गांधी जी स्थानीय उत्पादों का उपयोग जरूरी मानते थे

Mahatma Gandhi : गांधी की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए हमें पहले यह देखना चाहिए कि अपने कामकाज से गांधी ने कितना कुछ हासिल किया था, उनके समाज और दुनिया ने कितना कुछ हासिल किया था. सत्याग्रह के राजनैतिक हथियार का प्रयोग दक्षिण अफ्रीका से लेकर आजादी मिलने तक ही नहीं, आज भी हो रहा है.

Mahatma Gandhi : महात्मा गांधी राजनीति और जीवन में नैतिकता स्थापित करने का प्रयास करने वाले महापुरुष थे. वह हर तरह के अन्याय और भेदभाव से लड़ते रहे, लड़ाई को अहिंसक रखा और अहिंसक लड़ाई का प्रशिक्षण भी दिया. महावीर और बुद्ध के समय से ही अहिंसा हमारी विशेषता थी, लेकिन प्रशिक्षण और सामूहिक आचरण का विषय बनाकर गांधी ने इसे राजनैतिक अन्याय खत्म करने का हथियार बनाया. सत्याग्रह आज भी दुनियाभर में लोकप्रिय है.

गांधी ने सादगी और किफायत को भी जीवन में बहुत महत्व दिया. जरूरत से ज्यादा सामान रखने को वह चोरी बताते थे. सत्याग्रही के जीवन में इंद्रियों पर नियंत्रण को वह बहुत महत्व देते थे, भले हम आज जीभ पर नियंत्रण वाले पक्ष को भूलते गये हैं. शारीरिक श्रम को महत्व देने वाले गांधी स्थानीय उत्पादों का उपयोग ही जरूरी मानते थे. वह बुराई से नफरत करते थे, बुरे लोगों से नहीं. स्वदेशी और सर्व धर्म समानता भी उनका दर्शन था.


गांधी की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए हमें पहले यह देखना चाहिए कि अपने कामकाज से गांधी ने कितना कुछ हासिल किया था, उनके समाज और दुनिया ने कितना कुछ हासिल किया था. सत्याग्रह के राजनैतिक हथियार का प्रयोग दक्षिण अफ्रीका से लेकर आजादी मिलने तक ही नहीं, आज भी हो रहा है. गांधी के बाद कई बार भूख हड़ताल राजनैतिक नौटंकी में बदली. पर पोलैंड के लेख वालेसा हों, बर्मा की आंग सान सू की हों या दक्षिण अफ्रीक के नेल्सन मंडेला, अमेरिका के मार्टिन लूथर जू हों या फिलीस्तीन के लोग-सबको अहिंसक सत्याग्रह ही अन्याय से प्रतिकार का उपकरण लगा.

आज भी वैश्विक अन्याय के खिलाफ यह लोकप्रिय हथियार है. गांधी के बाद खादी का आंदोलन कमजोर पड़ा है, पर भूमंडलीकृत दुनिया में स्वदेशी का महत्व किसी के लिए कम नहीं हुआ है. गांधी के अनेक मूल्य दुनिया में मजबूत हुए, लोकतंत्र और सार्वभौम मताधिकार व्यवस्था के साथ भी जुड़े और आज कोई भी पिछले पचहत्तर साल में लोकतंत्र की प्रगति को गिन सकता है.


पर सब कुछ गांधी के अनुसार नहीं चल रहा, उनकी विरोधी प्रवृत्तियां भी बढ़ी हैं. माना जा रहा था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नक्शा बदलने का खेल दुनिया से खत्म हो गया है, पर आज यह खेल अमेरिका और रूस के नेतृत्व में नये सिरे से शुरू हुआ है. श्रीलंका, ईरान, नेपाल से लेकर बांग्लादेश तक में राजनैतिक आंदोलन हिंसक ढंग से ही चले हैं. केंद्रीयकरण बढ़ा है और जल्दी सड़ने-गलने वाली चीजों को भी जबरन रसायनों और कूलिंग के जरिये दुनिया के एक कोने से दूसरी जगह बेचने का खेल चल रहा है. गैर जरूरी सामान बिकवाने-खपाने में कंपनियां और विज्ञापन एजेंसियां ही नहीं, सरकारें भी लगी हैं.

साफ पानी और हवा भी बेची जाने लगी है. इस चक्कर में प्रदूषण एक नया मर्ज बनकर आया है, जो गांधी के समय इतना खतरनाक न था. और लोभ तथा तृष्णा के चलते हम न सिर्फ अपना स्वाभिमान खो रहे हैं, बल्कि निर्भयता गंवाते जा रहे हैं. शारीरिक श्रम कम करने से बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं. इसलिए जब तक गांधी के स्थापित मूल्य या लक्ष्य पूरे नहीं होते, जब तक उनकी लड़ाई अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचती, उनकी प्रासंगिकता खत्म कैसे हो सकती है? उनके जाने के बाद हमें भ्रम था कि उनके लोग सब कुछ संभाल लेंगे.

आजादी मिल ही गयी है और खद्दर जैसा अभियान बड़ा बन गया है. पर गांधी के न रहने का असर साफ समझ में आने लगा. अब लग रहा है कि गांधी के न रहने के क्या-क्या दुष्प्रभाव हुए हैं. उस मुहिम के कमजोर पड़ने से सांप्रदायिक एकता या छुआछूत जैसी बीमारियां भी दूर होने की जगह बढ़ती गयी हैं. प्रदूषण और उपभोक्तावाद बेलगाम हुए हैं. युद्ध और हिंसा नये सिरे से प्रभावी होने की कोशिश में हैं. झूठ बोलना आज के सिरमौर लोगों का शौक बन गया है और अमेरिकी राष्ट्रपति तक को शर्म नहीं आती, जब लोग उनके झूठ गिनकर बताते हैं.


यह भी लगता है कि बार-बार गांधी की प्रासंगिकता का सवाल उठाकर हम कहीं न कहीं अपनी बेचैनी प्रदर्शित करते हैं. यह हमारी काहिली का भी प्रमाण है. और इधर गांधी की सोच और काम के विरोध वाली प्रवृत्तियां तेज होती जा रही हैं. दुखद यह है कि गांधी के विरोधी भी गांधी की प्रासंगिकता को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं, क्योंकि गांधी के शरीर को नष्ट करने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. अंध-उपभोगवाद, अनैतिकता, हिंसा, नफरत, युद्ध के जरिये सारी दुनिया और पृथ्वी का भोग करने वाली मानसिकता प्रबल हो रही है. गांधी ने कहा ही था कि पृथ्वी हरेक आदमी की जरूरतें पूरी कर सकती है, लेकिन एक आदमी के भोग की इच्छा पूरी नहीं कर सकती. हम इस स्थिति को देख-समझ कर ही गांधी को ज्यादा याद कर रहे हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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