नाग पंचमी विशेष : सांपों का बचना धरती के अस्तित्व के लिए जरूरी

Nag Panchami : सांप पर्यावरण के संतुलन को बनाये रखते हैं. चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है और सांप खेती को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों एवं अन्य कीट आदि का भक्षण कर फसलों की रक्षा करते हैं, इसलिए सांप को किसान का मित्र भी कहा जाता है.

Nag Panchami : आदिकाल में मनुष्य जिससे डरा, जिससे उपकृत हुआ, उन सभी को पूजने लगा. हमारे पूर्वज जानते थे कि हर जीव-जंतु प्रकृति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं. सो, हर जीव को किसी भगवान या पर्व से जोड़ दिया. सावन माह की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन नाग देवता की पूजा होती है. ध्यान दें, गर्मी में सर्प धरती के भीतर रहते हैं, गहराई में बांबी बनाकर. आषाढ़ की हल्की बारिश में उन्हें मौसम बदलने का पूर्वानुमान हो जाता है. जैसे ही सावन में बरसात की झड़ी लगती है और बांबियों में पानी भरने लगता है, सर्प सुरक्षित ठिकाने की तलाश में बाहर निकल आते हैं. यह समय उनके जीवन के लिए अमूल्य होता है. तभी पीढ़ियों पहले समाज ने इस ऋतु में नाग पंचमी का आख्यान स्थापित किया, ताकि लोग सांपों से डरे नहीं, उनकी पूजा करें और उनके नैसर्गिक जीवन में दखल न दें.


सांप पर्यावरण के संतुलन को बनाये रखते हैं. चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है और सांप खेती को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों एवं अन्य कीट आदि का भक्षण कर फसलों की रक्षा करते हैं, इसलिए सांप को किसान का मित्र भी कहा जाता है. मूलत: नाग पंचमी नाग जाति के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करने का पर्व है. यह पर्व नाग के साथ प्राणी जगत की सुरक्षा, प्रेम, अहिंसा, करुणा, सहनशीलता के भाव भी जगाता है. ‘भविष्य पुराण’ के पंचमी कल्प में, नाग पूजा और नागों को दूध अर्पित करने का जिक्र आता है.

मान्‍यता है कि सावन के महीने में नाग देवता की पूजा करने और नाग पंचमी के दिन दूध अर्पित करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और नाग दंश का भय नहीं रहता है. इसका कारण यह है कि महाराज जनमेजय के नाग यज्ञ से नागों का शरीर जल गया था. नागों की रक्षा आस्तिक मुनि ने की और उनके जलते हुए शरीर पर दूध डालकर शीतलता प्रदान की. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नाग को दूध पिलाने से पाचन विकार या प्रत्यूर्जता (एलर्जी) से उनकी मृत्यु हो जाती है. इसलिए शास्त्रों में नाग को दूध पिलाने को नहीं, बल्कि दूध से स्नान कराने को कहा गया है. पर लोगों ने सांप को दूध प‍िलाने की परंपरा ही शुरू कर दी. यहां यह जानना जरूरी है कि न तो सांप को दूध पीना पसंद है और न ही वह उसका भोजन है. यह भी समझ लें कि सांप के कान नहीं होते और वह किसी भी तरह से बीन की धुन पर नहीं नाचता. वह केवल बीन के हिलते हुए मुख को देखते हुए हिलता है.


असल में हमारे पूर्वजों ने सांप के प्रति सम्मान या जागरूकता के लिए नाग पंचमी का पर्व आरंभ किया था. आज जब हम सांपों के प्राकृतिक पर्यावास में अपना घर बना चुके हैं, सो वह बस्तियों में आ जाते हैं. सांप संकेतक प्रजाति हैं. इसका अर्थ यह है कि आबोहवा बदलने पर सबसे पहले वही प्रभावित होते हैं. इस लिहाज से उनकी मौजूदगी हमारी मौजूदगी को सुनिश्चित करती है. हम सांपों के महत्व के बारे में कम जानते हैं और उसे डरावना प्राणी अधिक मानते हैं. जबकि सच्चाई यह है कि उनके बगैर हम कीटों और चूहों से परेशान हो जायेंगे. यह भी जान लें कि सांप तभी आक्रामक होते हैं, जब उनके साथ छेड़छाड़ किया जाये या उन पर हमला किया जाये. वे हमेशा आक्रमण करने की जगह भागने की कोशिश करते हैं.

एक सच यह भी है कि खेतों में अधिक कीटनाशक का उपयोग करने के कारण मेंढक सहित कई जीव तेजी से घटे हैं. मेंढकों का तेजी से सफाया होने के भयंकर परिणाम सामने आये हैं. मेंढक पानी व दलदल में रहने वाले जीव हैं. इनकी खुराक हैं वे कीड़े-मकोड़े, मच्छर तथा पतंगें, जो हमारी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं. अब हुआ यह कि मेंढकों की संख्या घट जाने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया. पहले मेंढक बहुत से कीड़ों को खा जाया करते थे, परंतु अब कीट-पतंगों की संख्या बढ़ गयी और वे फसलों को भारी नुकसान पहुंचाने लगे. दूसरी ओर सांपों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो गयी. सांपों का मुख्य भोजन हैं मेंढक और चूहे. मेंढक समाप्त होने से सांपों का भोजन कम हो गया, तो सांप भी कम हो गये. सांप कम होने का परिणाम यह निकला कि चूहों की संख्या में वृद्धि हो गयी. नतीजा, चूहे अनाज की फसलों को चट करने लगे. इस तरह मेंढकों को मारने से फसलों को कीड़ों और चूहों से पहुंचने वाली हानि भी बहुत बढ़ गयी.


अंत में, पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग के अंतिम राजा परीक्षित को तमाम यज्ञ, अनुष्ठान के बावजूद तक्षक नामक सर्प ने डस लिया था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी. परीक्षित अभिमन्यु के पुत्र थे, जिन्हें अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में ही मार डाला था. मृत रूप में जन्मे परीक्षित को योग-शक्ति से कृष्ण ने बचा लिया था. परीक्षित का आशय ही परीक्षण से है. संसार, आत्मा, परमात्मा के परीक्षण में अविवेक रूपी सर्प के डसने की आशंका निरंतर बनी रहती है. सांप को गुस्सा, क्रोध अहंकार से जोड़ा गया है, क्योंकि उनके अंदर का विष किसी को भी खत्म करने के लिए काफी होता है. नाग पंचमी का पर्व अपने अंदर के क्रोध और अहंकार को समाप्त करने की बड़ी सीख लिये हुए है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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