भारतीय शहरों की पोल खोल देता है मानसून

Monsoon : ऐसा प्रतीत होता है जैसे देश को एक योजनाबद्ध ठहराव की स्थिति में धकेल दिया गया है. शहरी भारत 250 से अधिक नगर निगमों, हजारों नगर परिषदों और नगर पंचायतों द्वारा संचालित होता है. बाबुओं, ठेकेदारों और नेताओं के सड़े गठजोड़ से भरी ये संस्थाएं नागरिक जीवन के व्यवस्थित पतन की जिम्मेदार रही हैं.

Monsoon : यह अब ढर्रा ही बन चुका है कि मानसून के देश के कुछ हिस्सों में पहुंचते ही नागरिक एक और भयावह स्थिति के लिए अपने आप को तैयार करते हैं, जो रोजमर्रा की जिंदगी को दुख, खतरे और अपमान के दलदल में बदल देती है. मानसून का जो मौसम नवीनीकरण का होना चाहिए, वह तबाही व अव्यवस्था लेकर आता है. सड़कें गंदी नदियों में बदल जाती हैं, नालियां सड़कों पर सीवेज उगलती हैं, बिजली के तार मौत के जाल की तरह लटकते हैं, फुटपाथ खोमचे व मलबे के नीचे गायब हो जाते हैं, कचरे के ढेर पहाड़ बन जाते हैं और कंकरीट की अवैध इमारतें रातोंरात उग आती हैं. यह केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं है. यह भ्रष्टाचार, उदासीनता और उन लोगों की आपराधिक लापरवाही से पैदा हुई एक मानव निर्मित आपदा है, जिन्हें सेवा की शपथ दी गयी थी. यह हर साल मौतों का उत्सव बन गया है, जो हर स्तर की विफलता से पैदा होता है.

ऐसा प्रतीत होता है जैसे देश को एक योजनाबद्ध ठहराव की स्थिति में धकेल दिया गया है. शहरी भारत 250 से अधिक नगर निगमों, हजारों नगर परिषदों और नगर पंचायतों द्वारा संचालित होता है. बाबुओं, ठेकेदारों और नेताओं के सड़े गठजोड़ से भरी ये संस्थाएं नागरिक जीवन के व्यवस्थित पतन की जिम्मेदार रही हैं. हर मॉनसून उनकी विफलता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है. मॉनसून के कारण आने वाली बाढ़ तो हर साल की परंपरा ही बन चुकी है. वर्ष 2005 में मीठी नदी और नालों के गाद से भर जाने के कारण हुए जल जमाव में मुंबई की सड़कों ने 1,000 से अधिक लोगों की जान ले ली थी.

वर्ष 2015 में चेन्नई का तीन-चौथाई हिस्सा पानी में डूब गया था, जिस कारण पांच लाख से अधिक लोग विस्थापित होने को मजबूर हो गये थे, क्योंकि जलमार्ग बंद हो गये थे और आर्द्रभूमि गायब हो गयी थी. दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और कई दूसरे शहर हर साल इसी भयावह स्थिति को दोहराते हैं-जलभराव से लोग करंट का शिकार होते हैं, यातायात दिनों तक ठप रहता है और घर गंदगी भरे गड्ढों में बदल जाते हैं. मुंबई, चेन्नई और दिल्ली के बड़े नाले पूरी तरह गाद से भरे हैं, उनकी सफाई या तो खराब तरीके से हुई है या गाद छोड़ दी गयी है. विडंबना यह भी है कि नयी बनने वालीं तथाकथित विश्व स्तरीय सड़कें कुछ ही महीनों में टूट जाती हैं. घटिया सामग्री, कमीशन और रख-रखाव की कमी इसके कारण हैं.

छोटे शहरों में ट्रैफिक जाम रोज का संकट बन गया है. सड़क की खराब डिजाइन, संकरी गलियां, सिग्नल की कमी और अव्यवस्थित चौराहे, साथ ही भ्रष्ट ट्रैफिक पुलिस मिलकर जाम पैदा करते हैं, जिससे समय और ईंधन की बर्बादी होती है. एंबुलेंस रेंगती रहती हैं और मरीज मर जाते हैं. विफलता की बदबू हर जगह फैली है. कचरे के ढेर सड़कों और फुटपाथों को जाम कर देते हैं, क्योंकि नगर निकायों के पास कचरा प्रबंधन का कोई ठोस समाधान नहीं है, जबकि रियल एस्टेट का विस्तार लगातार निर्माण मलबा और घरेलू कचरा बढ़ा रहा है. जिस स्वच्छ भारत मिशन को कभी परिवर्तनकारी बताया गया था, वह अब बुरी तरह विफल हो चुका है. इसके सेलिब्रिटी ब्रांड एंबेसडर और स्वयंसेवक गायब हो गये हैं.

बड़े शहरों के लैंडफिल साफ नहीं हुए, कचरे का अलगाव असंगत है, और प्रसंस्करण के दावे केवल भरे हुए कचरा स्थलों और जहरीले रिसाव को छिपाते हैं. बड़े शहर स्वच्छता सर्वेक्षणों में लगातार खराब प्रदर्शन करते हैं. विदेशी पर्यटक भारत आने से बचते हैं या अपनी यात्रा जल्दी समाप्त कर देते हैं, क्योंकि उन्हें हर जगह गंदगी का सामना करना पड़ता है. उस स्मार्ट सिटीज मिशन को लगभग भुला दिया गया है, जिसका उद्देश्य 100 शहरों को आधुनिक बनाना था. वर्ष 2025 की शुरुआत तक 1.5 लाख करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद केवल कुछ शहर ही वास्तविक परिवर्तन हासिल कर पाये. एक रिपोर्ट के अनुसार, बड़े भारतीय शहरों में केवल नौ से 20 फीसदी फुटपाथ ही मानकों पर खरे उतरते हैं. अधिकांश फुटपाथ अवैध कब्जों से भरे हैं. अवैध निर्माण शहरों को भीतर से खत्म कर रहा है. कई शहरों में हर साल स्वीकृत इमारतों से अधिक अवैध इमारतें बनती हैं. ये सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करती हैं और इनमें आपातकालीन निकास नहीं होते.

पिछले साल केवल दिल्ली में 4,766 अवैध निर्माण दर्ज किये गये और हजारों ध्वस्तीकरण आदेश जारी किये गये. देशभर में घटिया या अवैध इमारतों के कारण हजारों मौतें हुई हैं. वर्ष 2024 में आग की 5,971 घटनाओं में 5,888 लोगों की मौत हुई, यानी हर दिन लगभग 16 मौतें. हर दुर्घटना के बाद कुछ दिनों तक कार्रवाई होती है और फिर सब शांत हो जाता है. बाबू, ठेकेदार और नेताओं का गठजोड़ दोषियों को बचा लेता है. इस पूरे तंत्र के केंद्र में भारतीय नौकरशाही है, जिसे लगभग पूरी सुरक्षा प्राप्त है. ये अधिकारी एयरकंडीशंड दफ्तरों में बैठे रहते हैं और पदोन्नति व लाभ पाते रहते हैं, जबकि शहर बदहाल होते जाते हैं. ये अवैध निर्माणों को मंजूरी देते हैं, नालों की दशकों से सफाई नहीं करते, खराब सड़क परियोजनाओं को मंजूरी देते हैं और कचरा व अतिक्रमण की समस्या को नजरअंदाज करते हैं. जब नागरिक गंदगी में डूबते हैं, करंट से मरते हैं या आग में अपने प्रियजनों को खोते हैं, तब भी ये अधिकारी अपनी नौकरी में आगे बढ़ते रहते हैं.

सरकारी रिपोर्टों ने भी शहरों की खराब स्थिति उजागर की है. कुल 4,589 शहरी निकायों के मूल्यांकन में 3,642 को कचरा मुक्त शहर मानक में शून्य अंक मिले. ये संस्थाएं उसी गिरावट पर फलती-फूलती हैं, जो वे स्वयं पैदा करती हैं. लेकिन आम नागरिक भी उतने ही जिम्मेदार हैं. लोग अपने घर साफ रखते हैं, लेकिन सड़कों पर कचरा फेंकते हैं, अवैध निर्माण करते हैं और अतिक्रमण करते हैं. नागरिक खुद गंदगी और भ्रष्टाचार फैलाकर सिस्टम से जवाबदेही की मांग नहीं कर सकते. अवैध निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध, सख्त सजा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई आवश्यक है. केंद्र सरकार को सख्त नियम लागू करने चाहिए और प्रदर्शन के आधार पर फंड देना चाहिए. अधिकारियों और नागरिक, दोनों को जवाबदेह बनाना होगा. बिना कड़े कदमों के भारत दुनिया के सबसे गंदे देशों में गिना जायेगा. भारतीय शहर सचमुच और प्रतीकात्मक रूप से डूब रहे हैं. मॉनसून फिर आयेगा. सवाल यह है कि क्या भारत अगली त्रासदी से पहले जागेगा. अब बहानों का समय समाप्त हो चुका है और सख्त जवाबदेही का समय आ चुका है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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