भारत के सच्चे मित्र थे शिंजो आबे

शिंजो आबे ने न सिर्फ जापान को आर्थिक महाशक्ति बनाया, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की चुनौतियों से भी निबटने का आधार भी तैयार किया.

याद नहीं आता कि हालिया दशकों में कब सारा भारत किसी विदेशी राजनेता के दिवंगत होने पर इतना शोकाकुल हुआ हो, जैसा जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दिल दहलाने वाली मौत पर हुआ. भारत उन्हें अपना सच्चा मित्र यूं ही नहीं मानता था. आबे पहली बार 2006 में जापान के प्रधानमंत्री बने थे. वह तब भारत आये थे और उन्होंने संसद को संबोधित भी किया था. अपने वक्तव्य में उन्होंने भारत-जापान मैत्री पर विस्तार से अपने विचार रखे थे.

आबे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने 2012 में. फिर वह तीन बार भारत के दौरे पर आये. उनसे अधिक बार कोई भी जापानी प्रधानमंत्री भारत नहीं आया. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से जापानी कंपनियों का भारत में निवेश भी बढ़ने लगा. भारत शिंजो आबे में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का अक्स देखने लगा था.

कैनेडी भी भारत के मित्र थे. अजीब इत्तिफाक है कि कैनेडी की भी हत्या हुई थी. निश्चित रूप से शिंजो आबे के आकस्मिक निधन से भारत-जापान संबंधों का एक मजबूत स्तंभ गिर गया है. उन्हें भारत ने भी दिल खोल कर प्रेम-सम्मान दिया. शिंजो आबे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धर्मनगरी बनारस गये थे.

दोनों नेताओं ने दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती में भाग लिया था. आबे भारत से महात्मा बुद्ध के चलते अपने को भावनात्मक स्तर पर करीब पाते थे और गंगा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वाहक भी है. गंगा के रूप में एक बड़ा आयाम जोड़ कर दोनों देशों के आपसी रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में यह ठोस पहल थी.

वाराणसी में गंगा आरती में शरीक होना हो या बुलेट ट्रेन में प्रधानमंत्री मोदी को भारत के भविष्य की झलक दिखाना हो, आबे वह चेहरा रहे हैं, जिसमें भारतीयों को उम्मीद नजर आती थी. उन्होंने न सिर्फ जापान को आर्थिक महाशक्ति बनाया, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की चुनौतियों से भी निबटने का आधार भी तैयार किया. याद करें 1962 के भारत-चीन युद्ध को.

तब कैनेडी भारत के साथ खड़े थे. भारत के आग्रह पर उन्होंने तब चीन को कायदे से बता दिया था कि यदि उसने युद्ध विराम नहीं किया, तो अमेरिका युद्ध में कूद पड़ेगा. उसके बाद चीन ने युद्ध विराम किया था और विवादित क्षेत्र से अपनी वापसी की घोषणा भी की थी. जहां शिंजो आबे बार-बार भारत आते रहे, वहीं कैनेडी राष्ट्रपति के रूप में एक बार भी भारत नहीं आ सके. उन्हें 1964 के शुरू में भारत आना था, लेकिन उससे पहले ही उनकी हत्या हो गयी थी. वह 1955 में भारत घूमने के लिए आये थे.

शिंजो आबे के दौर में ही बुलेट ट्रेन को भारत में चलाने पर समझौता हुआ. बुलेट ट्रेन परियोजना विकसित भारत के एक सपने को साकार करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होने जा रही है. इस परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए जापान के साथ जो करार हुआ है, वह भी उत्साहजनक है. दूसरे देशों को जिस दर पर जापान ऋण देता है, उससे काफी कम दर पर भारत को इस परियोजना के लिए जरूरी राशि मुहैया करा रहा है.

ऋण वापसी की मियाद भी 25 वर्षों की जगह 50 वर्ष रखी गयी है. आबे ने भारत के साथ जैसी ठोस मैत्री की बुनियाद रख दी थी, उसके चलते जापान से दिल्ली मेट्रो रेल निगम को उसके चौथे चरण के विस्तार में तेजी लाने के लिए जापानी कंपनी जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी ने मदद की. महामारी के चलते बड़ा घाटा होने से दिल्ली मेट्रो को नयी परियोजना के लिए वित्तीय मदद की दरकार थी.

शिंजो आबे 2014 के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थे. उनकी उस यात्रा से एक माह पहले जापान के सम्राट अकिहितो और उनकी साम्राज्ञी पत्नी मिचिको छह दिन की भारत यात्रा पर आये थे. वर्ष 1990 में राज्याभिषेक होने के बाद सम्राट की किसी दक्षिण एशियाई देश की वह पहली यात्रा थी.

शिंजो आबे जब भी हमारे देश की राजधानी दिल्ली आते थे, तो वह भारत में रहने वाले अपने देश के नागरिकों से भी मिलते थे. वह 2014 की यात्रा के समय दिल्ली के वसंत कुंज में स्थित जापानी स्कूल के बच्चों से भी मिले थे. इसमें दिल्ली और आसपास के शहरों में रहने वाले जापानी परिवारों के बच्चे दाखिला लेते हैं. गुरुग्राम में तीन हजार से अधिक जापानी नागरिक रह रहे हैं.

दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा आदि में रहने वाले जापानी नागरिक लगभग दो दर्जन जापानी कंपनियों के दफ्तरों और फैक्ट्रियों में काम करते हैं. वे भारत भूमि को गौतम बुद्ध की भूमि होने के कारण पूजनीय मानते हैं. बुद्ध के प्रति जापानियों की आस्था भारत और जापान को परस्पर निकट लाने में एक महत्वपूर्ण कारक है. शिंजो आबे लंबे समय तक जापान के प्रधानमंत्री रहे, जिससे आर्थिक, वित्तीय और तकनीकी क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के साथ दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध भी गहरा हुआ है.

उनके असमय संसार से विदा होने से भारत का स्तब्ध होना लाजिमी है. कृतज्ञ भारत अपने प्यारे मित्र को कभी नहीं भूल सकेगा. शिंजो आबे के बाद फिलहाल दुनिया में शायद ऐसा कोई राजनेता दिखाई देता है, जो उनकी तरह भारत के प्रति सम्मान और प्रेम का भाव रखता हो तथा हमारे देश की सर्वांगीण प्रगति में हरसंभव सहायता के लिए तत्पर रहता हो. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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