H-1B Visa Fees Hike : भारत को निशाना बनाते ट्रंप, पढ़ें शिवकांत का आलेख

H-1B Visa Fee Hike : अमेरिका में बसे करीब 50 लाख भारतवंशियों में से 10 ट्रंप प्रशासन में उच्च पदों पर और 20 से अधिक मझोले पदों पर हैं. अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के छह सांसद हैं और राज्य विधायिकाओं में भी 30 से अधिक भारतवंशी विधायक हैं.

H-1B Visa Fees Hike : एच-1बी वीजा की फीस बढ़कर एक लाख डॉलर हुए एक सप्ताह बीत चुका है. इससे सर्वाधिक प्रभावित देश भारत ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि वह इसके पूरे प्रभाव का अध्ययन कर रहा है, और चीन ने प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हुए अपनी नयी के-वीजा स्कीम जारी कर दी है, जिसका उद्देश्य स्टेम प्रतिभाओं को (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरी और गणित स्नातकों) शोध और कारोबार के लिए चीन में आमंत्रित करना है. हर साल जारी होने वाले 85 हजार एच-1बी वीजाओं में से 71 फीसदी भारत के और 11.7 फीसदी चीन के पेशेवर और शोधार्थी हासिल किया करते थे. अमेरिका को सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और एआइ की महाशक्ति बनाने में एच-1बी वीजा पर गये भारतीयों का बड़ा योगदान है. इसीलिए वे नासा के अलावा माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, मेटा, एमेजॉन और आइबीएम में ऊंचे पदों पर हैं.


अमेरिका में बसे करीब 50 लाख भारतवंशियों में से 10 ट्रंप प्रशासन में उच्च पदों पर और 20 से अधिक मझोले पदों पर हैं. अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के छह सांसद हैं और राज्य विधायिकाओं में भी 30 से अधिक भारतवंशी विधायक हैं. चिकित्सा, प्रबंधन, कानून, इंजीनियरिंग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में उनका अच्छा सम्मान है और राजनीतिक प्रचार में भी वे खासा योगदान करते हैं. पर एच-1बी वीजा की फीस बढ़ाने के विरोध में भारतवंशियों ने आवाज नहीं उठायी. गत सप्ताह भारत यात्रा पर आयीं अमेरिकी सांसद जूली जॉनसन ने संसद की विदेश समिति के अध्यक्ष डॉ शशि थरूर को बताया कि एक भी भारतवंशी वोटर ने वीजा की फीस बढ़ाने का विरोध करने के लिए उनके कार्यालय फोन नहीं किया. वे टेक्सास से डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद हैं और भारत यात्रा पर आये डेमोक्रेटिक पार्टी के संसदीय शिष्टमंडल में शामिल थीं.

शिष्टमंडल से बातचीत के बाद डॉ थरूर ने कहा, ‘यदि अमेरिका के भारतवंशी अपनी मातृभूमि के साथ अच्छे रिश्ते देखना चाहते हैं, तो इसके लिए उन्हें भी लड़ना होगा, बोलना होगा और अपने प्रतिनिधियों पर भारत के साथ खड़े होने का दबाव डालना होगा.’ इस पर प्रतिक्रिया देते हुए हिंदू अमेरिकी न्यास की निदेशक सुहाग शुक्ला ने एक्स पर लिखा, ‘डॉ थरूर जैसे नेताओं को प्रवासियों से ऐसी आशाएं नहीं रखनी चाहिए. इस तरह के कामों के लिए अमेरिका में लॉबी करने वाले होते हैं. भारत सरकार उनकी सेवाएं ले’. मगर डेमोक्रेटिक पार्टी समर्थक इंडियन अमेरिकन इंपैक्ट संगठन के कार्यकारी निदेशक चिंतन पटेल ने कहा, ‘एच-1बी वीजाधारकों को निशाना बना कर ट्रंप अमेरिका के आर्थिक भविष्य से ही नहीं खेल रहे, बल्कि अमेरिका के भारतवंशियों के साथ-साथ सभी आप्रवासी समुदायों के खिलाफ भेदभाव भड़का रहे हैं. उनका यह कदम अमेरिकी नौकरियां बचाने के लिए नहीं, बल्कि विदेशियों से नफरत के एजेंडे का हथियार बनाने के लिए है.’ ट्रंप अपनी सरकार और पार्टी को तानाशाह की तरह चला रहे हैं. इसलिए ट्रंप प्रशासन में शामिल और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक भारतवंशियों के लिए चाह कर भी विरोध में कुछ कह पाना संभव नहीं है.


इस बीच चीन ने भारत की स्टेम प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए अपनी के-वीजा स्कीम शुरू की है, जो एच-1बी वीजा की तरह काम करेगी. इसका मुख्य आकर्षण यह है कि वीजा के लिए किसी कंपनी से नौकरी का निमंत्रण पाना जरूरी नहीं है. योग्य आवेदक वीजा हासिल करने के बाद चीन में जाकर भी रोजगार खोज सकते हैं या अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं. इसीलिए ट्रंप के विरोधी कह रहे हैं कि उन्हें जनादेश तो चीन पर शिकंजा कसने का मिला था. पर काम वह ऐसे कर रहे हैं, जो चीन को आगे बढ़ाने वाला है. खाड़ी के देशों की रक्षा से अमेरिका ने हाथ खींचा, तो चीन ने सऊदी अरब को पाकिस्तानी परमाणु रक्षा सुविधा दिला दी.

जलवायु संधि से ट्रंप ने हाथ खींचा, तो चीन जलवायु का नेता बन बैठा. अब वह स्टेम प्रतिभाओं के लिए द्वार बंद कर रहे हैं, तो चीन उनके लिए द्वार खोल रहा है, ताकि तकनीकी दौड़ में वह अमेरिका से आगे निकल सके. बिजली की कारों, सोलर सेल और बैटरी तकनीक में वह पहले ही आगे निकल चुका है. स्टेम प्रतिभाओं को आकर्षित कर वह एआइ और क्वांटम तकनीक में भी आगे निकल जायेगा. स्टेम प्रतिभाओं को आकर्षित करने के प्रयास में जर्मनी, ब्रिटेन और कनाडा भी जुट गये हैं. पिछले सप्ताह भारत स्थित जर्मनी के राजदूत ने अपने देश की आप्रवासन व्यवस्था को भरोसेमंद, आधुनिक और स्थिर बताते हुए स्टेम प्रतिभाओं को जर्मनी आने का न्योता दिया.


उधर कनाडा अमेरिका के वर्तमान और भावी एच-1बी वीजाधारकों को लुभाने के लिए ऐसी कार्य परमिट योजना शुरू करने पर विचार कर रहा है, जिससे वे कनाडा में रहते हुए अमेरिकी कंपनियों में काम कर सकें. ब्रिटेन में तकनीकी क्षेत्र की स्टार्टअप कंपनियां गृह मंत्रालय की मदद से स्टेम प्रतिभाओं के लिए सैकड़ों नौकरियों के न्योते तैयार कर रही हैं. पर ये देश न्यूनतम वेतन की सीमा बढ़ाकर केवल उन्हीं प्रतिभाओं को आकर्षित करना चाहते हैं, जो योग्यतम हों. ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया समेत सभी पश्चिमी देशों में कोविड के बाद से आप्रवासन कानून कड़े होते जाने के कारण भारतीय पेशेवरों के लिए काम के अवसर घटते जा रहे हैं. इसलिए भारतीय पेशेवरों और उनसे काम कराने की इच्छुक कंपनियों के लिए बेहतर यही होगा कि भारत में ही जीसीसी, यानी वैश्विक क्षमता केंद्र खोलकर डाटा विश्लेषण, सॉफ्टवेयर विकास, साइबर सुरक्षा, डिजाइन और एआइ विकास जैसे काम करें.

ट्रंप की कोपदृष्टि दवा उद्योग पर भी पड़ गयी है. उनके शोध और विकास का काम भी जीसीसी केंद्रों में हो सकता है, क्योंकि करीब 1,800 जीसीसी केंद्रों के साथ भारत अब कम लागत में अधिक नवाचार का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. भारतीय प्रतिभाओं और माल के लिए बंद होते पश्चिम के द्वारों ने भारत के समक्ष अपनी स्टेम प्रतिभाओं के रचनात्मक योगदान से निर्माण और नवाचार का नया केंद्र बनने की चुनौती खड़ी की है. यदि भारत को आत्मनिर्भर होना और तीव्र विकास करना है, तो अपनी प्रतिभाओं के देश-देश भटकने की जगह इस चुनौती को अवसर में बदलना होगा. इसके लिए उसे दूसरी श्रेणी के नगरों की बुनियादी सुविधाएं और संचार की व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी. शिक्षा को उद्योगों से जोड़ना होगा. जिन कौशलों की जरूरत है, उनका तीव्र विकास करना होगा और कारोबार करना सुगम बनाना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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Published by: शिवकांत

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