कर्नाटक चुनाव से निकलते संदेश

कांग्रेस के पास जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता होने के साथ-साथ राज्य में अनुभवी नेतृत्व है. भाजपा में ऐसे नेतृत्व का अभाव था. पार्टी ने पहले येदियुरप्पा को आयु के आधार पर किनारे किया, फिर उन्हें वापस बुलाया गया, पर वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार या उम्मीदवार नहीं थे

कोई भी चुनावी नतीजा अहम होता है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इसमें स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय मसलों पर चर्चा हुई. भाजपा ने जहां हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और केंद्र व राज्य में एक ही पार्टी के शासन से होने वाले लाभ जैसे मुद्दों पर अपना प्रचार केंद्रित किया, वहीं कांग्रेस ने मुख्य रूप से स्थानीय मुद्दों- भ्रष्टाचार एवं बेरोजगारी हटाने तथा समाज के गरीब तबकों के लिए कल्याण योजनाओं को लाने को जोर-शोर से उठाया.

कांग्रेस के पास जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता होने के साथ-साथ राज्य में अनुभवी नेतृत्व है. भाजपा में ऐसे नेतृत्व का अभाव था. पार्टी ने पहले येदियुरप्पा को आयु के आधार पर किनारे किया, फिर उन्हें वापस बुलाया गया, पर वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार या उम्मीदवार नहीं थे. यहां यह प्रश्न उठता है कि 75 साल से अधिक आयु के नेताओं को सक्रिय राजनीति से हटाने की भाजपा की नीति कितनी कारगर है. अगर कोई नेता स्वस्थ है और उसमें योगदान देने की क्षमता है, तो उसे अवसर दिया जाना चाहिए.

इस चुनाव में जिस प्रकार एक समुदाय विशेष को निशाने पर लिया गया और उसे कटघरे में खड़ा किया गया, उसे राज्य की जनता ने पूरी तरह नकार दिया है. कांग्रेस ने कहा कि वह सत्ता में आयी, तो बजरंग दल जैसे संगठनों पर पाबंदी लगायी जायेगी, जिनके खिलाफ कई आरोप हैं. इस वादे को सांप्रदायिक रंग देते हुए बजरंगबली से जोड़ दिया गया. जनता ने ऐसी राजनीति को खारिज कर दिया है.

दुनियाभर में कट्टरवाद, आतंकवाद और नफरत फैलाने वाले समूह धार्मिक प्रतीकों और बातों को अपना जरिया बनाते हैं, पर वास्तव में इनका धर्मों की मूल अवधारणाओं और संदेशों से कोई लेना-देना नहीं होता है. मुझे लगता है कि कर्नाटक ने इस बात को बखूबी समझा है. कर्नाटक की बहस में एक अहम पहलू पर कम ही ध्यान दिया जाता है. वह है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का व्यक्तित्व. कांग्रेस अध्यक्ष अपने गृह प्रदेश में चुनाव जीते, यह बात भले सामान्य लगे, पर यह अब से पहले बहुत पुरानी बात हो गयी थी.

राजीव गांधी जब अध्यक्ष थे, तब उत्तर प्रदेश में पार्टी सत्ता से बाहर हो गयी थी. पीवी नरसिम्हा राव के अध्यक्ष रहते यही हाल आंध्र प्रदेश में हुआ था. सीताराम केसरी के दौर में बिहार में कांग्रेस का उद्धार नहीं हो सका था. सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समय उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की क्या स्थिति रही है, हम सब जानते हैं.

विधानसभा के आगामी चुनावों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पहले भी चुनाव हारती रही है, पर उसका मनोबल नहीं टूटता था और उसे लगता था कि सत्ता में उसकी वापसी हो जायेगी, लेकिन 2014 के बाद उसका हौसला लगातार पस्त होता गया. इस मनोदशा से निकलना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती थी. इस संदर्भ में मुझे लगता है कि कर्नाटक की जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी है.

पार्टी ने इस चुनाव में जनता दल (एस) या किसी भी दल से कोई घोषित-अघोषित समझौता नहीं किया था. अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा, तो राष्ट्रीय स्तर पर उसकी शक्ति बढ़ेगी. राजस्थान में कांग्रेस की मुख्य समस्या पार्टी के भीतर की उठापटक ही है, भाजपा नहीं. इन राज्यों में कांग्रेस की जीत के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को कड़ी चुनौती मिल सकती है.

अनेक राज्यों की स्थिति बदल रही है. जैसे, पिछले आम चुनाव में कर्नाटक में 28 सीटों में से 24 पर जीत मिली थी. अगले साल वह कम-से-कम 15 सीटें खो सकती है. ऐसा ही महाराष्ट्र, बंगाल और बिहार में संभावित है. यह भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है.

जीत-हार के विश्लेषण से परे हमें राजनीति के उस दुर्भाग्यपूर्ण पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए कि देश, राज्य और जनता के असली मसले राजनीतिक बहस के केंद्र में नहीं आ पाते हैं. कर्नाटक चुनाव के बाद भी हमें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि हमारी राजनीति का नैरेटिव बदल जायेगा. भाजपा को अपनी रणनीति पर पूरा भरोसा है और वह उससे पीछे नहीं होगी. लेकिन उसे आत्ममंथन करना चाहिए.

कर्नाटक में आम आदमी पार्टी ने करीब दो सौ उम्मीदवार खड़े किये थे, पर अरविंद केजरीवाल ने वहां कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने भी उन्हें मदद का वादा किया था, पर वे भी चुप रहे. लेफ्ट और अनेक छोटे दल भी शांत रहे. ऐसी रणनीतियों पर अन्य राज्यों में भी काम हो सकता है, जो भाजपा के लिए घातक सिद्ध होगा.

केंद्र सरकार ने जिस तरह से विभिन्न पार्टियों के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की है, उससे उन दलों का कांग्रेस के साथ एक समझदारी बन रही है. भाजपा के विरुद्ध बड़ा मोर्चा बनाने की कवायद में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगे हुए हैं. खरगे में क्षमता है कि वे कांग्रेस के साथ अन्य दलों को जोड़ सकें. आगामी महीनों में स्थितियां और स्पष्ट होंगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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