मौद्रिक समीक्षा में विकास तेज करने पर जोर

इस बार रिजर्व बैंक ने रेपो दर के अलावा नकदी आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में भी 100 बीपीएस की कटौती की है, जिससे आगामी दिसंबर तक बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी आने की संभावना है

रिजर्व बैंक ने विगत छह जून को संपन्न हुई मौद्रिक समीक्षा में रेपो दर में 0.50 फीसदी की कटौती की, जिससे यह घटकर 5.50 के स्तर पर आ गयी है. इसके पहले फरवरी और अप्रैल की मौद्रिक समीक्षाओं में रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 0.25 फीसदी की दो बार कटौती की थी. इस तरह, इस साल केंद्रीय बैंक रेपो दर में कुल 100 बेसिस पॉइंट्स की कटौती कर चुका है. रेपो दर में 100 बीपीएस की कटौती का असर बैंकिंग क्षेत्र में धीरे-धीरे दिख रहा है. ज्ञात हो कि लगभग 60 फीसदी ऋण ईबीएलआर से जुड़े हैं, जिससे मौजूदा कटौती से औसत उधारी दर में लगभग 30 बीपीएस की गिरावट आने की संभावना है. साथ ही, इसके कारण मियादी जमा और बचत खाता के ब्याज दरों में भी कटौती की जायेगी, जिससे छोटे निवेशकों को नुकसान होगा. डिपोजिट में कम ब्याज दर होने के कारण मौजूदा समय में निवेशक बैंक की जगह निवेश के दूसरे विकल्पों में निवेश कर रहे हैं, जिसके कारण जनवरी तक बैंक डिपॉजिट वृद्धि दर 10.3 फीसदी रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में धीमी है.

उल्लेखनीय है कि इस बार रिजर्व बैंक ने रेपो दर के अलावा नकदी आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में भी 100 बीपीएस की कटौती की है, जिससे आगामी दिसंबर तक बैंकिंग सिस्टम में 2.5 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त नकदी आने की संभावना है. बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी रहने पर बैंकों की लोन की लागत कम होगी और ऋण ब्याज दर कम रहने से उधारी की मांग में तेजी आयेगी. बैंकों में उधारी दर अधिक रहने के कारण वर्ष-दर-वर्ष के आधार पर, बैंक क्रेडिट वृद्धि अप्रैल तक घटकर 11.2 फीसदी रह गयी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 15.3 प्रतिशत रही थी. रेटिंग एजेंसी इक्रा ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए क्रेडिट वृद्धि अनुमान 12 फीसदी रखा है, जो वित्त वर्ष 2024 के 16.3 प्रतिशत से कम है. वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर के अनुसार भी ऋण के उच्च ब्याज दरों की वजह से इस वित्त वर्ष में क्रेडिट वृद्धि 12 फीसदी से 14 प्रतिशत तक सीमित रह सकती है. रिजर्व बैंक ने इस वित्त वर्ष में वृद्धि दर के 6.5 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती, सेवाओं में विस्तार, कॉरपोरेट बैलेंस शीट में सुधार और सरकार द्वारा पूंजीगत खर्च में वृद्धि पर आधारित है. साथ ही, खुदरा महंगाई अनुमान को चार फीसदी से घटाकर 3.7 प्रतिशत कर दिया है, जिसका कारण बेहतर मॉनसून और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आना है.

पिछले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.5 फीसदी रही. इस दौरान निजी अंतिम खपत व्यय और सरकारी अंतिम खपत व्यय, दोनों में कमी आयी. निजी व्यय की वृद्धि दर 7.3 फीसदी रही, जबकि, सरकारी खपत व्यय की वृद्धि दर 4.1 प्रतिशत रही. हालांकि, कृषि क्षेत्र, ग्रामीण मांग, सरकारी निवेश और सेवा क्षेत्रों में सुधार ने मौजूदा वृद्धि दर को बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. रिजर्व बैंक महंगाई दर के अधिक रहने पर रेपो दर में कटौती नहीं करता है, क्योंकि महंगाई को विकास का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है. विगत अप्रैल में खुदरा महंगाई घटकर 3.16 प्रतिशत के स्तर पर आ गयी, जो विगत 69 महीनों का सबसे निचला स्तर है. जुलाई, 2019 में महंगाई दर 3.15 प्रतिशत रही थी. इधर, थोक महंगाई भी 13 महीने के निचले स्तर 0.85 फीसदी के स्तर पर आ गयी, जबकि मार्च में यह 2.05 प्रतिशत, फरवरी में 2.38 फीसदी एवं जनवरी में 2.31 फीसदी के स्तर पर रही. महंगाई का सीधा संबंध क्रय शक्ति से है. महंगाई के दौरान पैसों की कीमत कम हो जाती है. महंगाई का बढ़ना और घटना उत्पाद की मांग और आपूर्ति पर निर्भर करता है. यदि लोगों के पास पैसे ज्यादा होंगे, तो वे ज्यादा चीजें खरीदेंगे, जिससे चीजों की मांग बढ़ेगी और मांग के मुताबिक आपूर्ति न होने पर इन चीजों की कीमत बढ़ेगी. सरल शब्दों में कहें, तो बाजार में पैसों का अत्यधिक बहाव या चीजों की कमी महंगाई का कारण बनता है. वहीं अगर मांग कम होगी और आपूर्ति ज्यादा, तो महंगाई कम होगी.

वैसे, इन सब के बीच वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में वृद्धि होना एक सकारात्मक संकेत है. ज्यादा जीएसटी संग्रह मजबूत उपभोक्ता खर्च, औद्योगिक गतिविधि और प्रभावी कर अनुपालन के बारे में बताता है. सरकार ने जीएसटी से मई, 2025 में से 2.01 लाख करोड़ रुपये जुटाये हैं, जो पिछले साल की तुलना में 16.4 फीसदी अधिक है. मई, 2024 में सरकार ने 1.73 लाख करोड़ रुपये जीएसटी वसूल किये थे, जबकि अप्रैल, 2025 में सरकार ने इसके जरिये 2.37 लाख करोड़ रुपये संग्रहित किये, जो अब तक का रिकॉर्ड संग्रहण है. अभी महंगाई नियंत्रण में है और बैंक, डिपोजिट की समस्या से जूझ रहे हैं. जीडीपी वृद्धि दर में कमी आयी है, इसलिए, वर्तमान में सरकार और रिजर्व बैंक की प्राथमिकता विकास की रफ्तार बढ़ाना है. इसी वजह से केंद्रीय बैंक ने रेपो दर और सीआरआर दर में एक साथ कटौती की है. इससे बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त नकदी आयेगी, जिसका इस्तेमाल बैंक सस्ती दर पर जरूरतमंदों को कर्ज देने में कर सकेंगे, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेजी आयेगी और विकास को रफ्तार मिलेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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