आपसी लड़ाई से मीडिया को नुकसान

प्रसारण और सोशल मीडिया पर आवाज उठने से सरकार को कहां नुकसान होनेवाला है. इसलिए, आपसी लड़ाई के दौरान भविष्य को ध्यान में रख सबको तय करना होगा- आत्म अनुशासन या सरकारी लगाम?

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार

alokmehta7@hotmail.com

आपने मुर्गों को लड़ते-लड़ाते देखा है. कबूतर-कौव्वे से लेकर शेर-हाथी तक, सब को लड़ते देखा होगा. सामान्यतः घोड़ों को लड़ते कम देखा जाता है. लड़ाई से किसी को क्या मि��ा है और मिलेगा, लेकिन इन दिनों समाज, देश-दुनिया को शांति सद्भावना का संदेश देने वाले कुछ टीवी मीडिया चैनल, संपादक या स्वतंत्र रूप से सोशल मीडिया पर सक्रिय पूर्व संपादक, पत्रकार और साहित्य-संस्कृतिकर्मी सार्वजनिक रूप से झगड़ ही रहे हैं. राजनीतिक विचारधारा, सत्ता या प्रतिपक्ष से जुड़ाव को लेकर मतभेद हो सकता है, लेकिन प्रतियोगिता अथवा निजी नाराजगी में एक-दूसरे को अपराधी, देशद्रोही तक करार देने से क्या किसी को लाभ हो सकेगा?

संविधान ने प्रत्येक भारतीय नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है. सभी समाचार माध्यम उसी अधिकार का लाभ पाते हैं. कुछ नियम- प्रावधान मीडिया के लिए बनते-बदलते रहे हैं. इसलिए, इन दिनों मीडिया के कई दिग्गज, राजनेता, सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग और सामान्य जनता का एक वर्ग मीडिया पर नियंत्रण, लक्ष्मण रेखा की बात कर रहा है. यह बात पिछले पांच दशकों में उठती और दबायी जाती रही है.

वर्षों से पत्रकारिता में होने के कारण मैं इन दबावों और प्रयासों को देखता, समझता और झेलता रहा हूं. वर्तमान संदर्भ में, टीवी मीडिया को लेकर गंभीर बहस छिड़ गयी है. वे क्यों सुशांत-रिया प्रकरण या चीन-भारत विवाद या कोरोना महामारी को दिन-रात अतिरंजित ढंग से दिखा रहे हैं? प्रतियोगिता में एक-दूसरे से मार-काट क्यों कर रहे हैं? कौन किस विषय को कितना दिखाए, यह तय कौन करेगा? बात 2006 की है. तब मैं एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष और वरिष्ठ संपादक सच्चिदानंद मूर्ति महासचिव थे. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी. सरकार ने मीडिया के लिए ब्रॉडकास्ट नियामक विधेयक तैयार किया. इससे पहले केवल केबल प्रसारण के नियमन के लिए कुछ नियम-कायदे बने हुए थे, लेकिन कांग्रेस के कुछ बड़े नेता और मंत्री टीवी चैनलों की बढ़ती संख्या और उपभोक्ता अधिकार के बहाने संपूर्ण इलेट्रॉनिक मीडिया को कड़े कानून में बांधना चाहते थे.

इस विधेयक में भारत के सभी सरकारी, स्वायत्त और निजी रेडियो, टीवी चैनल के प्रसारण के विषय, लिखी, बोली और दिखायी जाने वाली सामग्री तक पर सरकार की निगरानी का प्रावधान था. मेरे तथा वरिष्ठ संपादक बीजी वर्गीज, कुलदीप नय्यर, मामन मैथ्यू सहित पत्रकारों की नजर में यह प्रस्तावित कानून आपातकाल के सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक था. इससे पहले प्रिंट माध्यम के लिए बिहार में लाया गया कानून या राजीव गांधी के समय आये प्रेस कानून का एडिटर्स गिल्ड, पत्रकार संगठनों और प्रतिपक्ष ने भी विरोध किया था. इसलिए मनमोहन सरकार के प्रस्तावित विधेयक को कानूनी रूप मिलने से पहले हमने कड़ा विरोध अभियान शुरू कर दिया. गिल्ड के पदाधिकारी के नाते मंत्रियों, सूचना प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार (पूर्व पत्रकार भी) आदि के साथ बैठकें हुईं. इससे सरकार कुछ संशोधन पर विचार करने लगी.

संपादकों ने भी वार्ताओं का सिलसिला जारी रखा. इस नये संकट में एडिटर्स गिल्ड ने सुझाव दिया कि किसी सेवा निवृत्त वरिष्ठ न्यायाधीश के मार्गदर्शन में समाचार चैनल के संपादकों का एक सहयोगी संगठन स्वयं अपनी आचार संहिता तय करेगा. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा को यह दायित्व सौंपा गया. इस तरह महीनों के कड़े विरोध, बातचीत और प्रस्तावों से उस विधेयक को सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. एडिटर्स गिल्ड में जब हरि जयसिंह अध्यक्ष और मैं महासचिव था, तब संपादकों के लिए एक आचार संहिता बनायी गयी थी और राष्ट्रपति डॉक्टर कलाम ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आकर उसे जारी किया था. इसी तर्ज पर, 2007 में टीवी संपादकों, खासकर प्रसारण के लिए नियम, आचार संहिता बनायी गयी. प्रेस परिषद ने भी अनेक नियम औरर आचार संहिता बनायी है, लेकिन कानूनी रूप से उसका दायरा प्रिंट मीडिया तक ही सीमित रहा है.

परिषद या संपादकों की आचार संहिताओं में किसी सजा का प्रावधान नहीं है. यानी, इसे अपने जीवन मूल्यों की तरह स्वयं अपनाये जाने की अपेक्षा की जाती है. इस पृष्ठभूमि में आज भी यह प्रश्न है कि प्रकाशन या प्रसारण की सामग्री और प्राथमिकता कौन तय करे? अपराध कथा को प्राथमिकता मिले या राजनीतिक, आर्थिक, मनोरंजक, व्यापारिक, फिल्मी, क्रिकेट या कबड्डी को? कौन कितनी देर क्या दिखाए या बोले, इसे कौन तय करे. हम सब शुचिता के साथ स्वतंत्रता को आवश्यक मानते हैं, लेकिन एक-दूसरे को नीचा दिखा कर क्या हम सरकार को प्रसारण नियामक कानून बनवाने के लिए निमंत्रित करना चाहेंगे? सत्ता तो आती-जाती रहती है, कानून हमेशा रहेगा.

भारत के पुराने प्रेस कानून में संशोधन के एक प्रस्ताव पर विचार-विमर्श जारी है. प्रसारण और सोशल मीडिया पर आवाज उठने से सरकार को कहां नुकसान होनेवाला है. हां, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आवाज उठाने वाले ही घायल होंगे और सामान्य नागरिक भी अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी नियामक व्यवस्था से चुनी गयी सामग्री ही ग्रहण कर सकेंगे. इसलिए, आपसी लड़ाई में भविष्य का ध्यान रख सबको तय करना होगा- आत्म अनुशासन या सरकारी लगाम? (ये लेखक के निजी विचार हैं.

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