मोदी का नया मंत्र : देरी विकास का दुश्मन, पढ़ें उमेश चतुर्वेदी का लेख

PM Modi : प्रधानमंत्री का यह कहना, कि देरी विकास का दुश्मन है और हमारी सरकार इस दुश्मन को हराने के लिए प्रतिबद्ध है, उनकी इसी सोच को जाहिर करता है. बीते दिनों एक कार्यक्रम में उन्होंने परियोजनाओं में देरी को देश के विकास का बड़ा रोड़ा बताया.

PM Modi : अमेरिकी लेखक जय एम फाइमैन की अमेरिकी बीमा कंपनियों के कामकाज को लेकर कुछ साल पहले एक पुस्तक आयी थी, ‘डिले, डिनाय, डिफेंड…’ इसमें फाइमैन ने साबित किया है कि किस तरह बीमा कंपनियां दावों को टालती हैं, देने से इनकार करती हैं और फिर अपने फैसले का बचाव करती हैं. नौकरशाही से जिनका पाला पड़ता रहता है, उन्हें भी पता है कि वह किस तरह फैसलों को टालती है. इस देर और इनकार की कीमत जनता और आखिरकार देश को चुकानी पड़ती है.

लंबे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने तंत्र की इस खामी को समझा था. सबसे पहले इस कमजोरी पर काबू पाने की उन्होंने गुजरात में कोशिश की और देश की कमान संभालने के बाद उन्होंने तंत्र से इस खामी को दूर करने की कोशिश की. प्रधानमंत्री का यह कहना, कि देरी विकास का दुश्मन है और हमारी सरकार इस दुश्मन को हराने के लिए प्रतिबद्ध है, उनकी इसी सोच को जाहिर करता है. बीते दिनों एक कार्यक्रम में उन्होंने परियोजनाओं में देरी को देश के विकास का बड़ा रोड़ा बताया.

अपने संबोधन में उन्होंने स्वीकार किया कि परियोजनाओं में देरी से प्रगति बाधित होती है, जबकि तात्कालिक कार्रवाई से विकास को बढ़ावा मिलता है. अपने भाषण में उन्होंने असम के बोगीबील पुल परियोजन का उदाहरण दिया, जिसकी आधारशिला 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने रखी थी, बाद में सत्ता संभालते ही अटल बिहारी वाजपेयी ने उसका काम शुरू कराया. लेकिन बाद की सरकारों के दौरान पता नहीं, किन वजहों से इस परियोजना का काम रोक दिया गया, जिससे अरुणाचल प्रदेश और असम के लाखों लोगों को परेशानियां झेलनी पड़ीं. उस योजना पर दोबारा काम मोदी सरकार के आने के बाद शुरू हुआ. चार साल में यह पुल बनकर तैयार हुआ और 2018 में इसे जनता के लिए खोला गया. अगर इस हिसाब से देखें, तो यह काम 2001 या 2002 में पूरा किया जा सकता था. पर ऐसा नहीं हो सका.


सत्ता बदलते ही कई योजनाएं रोक दी जाती हैं और राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. केरल की कोल्लम बाइपास सड़क परियोजना को इसके उदाहरण के रूप में रखा जा सकता है. वह परियोजना 1972 में शुरू होनी थी, पर तकरीबन पचास साल तक वह लटकी रही. आखिरकार वह परियोजना भी मोदी सरकार के दौर में पूरी हुई. प्रधानमंत्री मोदी जब भी कोई नया काम शुरू करते हैं या देश के सामने कोई लक्ष्य रखते हैं, तो वह नया नारा भी गढ़ते हैं. ‘देरी विकास का दुश्मन है’ इस कड़ी में उनका नया नारा है. देश में ऐसी कई परियोजनाएं मिल जायेंगी, जिन्हें तय वक्त तक पूरा नहीं किया जा सका. पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने के लिए घाघरा नदी पर मांझी में एक पुल है. प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने इस पुल को केंद्र मे रखकर कविता ही रच डाली है. इस पुल का शिलान्यास जनता पार्टी के शासनकाल में हुआ, लेकिन अरसे बाद यह पुल बनकर तैयार हो पाया.


परियोजनाओं में देरी की ऐसी ढेरों कहानियां हैं. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में नवी मुंबई हवाई अड्डा परियोजना का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया है. देश की आर्थिक राजधानी के लिए बेहतर और सुगम हवाई सेवा की जरूरत से किसे इनकार हो सकता है. लेकिन नवी मुंबई में हवाई अड्डा बनाने की चर्चा 1997 में शुरू हुई. उस परियोजना को ठीक 10 वर्ष बाद, यानी 2007 में मंजूरी मिल पायी. लेकिन राजनीति और नौकरशाही से कोलाज वाले तंत्र की वजह से इस परियोजना पर ठोस रूप में काम नहीं हो पाया. प्रधानमंत्री ने इसके लिए उस दौरान केंद्र और महाराष्ट्र में काबिज रही कांग्रेस सरकारों को जिम्मेदार ठहराया.

मोदी सरकार इस परियोजना के कामकाज में तेजी लाने की दिशा में आगे बढ़ी है और उम्मीद है कि दूसरी कुछ परियोजनाओं की तरह नवी मुंबई हवाई अड्डा परियोजना भी पूरी होगी. देश के आर्थिक विकास की नींव नरसिंह राव ने 1991 में रखी थी, जिनके सहयोग से तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की गति तेज की थी. देश की आर्थिकी को लाइसेंस राज और लालफीताशाही से दूर किया गया था. उस बदलाव का असर भी दिखा. पर राजकाज की कमान जिस तंत्र के हाथों में रही, वह पुरानी मानसिकता से ग्रस्त रहा. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस मानसिकता पर थोड़ी लगाम जरूर लगी है. पर इस मोर्चे पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. ‘देरी, विकास का दुश्मन है’ के प्रधानमंत्री के नये मंत्र का ही असर कहा जायेगा कि आर्थिक मोर्चे पर तय लक्ष्यों को हासिल करना आसान हुआ. आर्थिक मोर्चे पर बदलाव का असर है कि कुछ ही वर्षों में 11वें नंबर से भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी है.


आज की दुनिया के विकास का ईंधन एक तरह से जैविक ऊर्जा, यानी पेट्रोल और डीजल हैं. अरब देशों के आपसी संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत की पेट्रोलियम आपूर्ति में बाधा न पड़ना, चीन और अमेरिका के बीच जारी व्यापार युद्ध के बावजूद भारत की विकास दर में कमी ना आना एक तरह से भारत के संकल्प का नतीजा है. बेशक इसके लिए राजनीतिक नेतृत्व जिम्मेदार है, पर प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इसका श्रेय युवाओं को दिया. उन्होंने कहा कि यह अभूतपूर्व बढ़ोतरी युवाओं की आकांक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित है. इससे भारत के प्रति दुनिया का नजरिया बदला है. पहले दुनिया मानती थी कि भारत धीरे-धीरे प्रगति करेगा. उसी दुनिया को भारत आज अलग नजर आ रहा है.

प्रधानमंत्री के शब्दों में कहें, तो दुनिया अब देश को ‘तेज और निडर भारत’ के रूप में देख रही है. विश्वगुरु बनने की आकांक्षा हो या वैश्विक महाशक्ति बनना, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इसी सोच को हर स्तर पर न सिर्फ आगे बढ़ाना होगा, बल्कि उसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के तौर पर भी विकसित करना होगा. कई बार राजनीतिक कारणों से पहले की सरकारों द्वारा शुरू या जारी की गयी योजनाएं लटका दी जाती हैं. कई बार नौकरशाही भी इसके लिए जिम्मेदार होती है. आजादी के 75 साल बीतने के बावजूद नौकरशाही में यह मानसिकता बनी हुई है. सरकारी तंत्र से जिनका पाला पड़ता है, अक्सर वे भी फाइमैन जैसी सोच रखते हैं. आर्थिक मोर्चे पर भारत की सफलता दर बढ़ी है, तो उसके पीछे निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि ही है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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