ट्रंप-शरीफ मुलाकात के मायने, पढ़ें अनिल त्रिगुणायत का आलेख

पाकिस्तान ने इस मुलाकात का ब्योरा दिया है, जिसमें कहा गया है कि ट्रंप और शरीफ ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का मुकाबला करने में आपसी सहयोग बढ़ाने पर बातचीत की.

Trump-Sharif meeting : संयुक्त राष्ट्र की बैठक के बाद व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात पर दुनिया भर की निगाहें गयी हैं. ट्रंप और शरीफ की तीन दिन में यह दूसरी मुलाकात थी. व्हाइट हाउस से पहले दोनों ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान मुलाकात की थी. इसके ब्योरे हैं कि ट्रंप ने मुलाकात से पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को इंतजार कराया, लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि इसके पीछे पाकिस्तान को नीचा दिखाने की कोई मंशा रही होगी. उल्टे ट्रंप ने वहां मौजूद अधिकारियों से पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष की तारीफ की.


पाकिस्तान ने इस मुलाकात का ब्योरा दिया है, जिसमें कहा गया है कि ट्रंप और शरीफ ने क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद का मुकाबला करने में आपसी सहयोग बढ़ाने पर बातचीत की. इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकवाद के खिलाफ अभियान तथा सुरक्षा और खुफिया सहयोग बढ़ाने की दिशा में पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिका द्वारा समर्थन करने के लिए शरीफ ने ट्रंप का शुक्रिया अदा किया है. हालांकि अमेरिका ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है. ट्रंप ने शरीफ और मुनीर से बंद कमरे में मुलाकात की और मीडिया को इस बैठक से दूर रखा गया. इसे दूसरी तरह से देखा जाना चाहिए. अमेरिकी क्रिप्टोकरेंसी फर्म वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल ने कुछ महीने पहले पाकिस्तान के साथ क्रिप्टोकरेंसी समझौता किया है. इस अमेरिकी कंपनी में ट्रंप परिवार की 60 फीसदी हिस्सेदारी है. ट्रंप पर आरोप है कि अपने पद का दुरुपयोग वह पारिवारिक कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष के साथ ट्रंप की गोपनीय बैठक के पीछे यह भी कारण हो सकता है.


ट्रंप की पाकिस्तान से नजदीकी हाल के कुछ महीनों में जिस तरह से बढ़ी है, वह कोई रहस्य नहीं है. अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत पुराने हैं. पाकिस्तान अमेरिका का गैर नाटो सहयोगी है. बीच के वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते सहज नहीं थे. ट्रंप ने अपने पिछले राष्ट्रपति काल में पाकिस्तान को आतंकवाद की पनाहगाह तक कहा था, लेकिन दूसरे कार्यकाल में कई कारणों से वह पाकिस्तान को प्रश्रय दे रहे हैं.
पाकिस्तान के साथ अमेरिकी नजदीकी का पहला कारण भारत-पाकिस्तान संघर्ष के बाद का संघर्षविराम है. ट्रंप कई बार दावा कर चुके हैं कि उनके कहने पर दोनों देशों के बीच संघर्षविराम हुआ था. भारत ने ट्रंप के इस दावे को खारिज किया है, जबकि पाकिस्तान अमेरिका के सामने बिछा हुआ है. उसने न सिर्फ संघर्षविराम का श्रेय ट्रंप को दिया है, बल्कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाक प्रधानमंत्री शरीफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति को शांति का पुजारी बताते हुए कहा कि उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रंप का नाम सामने रखा है. इसलिए ट्रंप पाकिस्तान से खुश और भारत से नाराज हैं.

ट्रंप प्रशासन ने दो बार में भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया. इससे भारत को बहुत नुकसान है. ट्रंप को लगा था कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे पर उनसे गुहार लगायेंगे या उनकी शरण में जायेंगे, लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के अपने कायदे-कानून हैं. हमारी सरकार ने अमेरिका से गुहार लगाने के बजाय इससे जूझने का संकल्प लिया. फिर ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा की फीस बढ़ाकर एक लाख रुपये डॉलर कर दी. चूंकि अमेरिकी प्रशासन हर साल 85,000 एच-1बी वीजा जारी करता है, और इसका लाभ पाने वालों में 70 प्रतिशत भारतीय होते रहे हैं, ऐसे में, अमेरिका के इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव भारत पर पड़ने वाला है. आगामी एक अक्तूबर से ट्रंप प्रशासन ब्रांडेड और पेटेंटेड दवाओं पर भी 100 फीसदी टैरिफ लगाने वाला है. हालांकि भारत पर बहुत इसका असर नहीं पड़ने वाला, लेकिन ध्यान से देखें, तो ट्रंप प्रशासन द्वारा हाल में जितने भी फैसले लिये गये, वे सब भारत को प्रभावित कर रहे हैं या करने वाले हैं. ट्रंप को लगा था कि भारत उसके सामने झुक जायेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. इससे ट्रंप के अहं को चोट पहुंची है.


इस बीच ट्रंप ने अफगानिस्तान स्थित बगराम एयरबेस पर कब्जे की इच्छा जतायी है. बगराम एयरबेस अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. वहां से वह चीन की गतिविधियों पर नजर रख सकता है. चूंकि बगराम एयरस्पेस पर कब्जा दिलाने में पाकिस्तान मददगार हो सकता है, इस कारण भी ट्रंप इस्लामाबाद को तवज्जो दे रहे हैं.


अलबत्ता अमेरिका-पाकिस्तान रिश्ते में एक बात जरूर आश्चर्यजनक है. पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष मुनीर को अमेरिका जितना महत्व दे रहा है, उतना महत्व हाल के वर्षों में किसी दूसरे पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को नहीं मिला. मुनीर के बार-बार व्हाइट हाउस में जाने का क्या अर्थ है? इससे पहले जून में ट्रंप ने मुनीर को लंच पर बुलाया था. वर्ष 2001 के बाद पहली बार किसी पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस तरह सम्मानित किया. उससे पहले मई में भी भारत से संघर्ष के बाद मुनीर अमेरिका गये थे. तब उन्होंने अमेरिका की सेंट्रल कमांड के प्रमुख से मुलाकात की थी. पहले के पाकिस्तानी सेनाध्यक्षों का व्हाइट हाइस में इतना आना-जाना नहीं रहा.


दरअसल ट्रंप सीधे उन लोगों से संपर्क कर रहे हैं, जो उनका काम आसान कर सकें. फिर ट्रंप और उनके प्रशासन को यह बखूबी मालूम है कि पाकिस्तान में सत्ता पर नियंत्रण वास्तविक अर्थ में सेना का ही है. इसलिए भी ट्रंप लगातार मुनीर के संपर्क में हैं. भारत के लिए यह घटनाक्रम निश्चित रूप से चिंताजनक है. पिछले दिनों बलूचिस्तान नेशनल आर्मी को अमेरिका ने विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया, तो वह पाकिस्तान के कहने पर ही किया. हाल में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच जो समझौता हुआ, उसमें भी अमेरिका की निश्चित तौर पर सहमति रही होगी. अब तो खबर यह भी है कि पाकिस्तान के 25,000 सैनिक सऊदी अरब की मदद करने यमन की सीमा पर पहुंच गये हैं. अमेरिका-पाकिस्तान की नजदीकी पर भारत क्या करे? भारत को अपने व्यापार विविधीकरण पर पूरा ध्यान देना चाहिए, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी कहते भी हैं. हालांकि देर-सबेर भारत-अमेरिका व्यापार समझौता होना है. यह इसलिए भी होना है, क्योंकि इससे अमेरिका को लाभ होगा, लेकिन भारत को चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा देशों से व्यापारिक और रणनीतिक संपर्क बनाने की कोशिश करे. ट्रंप प्रशासन का यह रवैया हमारे लिए नयी राह खोलने वाला हो, तो आश्चर्य नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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