,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया गया है. निश्चित रूप से कर्मचारियों द्वारा इस योजना का स्वागत होगा, पर अधिक उम्मीद होने के कारण कुछ निराशा भी हो सकती है. पेंशन का मुद्दा अभी भी राजनीतिक रहेगा क्योंकि पुरानी पेंशन योजना को कुछ राज्यों ने पहले से ही लागू किया हुआ है. शायद वे राज्य इस तरफ नहीं मुड़ना चाहेंगे. ऐसे में कुछ राज्यों के आगामी चुनाव में पेंशन की योजना पर चर्चा होती रहेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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