तमिलनाडु में हिंदी के पक्ष में उठती आवाजें, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का खास लेख

Tamil Nadu : श्रीधर ने एक्स पर जब हिंदी सीखने की अपील की, तो इसे स्टालिन की भाषाई राजनीति के जवाब के तौर पर देखा जाने लगा. ऐसा स्वाभाविक है, क्योंकि तमिल संस्कृति और भाषा के सम्मान के नाम पर वह तमिल भावनाओं को उभारने की कोशिश कर रहे हैं.

Tamil Nadu : भाषाएं उन लोगों के लिए भावनात्मक मुद्दा होती हैं, जो उन्हें प्राथमिक जुबान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन अपने राजनीतिक फायदे के लिए इसी भावना का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अब हिंदी के समर्थन में तमिलनाडु के भीतर से ही आवाज उठने लगी है. श्रीधर वेंबु तमिल माटी के ही सपूत हैं. इंटरनेट, सॉफ्टवेयर और कारोबार की दुनिया में उनकी कंपनी जोहो का डंका बज रहा है. यही श्रीधर वेंबु खुले तौर पर कहने लगे हैं कि आइए, हम हिंदी सीखें. हिंदी न जानने की वजह से हो रही कारोबारी दुश्वारियों को वे समझ रहे हैं, इसीलिए वह न सिर्फ हिंदी सीख रहे हैं, बल्कि इसकी मुनादी भी कर रहे हैं.

श्रीधर ने एक्स पर जब हिंदी सीखने की अपील की, तो इसे स्टालिन की भाषाई राजनीति के जवाब के तौर पर देखा जाने लगा. ऐसा स्वाभाविक है, क्योंकि तमिल संस्कृति और भाषा के सम्मान के नाम पर वह तमिल भावनाओं को उभारने की कोशिश कर रहे हैं. इस प्रक्रिया में वह कभी हिंदी को साम्राज्यवादी बताते हैं और जब यह आरोप साबित नहीं हो पाता, तो हिंदी पर यह आरोप लगाने से भी पीछे नहीं हटते कि अपने हृदय प्रदेश की बोलियों और छोटी भाषाओं को उसने निगल लिया है.


हकीकत यह है कि हिंदी ने अपने हृदय प्रदेश की किसी भी भाषा के अस्तित्व को कोई चोट नहीं पहुंचायी है. उलटे वह इनके बीच संपर्क भाषा के रूप में काम कर रही है. अवधी, भोजपुरी, बैसवाड़ी या ब्रजभाषी जब अपने भाषा समुदाय से दूर के लोगों से मिलते हैं, तब उनके सहज संवाद की भाषा हिंदी होती है. इस प्रक्रिया में वह हर भाषा से कुछ शब्द लेती है, खुद भी समृद्ध होती है और अपनी बोली या उपभाषाओं को भी ताकतवर बनाती है. महात्मा गांधी ने तमिल और तेलगु युवाओं से 107 साल पहले हिंदी सीखने की अपील की थी. उनके ही आह्वान पर 1918 में एनी बेसेंट और रामास्वामी अय्यर ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी.

गांधी जी का सपना था कि तमिल और तेलुगू जैसे अहिंदीभाषी इलाकों के लोग हिंदी तो सीखें ही, हिंदी को लेकर अपने राज्यों में माहौल भी बनायें. गांधी जी का वह सपना आज सच होता नजर आ रहा है. श्रीधर वेंबु जैसे घोर तमिलभाषी का हिंदी के समर्थन में सामने आना और उनके साथ तमिलनाडु ही नहीं, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना आदि के लोगों का खड़ा होना मामूली बात नहीं है.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे आर्थिक विचारक एस गुरुमूर्ति तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक हलके की महत्वपूर्ण आवाज हैं. लेकिन हिंदी को लेकर तमिलनाडु में जो सामान्य धारणा रही है, उसकी वजह से हिंदी समर्थक उनके सुर को तमिल माटी में तवज्जो देने से बचा जाता रहा है. पर श्रीधर वेंबु की आवाज और उनके समर्थन में सोशल मीडिया मंचों पर उमड़े युवा स्वरों ने गुरुमूर्ति की हिंदी समर्थक आवाज को ताकत दी है.


हिंदी का समर्थन करते हुए श्रीधर यह भी कह रहे हैं कि उनकी कंपनी का कामकाज तमिलनाडु की तुलना में दूसरे राज्यों में ज्यादा है, जहां उनकी कंपनी अपने तमिल अधिकारियों और प्रोफेशनल को भेजने में हिचकती है, क्योंकि वे दूसरे राज्यों में सहज संवाद विशेषकर जमीनी स्तर पर नहीं कर पाते. वर्ष 1965 में तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन हुआ था, क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के चलते हिंदी को राजकाज की भाषा का स्थान लेने के लिए 15 साल की अवधि 25 जनवरी, 1965 को पूरी हो रही थी. तब क्षेत्रीय द्रविड़ राजनीति को हिंदी विरोध में अपनी राजनीतिक राह दिखी.

तमिल उपराष्ट्रीयता को उन्होंने हिंदी विरोध के नाम पर उभारा और स्थानीय लोक को अपने पक्ष में लामबंद किया. इस कारण केंद्र सरकार को हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने के संवैधानिक आग्रह को अनंत काल के लिए पर टालना पड़ा. इस अर्थ में तमिलनाडु का हिंदी विरोधी आंदोलन सफल कहा जाएगा. तभी से तमिलनाडु के सरकारी स्कूलों में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू नहीं है.


पर सीबीएसइ बोर्ड वाले विद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई हो रही है. अखिल भारतीय नौकरियों के मद्देनजर स्थानीय लोग अपने बच्चों को सीबीएसइ बोर्ड वाले स्कूलों में पढ़ा तो ही रहे हैं, उन्हें अलग से हिंदी की कोचिंग भी दिला रहे हैं. तमिलनाडु की प्रौढ़ हो चुकी पीढ़ी में एक वर्ग ऐसा भी है, जो सोचता है कि हिंदी विरोधी आंदोलन में हिस्सा लेकर उसने गलती की. यह गलती सुधारने के लिए वह पीढ़ी अपने बच्चों को हिंदी से घृणा करना सिखाने से बचती है. इसके अलावा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा अब तक 2.25 करोड़ से ज्यादा लोगों को हिंदी सिखा-पढ़ा चुकी है. अब तमिलनाडु में ऐसे लोग मिल जायेंगे, जो हिंदी के समर्थन में आवाज उठाते हैं. इनमें ज्यादातर वे हैं, जिन्होंने तमिलनाडु के बाहर भारतीयों के बीच संपर्क और संवाद के रूप में हिंदी को सहज पाया है और खुद हिंदी न जानने की वजह से खुद को लाचार समझते रहे हैं. श्रीधर वेंबु जैसे लोगों का हिंदी के समर्थन में आना ऐसी आवाजों को ताकत दे रहा है. यही ताकत तमिलनाडु में हिंदी के लिए उम्मीद की किरण है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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