-सुदीप लखटकिया-
(एनएसजी के पूर्व महानिदेशक और पूर्व जॉएंट कमिश्नर ऑफ ट्रैफिक पुलिस, हैदराबाद सिटी)
Health Crisis : भारत के पास लगभग 1.5 लाख किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, जो तेजी से बढ़ रहे हैं और पूरे देश में सड़क परिवहन की स्थिति को बदल चुके हैं. लेकिन यह आधुनिक बुनियादी ढांचा पहले से कहीं अधिक लोगों की जान सड़क दुर्घटनाओं में ले रहा है. उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2023 में भारत में 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाओं में 1.72 लाख लोगों की मौत हुई और 4.6 लाख से अधिक लोग घायल हुए. हमारे पास बेहतर सड़कें, स्मार्ट निगरानी तकनीक और सख्त दंड हैं, जिनसे दुर्घटनाएं कम होनी चाहिए थीं.
लेकिन अपने यहां सड़क पर होने वाली मौतों का आंकड़ा सड़क नेटवर्क के विस्तार के साथ लगभग समानुपाती रूप से बढ़ रहा है, जिससे सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप लेती जा रही हैं. इस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है. हम एक जटिल समस्या का सामना कर रहे हैं, जिसने ज्ञान के क्षरण को जन्म दिया है. यह एक ऐसी स्थिति है, जहां आंकड़े तो मौजूद हैं, लेकिन उनसे सीख नहीं ली जा रही. हमें पता है कि क्या गलत है, फिर भी हमारी सड़कें असुरक्षित हैं, क्योंकि हमने सड़क हादसों से सबक नहीं सीखे. सड़क सुरक्षा तब बिगड़ती है जब वाहन चालकों, पैदल यात्रियों और व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों का समुदाय सीखना और सुरक्षित व्यवहार अपनाना बंद कर देते हैं.
साक्ष्य आधारित प्रवर्तन का धीरे-धीरे कमजोर होना और संस्थागत सीख की कमी असुरक्षित प्रथाओं को बढ़ावा देती है. इससे एक ऐसी संस्कृति बनती है, जो समय के साथ-साथ और खराब होती जाती है. ऐसी व्यवस्था में वही लोग सुरक्षा से समझौता करते हैं, जो आखिरकार इससे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं और सड़कों पर घायल या मृत हो सकते हैं. सुरक्षा का एक पहलू सीधे सरकार की दृष्टि से जुड़ा है. जब राजनीतिक दबाव साक्ष्यों पर हावी हो जाता है, तब योजनाकार दुर्घटनाओं के आंकड़ों को नजरअंदाज करने लगते हैं. वैसे में, नियमों के उल्लंघनों को सामान्य मान लिया जाता है, समाज उन्हें स्वीकार कर लेता है और इसके परिणामस्वरूप सड़क पर बड़ी दुर्घटनाएं होती रहती हैं. अपने यहां सरकारों के पास सड़क दुर्घटनाओं का विशाल आंकड़ा है, फिर भी इंजीनियरिंग, प्रवर्तन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को अलग-अलग खांचों में बांटकर देखा जाता है.
ऐसी स्थिति में, सड़क सुरक्षा को मजबूत करने का पहला कदम यातायात उल्लंघनों पर सख्त दंड लागू करना होना चाहिए. ट्रैफिक चालान, जैसा कि आम बोलचाल में कहा जाता है, नियमों के उल्लंघनों को आर्थिक रूप से हतोत्साहित करने और उन्हें भविष्य की प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई के लिए दर्ज किये जाने का माध्यम है. इसमें कोई शक नहीं कि देश में कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने उल्लंघनों की सटीक पहचान और चालान जारी करने की क्षमता में काफी सुधार किया है. लेकिन चालान की वसूली उस गति से नहीं बढ़ी है. यही कारण है कि सड़क अनुशासन और सुरक्षा पर असर पड़ा है. देश के कुछ शहरों में तो जुर्माना वसूली की दर पांच फीसदी तक ही है. जबकि चालान के भुगतान में देरी या भुगतान न करने के प्रति शून्य सहिष्णुता होनी चाहिए. न लिये जाने वाले जुर्माने उल्लंघनों को बढ़ावा देते हैं. कानून की गरिमा उसके सही और पूर्ण कार्यान्वयन में है.
समय पर चालान की वसूली नियमों के प्रभावी पालन का अंतिम चरण है और यह जोखिम को रोकने में सहायक हो सकता है. इससे सभी सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा मिलेगा. आदर्श रूप से नियमों का उल्लंघन करने वाले हर व्यक्ति को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. जैसा कि ट्रैफिक पुलिस के आंकड़ों से पता चलता है. दिल्ली में 2025 तक निजी चालकों के खिलाफ लगभग 2.5 करोड़ और वाणिज्यिक चालकों के खिलाफ करीब 20 लाख चालान लंबित हैं. ये आंकड़े उस आम धारणा को चुनौती देते हैं कि केवल वाणिज्यिक चालक ही नियमों का उल्लंघन करते हैं. लगभग तीन करोड़ लंबित मामलों में से एक-तिहाई तेज गति से वाहन चलाने और लगभग 48 लाख मामले अवैध पार्किंग से संबंधित हैं, जो सड़क दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं. हाल ही में पुणे में एक हाई-प्रोफाइल सड़क दुर्घटना के बाद यह तथ्य सामने आया कि आरोपी के कई चालान लंबित थे. यदि समय पर उससे जुर्माना वसूला गया होता, तो शायद जानें बचायी जा सकती थीं. यह उस ‘ब्रोकन विंडो सिंड्रोम’ की ओर संकेत करता है, जिसके अनुसार छोटे अपराधों को नजरअंदाज करने से बड़े अपराधों को बढ़ावा मिलता है.
स्पष्ट है कि यातायात उल्लंघनों के जुर्माने की वसूली एक आसान उपाय है, लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण इसमें ढील दी जाती है, जिससे भुगतान में देरी, छूट या माफी मिल जाती है. इस संदर्भ में तेलंगाना सरकार का यह बयान सराहनीय है कि ऐसे मामलों में कोई आम माफी नहीं दी जायेगी. यदि देश में यह नया चलन बनता है, तो इससे नियमों के उल्लंघनों और सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी.
बेशक दंड एक पहलू है, जिस क्षेत्र में आसानी से सुधारा लाया जा सकता है, लेकिन हमें अन्य जटिल मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा, जैसे ड्राइविंग टेस्ट की प्रक्रिया, लाइसेंस जारी करना, सड़कों का रखरखाव, मरम्मत की गुणवत्ता, कमजोर ट्रैफिक इंजीनियरिंग और सड़क संकेतों की खराब व्यवस्था. देश में जिस आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस जारी हो जाते हैं, वह भी चिंता का विषय है. यदि परीक्षा की गंभीरता कम हो जाये, तो फिर उसका महत्व ही क्या रह जाता है? इसके अलावा, भले ही सड़कें अच्छी हों, लेकिन बिना चेतावनी के डायवर्जन, मरम्मत कार्य और अपर्याप्त संकेतक तेज गति वाले यातायात के लिए नये खतरे पैदा करते हैं. खराब या गलत तरीके से लगाये गये संकेत भी इस समस्या को बढ़ाते हैं. यह सब मिलकर दिखाता है कि प्रणाली कई स्तरों पर विफल हो रही है. हमें ऐसे समग्र समाधान की आवश्यकता है, जो पूरे तंत्र में काम करे.
एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव बीमा और चालान प्रणाली को जोड़ने का है, जिसमें अधिक उल्लंघनों पर बीमा प्रीमियम बढ़ाने का प्रावधान हो. इसके लिए तकनीक आधारित सख्त प्रवर्तन की आवश्यकता होगी, जिससे हर उल्लंघनकर्ता को दंडित किया जा सके. बार-बार उल्लंघन करने पर ड्राइविंग लाइसेंस भी रद्द होना चाहिए, जैसा कि विकसित देशों में होता है. भारत उच्च सड़क दुर्घटना दर के साथ विकसित राष्ट्र नहीं बन सकता. सड़क सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विकास संकेतक है और हमें इसे उसी रूप में देखना चाहिए, ताकि आधुनिक सड़क नेटवर्क का पूरा लाभ उठाते हुए हम सुरक्षित और तेज भविष्य की ओर बढ़ सकें.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
