पिछले सप्ताह नयी दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन में रूस द्वारा अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट 'सुखोई-57' की तकनीकी, उत्पादन और निर्यात से जुड़ी सुविधाएं भारत को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव देश के सामरिक और कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. रूस ने यह प्रस्ताव फरवरी, 2025 में एयरो इंडिया में सार्वजनिक रूप से रखा था, पर 2026 में इस पर तकनीकी चर्चा आगे बढ़ी और ब्रिक्स सम्मेलन में इसे अंतिम रूप दिया गया. भविष्य में जिस हल्के लड़ाकू विमान 'तेजस' को भारतीय वायुसेना की रीढ़ के रूप में निर्माण करने की योजना थी, उसके इंजन के लिए भारत अमेरिका पर आश्रित है.
कावेरी इंजन बनाने के प्रयत्नों के बावजूद देश में अब तक लड़ाकू जेट इंजन बनाने की क्षमता विकसित नहीं हो पायी है. इसीलिए वायुसेना के विमानों के निर्माण का एकाधिकार रखने वाली एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) अपेक्षित गति से उत्पादन नहीं कर पा रही. एक तरफ वायुसेना में लड़ाकू विमानों की इकाइयों में मिग 21 की विदाई से उपजी कमी चिंता का विषय है, दूसरी तरफ एचएएल के लिए जनरल इलेक्ट्रिक इंजन की आपूर्ति में हो रहा विलंब और वैश्विक रक्षा आपूर्ति शृंखला की सुस्त चाल चिंता का सबब है.
ट्रंप के तेवर भी ऐसी व्यवस्था के प्रति नयी चिंता पैदा कर रहे हैं. ऐसे में सुखोई-57 विमान के भारत में निर्माण का प्रस्ताव एक महत्वपूर्ण सामरिक विकल्प के रूप में उभरा है. एडवांस मल्टीपल रोल कॉम्बैट विमान (एमसीए) प्रोजेक्ट की पहली उड़ान और उसके बाद के चरणों के बीच लंबा समय लगना स्वाभाविक है. जब तक देश का स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी का विमान एएमसीए पूरी तरह बनकर तैयार होता है, तब तक चीन, पाकिस्तान जैसे हमारे पड़ोसियों द्वारा जे-20 और जे-35 जैसे स्टील्थ विमानों को अपने बेड़े में शामिल करने से एक बड़ा सामरिक फासला पैदा हो रहा है, पर सुखोई-57 को केवल एएमसीए आने तक के अंतरिम समाधान के रूप में देखना उसकी संभावित उपयोगिता को कम करके आंकना है.
भारत ने फ्रांस की दसॉल्ट कंपनी से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद कर फिलहाल वायुसेना को राहत जरूर दी है. राफेल चौथी श्रेणी का उन्नत बहु-भूमिका वाला लड़ाकू विमान है, पर वह पांचवीं श्रेणी के स्टेल्थ फाइटर की श्रेणी में नहीं आता यानी शत्रु के रडार को चकमा देकर उसकी सीमा में प्रवेश करने की क्षमता उसमें नहीं है. ऐसे में लंबी दूरी से प्रहार करने वाले मिसाइल का प्रयोग वह अपनी सीमा में रहकर कर सकता है, पर एंटी मिसाइलों की बढ़ती क्षमता ऐसे उपयोग को सीमित करेगी. इसी अंतराल को पाटने के लिए वायुसेना को एक ऐसे अंतरिम और भरोसेमंद विकल्प की जरूरत है, जो रडार को चकमा देने में माहिर हो.
सुखोई-57 में यह क्षमता है. इस दृष्टि से अमेरिकी एफ-35 विमान भी बहुत अच्छा लड़ाकू विमान है, लेकिन उसका मूल्य भी बहुत है और रखरखाव पर होने वाला खर्च भी. वर्तमान भू-राजनीतिक दबावों और पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच मॉस्को के लिए भारत एक ऐसा भरोसेमंद साझीदार है, जो उसके हथियारों का बड़ा खरीदार होने के साथ रक्षा उत्पादन में संयुक्त भागीदारी का माद्दा भी रखता है. वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध से लेकर आज तक रूस भारत को सामरिक क्षेत्र में लगातार सहयोग देता आया है. रूस का यह प्रस्ताव, कि सुखोई-57 को भारत में ही एचएएल के माध्यम से लाइसेंस के तहत निर्मित किया जाये, भारत की 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' नीति के अनुकूल है. भारतीय वायुसेना के दृष्टिकोण से सुखोई-57 के अधिग्रहण और स्थानीय उत्पादन का प्रस्ताव कई मायनों में ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकता है.
भारत की यह मांग रही है कि उसे केवल तैयार विमान नहीं, बल्कि तकनीकी संरचना तक पहुंच चाहिए. यदि रूस भारतीय घरेलू प्रणालियों, जैसे कि उत्तम एइएसए रडार और स्वदेशी अस्त्र मिसाइलों को सुखोई-57 के साथ एकीकृत करने की अनुमति देता है, तो यह भारत की तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करेगा. यदि एचएएल, नासिक या और कहीं सुखोई-57 का निर्माण शुरू होता है, तो भारत न केवल अपनी वायुसेना की पांचवीं पीढ़ी की जरूरत पूरी कर पायेगा, बल्कि भविष्य में मित्र देशों को इस विमान का निर्यात कर वैश्विक रक्षा बाजार में नया मुकाम हासिल कर सकेगा. अलबत्ता अतीत के अनुभवों को देखते हुए फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है. लगभग एक दशक पहले भारत एफजीएफए (फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट) सह-विकास कार्यक्रम से अलग हो गया था.
तब मुख्य विवाद तकनीकी हस्तांतरण, विमान के स्टेल्थ गुणों के स्तर और लागत को लेकर था. इस बार भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि रूस उसे केवल असेंबली लाइन न दे, बल्कि मूल डिजाइन और कोड्स तक सार्थक पहुंच प्रदान करे. यह भी जरूरी है कि रूसी निर्माण सहयोग और पूरी तकनीकी जानकारी मिलने से हमारे अपने पूर्णतः स्वनिर्मित एएमसीए प्रोजेक्ट से कहीं हमारा ध्यान हट न जाये. फिर सुखोई-57 का निर्माण भारत में होता है, तो इसके कलपुर्जे स्वदेशी रूप से बनने चाहिए, ताकि युद्ध के समय सप्लाई चेन बाधित न हो. यदि भारत और रूस रक्षा सहयोग के इस नये शिखर पर पहुंचते हैं, तो यह भारत के एएमसीए कार्यक्रम के लिए भी ‘लिफ्टिंग पैड’ का काम कर सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
