बाज आये चीन

अगर भारत खुले तौर पर तिब्बत, ताइवान, हांगकांग, वीगर समुदाय की प्रताड़ना जैसे मुद्दों पर बोलने लगेगा, तो चीन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़ी असुविधा हो सकती है.

भारत आने से ठीक पहले चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने जम्मू-कश्मीर के मामले में आपत्तिजनक टिप्पणी कर फिर अपनी आक्रामकता का परिचय दिया है. पाकिस्तान में इस्लामिक देशों के सम्मेलन के अवसर पर दिये गये इस बयान से इंगित होता है कि भारत-विरोधी अभियान में चीन पूरी तरह से पाकिस्तान के साथ खड़ा है. बीते कुछ वर्षों में अनेक बार चीन ने भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है. अपनी प्रतिक्रिया में भारत ने उचित ही चीन को याद दिलाया है कि भारत उसके आंतरिक मामलों में सार्वजनिक रूप से कुछ कहने से परहेज करता है.

अगर भारत खुले तौर पर तिब्बत, ताइवान, हांगकांग, वीगर समुदाय की प्रताड़ना जैसे मुद्दों पर बोलने लगेगा, तो चीन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बड़ी असुविधा हो सकती है. चीनी विदेश मंत्री की इस टिप्पणी का असर उनकी यात्रा पर भी पड़ सकता है, जो चीन के ही निवेदन पर हो रही है. रिपोर्टों के अनुसार, संभवत: चीनी विदेश मंत्री शुक्रवार को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल से मिलेंगे.

भारत ने पहले ही कह दिया है कि लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आक्रामकता का समाधान किये बिना दोनों देशों के संबंध सामान्य नहीं हो सकते हैं. तेजी से बदलती वैश्विक भू-राजनीति की पृष्ठभूमि में चीन ने आपसी संवाद को बहाल करने तथा इस साल बीजिंग में होनेवाली ब्रिक्स शिखर बैठक की तैयारी के संदर्भ में भारत से संपर्क किया है. चीन की पूरी कोशिश है कि द्विपक्षीय विवादों और लद्दाख में तनाव के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीजिंग आयें.

इसी साल रूस, चीन और भारत के त्रिपक्षीय समूह की बैठक भी होनी है, जिसकी अध्यक्षता चीन के पास है. उसमें भी वह प्रधानमंत्री मोदी की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहता है. इसी कड़ी में चीनी विदेश मंत्री की यात्रा हो रही है. इस्लामाबाद में दिये गये बयान पर भारतीय प्रतिक्रिया से यह भी संकेत मिलता है कि भारत का रुख अब नरम नहीं होगा. दो वर्ष से लद्दाख में भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ के इरादे से चीन ने बड़ा सैनिक जमावड़ा किया है. उसके जवाब में भारतीय सेना ने भी व्यापक तैनाती की है. चीन के वर्चस्ववादी और विस्तारवादी रवैये के बावजूद भारत ने हमेशा कूटनीति और बातचीत को महत्व दिया है.

कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं निकलने के बावजूद सैन्य अधिकारियों की एक दर्जन से अधिक बैठकों में भारत शामिल होता रहा है. बीते दो साल में अलग-अलग बहुपक्षीय आयोजनों में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात भी हुई है. भारत के इस रुख का चीन को सम्मान करना चाहिए और दबाव डालने के पैंतरे से बाज आना चाहिए. जम्मू-कश्मीर हो या भारत का कोई अन्य क्षेत्र, राष्ट्र की एकता एवं अखंडता सर्वोपरि है. हम अपनी आंतरिक समस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से सुलझाने में सक्षम हैं. भारत को घेरने की नीति छोड़कर चीन को हमारे देश से सीख लेनी चाहिए.

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Published by: संपादकीय

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