एक सितंबर, 1926 को राजस्थान के जोधपुर के निकट एक छोटे से गांव बोरुंदा में जन्मे विजयदान देथा की आज जन्मशती है. उन्हें प्यार और आदर से सभी बिज्जी कहा करते थे. जिस महत्वपूर्ण कार्य के लिए उनके प्रति जन सामान्य में असीम श्रद्धा थी, वह था राजस्थान की लोककथाओं का चौदह खंडों में ग्रंथमाला, ‘बातां री फुलवारी’, का पुनर्लेखन और संग्रहण. राजस्थानी के लोक साहित्य के पुनर्लेखन के साथ उन्होंने राजस्थानी में ही मूल सृजन भी किया. उनकी ग्रंथमाला ‘बातां री फुलवारी’ का दसवां भाग साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हुआ था. बाद में अकादेमी ने इस खंड का हिंदी अनुवाद करवाया और उसके बाद जाकर ये कहानियां राजस्थानी से इतर बड़े पाठक वर्ग तक पहुंचीं.
बिज्जी का कृतित्व विशाल और पर्याप्त फैला हुआ है. ‘उलझन’ व ‘अलेखूं हिटलर’ उनके राजस्थानी कहानी संकलन हैं. हिंदी में ‘अंतराल’, ‘सपनप्रिया’, ’चौधराइन की चतुराई’, ‘उजाले के मुहासिब’ सहित अनेक कथा संग्रहों के अतिरिक्त ‘उषा (कविता संग्रह), ‘बापू के तीन हत्यारे, ‘अतिरिक्त’, ‘साहित्य और समाज’, ‘मेरो दरद न जाने कोय’ (निबंध संग्रह) तथा 'राजस्थानी-हिंदी कहावत कोश' प्रमुख हैं. उन्होंने बच्चों के लिए 'अनोखा पेड़', 'कब्बू रानी' जैसे कथा संग्रह भी लिखे. भारतीय ज्ञानपीठ से उनकी तीन उपन्यासिकाओं का संकलन ‘त्रिवेणी’ प्रकाशित हुआ था. देथा को अनेक पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित भी किया गया, जिनमें 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' (1974), 'भारतीय भाषा परिषद पुरस्कार' (1992) और 'मरुधारा पुरस्कार' (1995) सम्मिलित हैं. साहित्य के क्षेत्र में उनकी अभूतपूर्व सेवाओं को देखते हुए साहित्य अकादेमी ने उन्हें अपनी महत्तर सदस्यता से भी विभूषित किया. बिज्जी 'प्रेरणा', 'वाणी' और 'लोक संस्कृति' जैसी पत्रिकाओं के संपादन से भी संबद्ध रहे.
वे जीवन पर्यंत जोधपुर के निकट अपने गांव बोरुंदा में रहे और वहीं साहित्य-संस्कृति के केंद्र ‘रूपायन’ का संचालन करते रहे. इसमें कोई दो राय नहीं है कि राजस्थान की लोक कथाओं को उन्होंने नये रूप में ढाला. वह देश की सांस्कृतिक परंपराओं को योद्धाओं, मायापतियों या शासकों का मोहताज नहीं मानते थे, अपितु लेखन को समाज के विष को अमृत में तब्दील करने वाला काम कहते थे. देथा की कहानियां जीवन रस से सराबोर हैं, जिनके लेखन के मूल में हमारा लोक है. इन कहानियों में लोक जीवन के राग-रंग और निजी पीड़ा तक उभर कर सामने आये हैं. कहना गलत न होगा कि बिज्जी अपनी तरह के अनूठे कथा शिल्पी थे. उम्र के आखिरी दौर में उन्होंने राजस्थान की हजारों कहावतों का एक कोश बनाया, जिसमें प्रत्येक कहावत के पीछे की कहानी भी उन्होंने लिखी. इस कोश के भी लगभग दस खंड प्रकशित हुए. बिज्जी के लेखन में जो प्रश्न बार-बार आया है, वह है 'मनुष्य जीवन की सर्वोच्च आकांक्षा क्या हो.' उन्होंने लिखा है, ‘आज मनुष्य समाज में सर्वोपरि प्रतिष्ठा माया की है, भौतिक बहबूदी की है. निर्धन पंडित की अपेक्षा करोड़पति डकैत ही वंदनीय है.’ तो क्या होना चाहिए? वे उत्तर देते हैं- ‘जरूरत से ज्यादा निजी संपत्ति संचय ही तो सही माने में भयंकर अपराध है.’
उनकी प्रसिद्ध कहानी 'दुविधा' इसी संपत्ति के खोखलेपन को उघाड़ती है, जिस पर दो बार फिल्म भी बनी. हमें स्वीकार करना होगा कि लोक साहित्य सच्चे अर्थों में वाचिक साहित्य है. दादी-नानी के पास परंपरा से चली आ रही कहानियां, गीत और बातें मिलकर लोक साहित्य का स्वरूप गढ़ते हैं. विजयदान देथा के कृतित्व की चर्चा लोक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में ही संभव है, क्योंकि वही उनकी कीर्ति का आधार है. ‘बातां री फुलवारी’ के प्रारंभिक भाग के अंत में संग्रह विशेष की लोक कथाएं सुनाने वाले संदर्भ व्यक्तियों के उल्लेख भी हैं.
यह कार्य सचमुच प्रशंसनीय है. देथा ने इन लोककथाओं में कई मौलिक उद्भावनाएं भी की थीं, जिनका खास जोर इस बात पर रहा कि ये लोक कथाएं समतावादी समाज बनाने की आकांक्षाओं पर खरी साबित हों. लोक की व्याख्या के कई स्तर हो सकते हैं. प्रभु पक्ष का अपना लोक है, तो वंचितों का भी लोक है. ऐसे में पक्षधरता की चुनौती को विजयदान देथा उठाते हैं और ये कथाएं हमारे समाज की गैर-बराबरी, जातीय सामंती पूर्वाग्रहों के विरुद्ध समता का गीत बन जाती हैं. बिज्जी की बातें करते ही एक ऐसे व्यक्ति की तस्वीर निगाहों में आती है, जिसने एक छोटे-से गांव में जन्म लिया, जीवनभर वहीं रहा और वहीं दिवंगत भी हुआ. अपने लेखन और कला से वह दुनियाभर में पहचाना गया, लेकिन उसने अपना गांव कभी नहीं छोड़ा. वहीं रहते हुए अपने और अपने गांव वालों के लिए रोजगार के छोटे साधन तैयार करता रहा और पूरा जीवन ऐसे कामों में व्यतीत कर दिया, जो अब कोई नहीं करेगा. उनके शताब्दी वर्ष में हमें याद करना चाहिए कि अपने देश के लोक और मामूली लोगों के जीवन को कोई लेखक कितनी आत्मीयता से रच सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
