उप-हिमालयी क्षेत्र को नये दृष्टिकोण से देखें

sub-Himalayan region : बिहार, नेपाल, भूटान, दार्जिलिंग और उत्तर-पूर्व का यह क्षेत्र एक साथ कई सांस्कृतिक संसारों को समेटे है. इस कारण इस क्षेत्र को केवल विविधताओं के जोड़ के रूप में नहीं, एक ऐसे जीवंत सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां भिन्नताएं टकराती ही नहीं, एक-दूसरे को बदलती, समृद्ध करती और नये रूप भी देती हैं.

Sub-Himalayan region : उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल से लेकर पूर्वी नेपाल, भूटान, दार्जिलिंग, सिलीगुड़ी गलियारे और उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों तक फैला पूर्वी हिमालय-उप-हिमालयी क्षेत्र केवल नक्शे पर फैला एक सीमावर्ती इलाका नहीं है. यह एक ऐसा जीवंत भूभाग है, जहां प्रकृति, संस्कृति, समाज, व्यापार और विचार लंबे समय से एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं. इस पूरे क्षेत्र को समझने के लिए पुराने सीमावर्ती नजरिये से आगे बढ़ना होगा. इसे सिर्फ सीमा के पास बसे इलाकों का समूह मानना इसकी वास्तविक महत्ता को कम करना है. यह क्षेत्र बिहार, भारत और व्यापक एशिया के लिए एक साथ कई स्तरों पर महत्व रखता है. यह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, आर्थिक रूप से उभरता हुआ और बौद्धिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है.


यह क्षेत्र न केवल उत्तर-पूर्वी बिहार और बंगाल के सीमांत इलाकों के सांस्कृतिक जीवन से गहरे रूप में जुड़ा है, बल्कि भारत की आर्थिक और सामरिक दृष्टि से भी इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है. वैश्विक दर्शन में एशियाई दृष्टिकोण की चर्चा के लिए भी यह क्षेत्र नयी जमीन उपलब्ध कराता है. इस क्षेत्र की सबसे बड़ी पहचान इसकी असाधारण सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक बहुलता है. दुनिया में ऐसे इलाके कम हैं जहां इतने समुदाय, भाषाएं, लिपियां, आस्थाएं और जीवन-रूप इतने घनत्व के साथ एक-दूसरे के निकट हों. हिंदू, बौद्ध, इस्लामी, ईसाई, स्वदेशी और स्थानीय आस्था-परंपराओं ने इस पूरे क्षेत्र को गहराई से प्रभावित किया है. इस क्षेत्र की ताकत इसमें है कि अलग-अलग परंपराओं के बीच लंबे समय से संवाद, मेलजोल, आदान-प्रदान और पारस्परिक प्रभाव का रिश्ता रहा है.

नेपाल, भूटान और उत्तर-पूर्व भारत इसके ठोस उदाहरण हैं. नेपाल में हिंदू, बौद्ध, किरात, मुस्लिम, ईसाई और अन्य परंपराएं एक साथ मिलती हैं. भूटान में बौद्ध सांस्कृतिक ढांचे के भीतर हिंदू उपस्थिति भी महत्वपूर्ण है. उत्तर-पूर्व भारत में मिजोरम, नगालैंड और मेघालय जैसे राज्य ईसाई बहुल हैं, जबकि सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में बौद्ध, हिंदू, ईसाई और स्थानीय परंपराओं का मिश्रित रूप दिखाई देता है. साफ है कि बिहार, नेपाल, भूटान, दार्जिलिंग और उत्तर-पूर्व का यह क्षेत्र एक साथ कई सांस्कृतिक संसारों को समेटे है. इस कारण इस क्षेत्र को केवल विविधताओं के जोड़ के रूप में नहीं, एक ऐसे जीवंत सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां भिन्नताएं टकराती ही नहीं, एक-दूसरे को बदलती, समृद्ध करती और नये रूप भी देती हैं.


इस क्षेत्र की नदियां, जंगल, पहाड़ियां, पर्वत, मैदान और सीमांत भू-दृश्य यहां की संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को आकार देते हैं. भोजन की पद्धतियां, स्थानीय चिकित्सा, लोकस्मृतियां, त्योहार, श्रम और नैतिक कल्पना तक प्रकृति से जुड़ी हुई हैं. इसीलिए इस क्षेत्र की बहुलता कृत्रिम नहीं लगती. यह भूभाग लोगों, कथाओं, वस्तुओं, श्रम, ग्रंथों और विचारों के लगातार आवागमन से बनी एक जीवंत और गतिशील दुनिया के रूप में सामने आता है. लेकिन इस क्षेत्र का महत्व केवल सांस्कृतिक नहीं है. बिहार और भारत, दोनों के लिए इसका आर्थिक पक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण है. उत्तर-पूर्वी बिहार नेपाल-उन्मुख सक्रिय व्यापारिक गलियारों के निकट स्थित है.

इसका सीधा अर्थ है कि परिवहन, भंडारण, कृषि-व्यापार, लघु उद्योग, वित्तीय सेवाओं और सीमा आधारित बाजारों के विकास की यहां बड़ी संभावनाएं हैं. यह निकटता स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए वास्तविक अवसर भी पैदा करती है. इससे मंडियों, व्यापारिक नेटवर्क, सेवा क्षेत्र और स्थानीय उत्पादन को नयी गति मिल सकती है. यह क्षेत्र बिहार को उत्तर-पूर्व भारत, नेपाल, भूटान और आगे दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाले एक रणनीतिक भूमि-सेतु की तरह भी काम करता है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर और उससे जुड़े मार्ग केवल उत्तर-पूर्व भारत के लिए ही नहीं, पड़ोसी देशों के साथ संपर्क, व्यापार और माल ढुलाई की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं. यही कारण है कि भारत की ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ नीतियां इस पूरे भूभाग की उपयोगिता को रेखांकित करती हैं.

इस दृष्टि से यह केवल सीमा का इलाका नहीं, बल्कि संपर्क, विनिमय, बाजार, निवेश और एशियाई जुड़ाव का उभरता हुआ केंद्र है. वैश्विक दर्शन में एशियाई दृष्टिकोण के लिए भी यह क्षेत्र नयी संभावना खोलता है. यह केवल भूगोल नहीं, बल्कि विचार, संस्कृति और जीवन का संगम है. बिहार का नालंदा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो प्राचीन काल में शिक्षा, तर्क, दर्शन और बौद्धिक बहस का महान केंद्र था. बोधगया इसकी दूसरी बड़ी पहचान है, जहां बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ. नालंदा और मगध से निकली बौद्ध ज्ञान परंपरा केवल बिहार तक सीमित नहीं रही. यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर उसके प्रसार में अंग-चंपा और आज के पूर्णिया-सीमांचल से जुड़े रास्तों की भी भूमिका रही होगी. इस दृष्टि से पूर्णिया का क्षेत्र केवल एक सीमांत भूभाग नहीं, विचारों, यात्राओं व सांस्कृतिक संपर्क का महत्वपूर्ण गलियारा भी रहा है.


इस क्षेत्र की विशेषता यह भी है कि यहां दर्शन केवल ग्रंथों और विद्वानों की बहसों में नहीं मिलता, बल्कि लोकस्मृतियों, अनुष्ठानों, त्योहारों, उपचार पद्धतियों और रोजमर्रा के सामुदायिक जीवन में भी जीवित रहता है. यहां अलग-अलग धर्म, भाषाएं और ज्ञान-परंपराएं लंबे समय से साथ रहते हुए एक-दूसरे को प्रभावित करती रही हैं. इसलिए यह क्षेत्र हमें बताता है कि बहुलता केवल संघर्ष का कारण नहीं, संवाद, सह-अस्तित्व और पारस्परिक सीख का आधार भी बन सकती है. आज जब दुनिया विकास और प्रगति को केवल बाजार और आय के पैमाने से माप रही है, तब यह क्षेत्र कल्याण, समुदाय, प्रकृति और मानव उत्कर्ष पर नये ढंग से सोचने की प्रेरणा देता है.

कुल मिलाकर, इस क्षेत्र को उत्तर-पूर्वी बिहार, भारत और एशिया के लिए ऐतिहासिक रूप से जुड़े, सांस्कृतिक रूप से जीवंत और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में समझा जाना चाहिए. इसका महत्व इसकी बहुलता, इसकी पारिस्थितिकी, इसके व्यापारिक अवसरों और इसके बौद्धिक योगदान में निहित है. यह क्षेत्र हमें समझने का मौका देता है कि संस्कृति, अर्थव्यवस्था, सभ्यता और दर्शन को अलग-अलग नहीं, एक साथ रखकर ही किसी भूभाग की वास्तविक शक्ति को पहचाना जा सकता है. इस नये दृष्टिकोण को गढ़ने और उसे आम चिंतन का हिस्सा बनाने के लिए बिहार के बुद्धिजीवियों को पहल करनी चाहिए. राज्य और केंद्र सरकारों को ‘एक्ट ईस्ट’ सफलता के लिए ऐसी संस्थाओं, जनसंपर्क कार्यक्रमों और बौद्धिक विमर्श की पहलों को यथेष्ट समर्थन देना चाहिए. इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत तो है ही, वैचारिक संवाद और शोध को आगे बढ़ाने की भी बहुत जरूरत है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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लेखक के बारे में

By प्रोफेसर मणींद्र

राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक, जेएनयू, नयी दिल्ली

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