गिग वर्कर्स की समस्याओं पर गौर करना चाहिए
Gig Workers: गिग वर्कर्स डिजिटल अर्थव्यवस्था में जबरदस्त योगदान दे रहे हैं. ये कम पारिश्रमिक वाले कामगार हैं और उद्योगों तथा कंपनियों की लागत कम रखने में मदद करते हैं, सो इन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए.
Gig Workers: हर सुबह देश में लाखों घरों के डोर बेल बजते हैं, दरवाजे खटखटाये जाते हैं और कई बार आवाज भी दी जाती है. लाखों युवा अपने वाहनों पर तेजी से घर-घर जाकर सामान की डिलीवरी देते हैं. उनके पास रुकने का वक्त नहीं है, क्योंकि वे जितने फेरे लगायेंगे, उतनी आमदनी होगी. ये हैं विभिन्न कंपनियों के डिलीवरी बॉय, जिन्हें गिग वर्कर्स भी कहा जाता है. ये देश के सप्लाइ चेन का आखिरी छोर हैं, जो कंपनियों का सामान ग्राहकों तक समयबद्ध तरीके से पहुंचाते हैं. देश में हुई उपभोग क्रांति के ये भी प्रमुख पात्र हैं. अनुमान है कि इस समय देश में लगभग एक करोड़ युवा इस काम में लगे हुए हैं.
इनके बूते ही बड़ी-बड़ी कंपनियों का सामान सुरक्षित तरीके से लोगों के घरों तक पहुंचता है, जिससे उनकी बिक्री भी बढ़ी है. ऑनलाइन कंपनियों ने पहले इसकी शुरुआत की, जिसमें पिज्जा कंपनियां भी शामिल थीं. उसके बाद एमेजॉन, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा, बिग बास्केट जैसी कंपनियां सामने आयीं. फिर तो लाइन लग गयी. इसके बाद क्विक कॉमर्स कंपनियां, जैसे ब्लिंकिट, इंस्टामार्ट, जेप्टो वगैरह सामने आयीं. इनके आने से तो परिदृश्य ही बदल गया और धड़ाधड़ सामान लोगों के घरों में पहुंचने लगे. मशीन की तरह सटीकता और समय का पालन इनका मूल आधार बन गये. अब पास की दुकान जाने के झंझट से छुटकारा मिल गया, अचानक घर में सामान की जरूरत का समाधान मिल गया. और सबसे बड़ी बात यह रही कि ग्राहकों को कई तरह के विकल्प भी मिलने लगे. यानी कंपनियों, विक्रेताओं और ग्राहकों, सभी के लिए लाभ की स्थिति. आंकड़े बताते हैं कि जहां 2020-21 में भारत में गिग कामगारों की संख्या सतहत्तर लाख थी, वह 2029-30 तक बढ़कर दो करोड़, पैंतीस लाख तक हो जायेगी और ये अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का योगदान देंगे. जीडीपी में इनका योगदान 1.25 प्रतिशत होगा. जैसे-जैसे इंटरनेट का उपयोग बढ़ता जायेगा, ऐसे कामगारों की मांग बढ़ती जायेगी.
यह भी सच है कि सरकार चाहे कोई भी हो, एक करोड़ युवाओं को इतनी आसानी से रोजगार तो नहीं दे सकती. यह इस बदलाव से ही संभव हुआ है. बड़े शहरों में रहने वाले युवा, जो कुछ समय पहले तक इस ख्याल में डूबे हुए थे कि उन्हें कहां और क्या रोजगार मिलेगा, आज उनके सामने एक विकल्प है. इसका नतीजा हुआ है कि कम पढ़े-लिखे युवा भी अब रोजगार पाने लगे हैं. दिल्ली जैसे महानगर की बात करें, तो वहां अब युवा सुबह-सुबह काम पर निकल जाते हैं, जो पहले मटरगश्ती करते रहते थे. इससे घर की आर्थिक स्थिति में बदलाव साफ दिख रहा है. महानगरों में काम कर रहे इन युवाओं को औसतन 15 से 20 हजार रुपये तक मिल जाते हैं. यह ऑर्डर और समय पर निर्भर करता है. यानी, एक छोटे से परिवार को चलाने के लिए धन मिल जाता है.
इस कारण बड़ी संख्या में युवा निराशा से उबर गये हैं और इस तरह की जिंदगी में रम रहे हैं. हालांकि यह सब सुनने में जितना आसान लग रहा है, उतना है नहीं. इन कामगारों के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं, जैसे आय अस्थिरता, किसी तरह के रोजगार लाभ- बीमा, रिटायरमेंट लाभ, छुट्टियां, पेंशन आदि का न होना. इसके अतिरिक्त, उन्हें किसी तरह की रोजगार सुरक्षा उपलब्ध नहीं है और उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं. उन्हें किसी तरह की कानूनी सुरक्षा नहीं है जो स्थायी कर्मियों को मिलती है. दुर्घटना हो जाने पर भी किसी तरह की वित्तीय मदद नहीं मिलती. आर्थिक इमरजेंसी में भी उन्हें संबंधित कंपनी कुछ नहीं देती है. बल्कि अपने हिसाब से उनकी छुट्टी भी कर देती है.
फिलहाल कई कंपनियों ने 10 मिनट डिलीवरी की घोषणा की है, जिससे इन पर भारी दबाव पड़ रहा है. इस लक्ष्य को पूरा करने में एक्सीडेंट का पूरा खतरा रहता है. हर दिन दर्जनों डिलीवरी बॉय दुर्घटना का शिकार हो रहे हैं. कई बार कंपनियां उन पर पेनाल्टी भी लगाती हैं और उनके लिए कोई व्यवस्था भी नहीं करती हैं. सच तो यह है कि उनकी वर्किंग कंडीशन बहुत खराब है. सड़क पर खड़े रहना, फिर भागकर कस्टमर के पास जाना. उनके लिए बैठने तक की कोई व्यवस्था नहीं है. डिलीवरी के रेट कई बार इतने कम होते हैं कि उन्हें बेगार कराये जाने का अहसास होता है. यदि कोई कामगार 15 घंटे लगातार काम करके 700-800 रुपये कमाता है, तो फिर लाभ ही क्या है? ये सभी सवाल पिछले दिनों उनकी हड़ताल के दौरान उठे. अब मामला गरम है और उम्मीद है कि इसका समाधान निकलेगा.
भारत सरकार ने 2025-26 के बजट में गिग वर्कर्स के लिए कई कल्याणकारी कदमों की घोषणा की है. उनका पंजीकरण इ-श्रम पोर्टल पर करने की व्यवस्था की गयी है. उन्हें आइडी कार्ड देने की भी व्यवस्था की जा रही है. आयुष्मान भारत स्वास्थ्य स्कीम में उन्हें पांच लाख रुपये तक का सुरक्षा कवच दिया जा रहा है. श्रम मंत्रालय ऐसे कामगारों को इ-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण के लिए जोर दे रहा है. सरकार का मानना है कि ये कामगार डिजिटल अर्थव्यवस्था में जबरदस्त योगदान दे रहे हैं. ये कम पारिश्रमिक वाले कामगार हैं और उद्योगों तथा कंपनियों की लागत कम रखने में मदद करते हैं, सो इन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
