वंचितों-आदिवासियों की मां थीं महाश्वेता देवी, पढ़ें डाॅ कृपा शंकर चौबे का आलेख
Mahasweta Devi: आदिवासियों के लिए महाश्वेता देवी जितना बन पड़ता, काम करतीं. वंचितों-आदिवासियों की कोई समस्या उनकी कई रातों की नींद उड़ा ले जाती थी. उनका लेखन शोषित, शासित आदिवासी समाज और उत्पीड़ित दलितों पर केंद्रित रहा.
Mahasweta Devi: आम लेखक-लेखिकाओं से महाश्वेता देवी का जीवन और साहित्य भिन्न था. झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासियों और शोषितों की व्यथा-कथा लिखने वाली महाश्वेता लेखक के सक्रिय सामाजिक हस्तक्षेप में भरोसा रखती थीं और अपने को चौबीसों घंटे व्यस्त रखती थीं. आदिवासियों के बीच उन्होंने 1965 में काम शुरू किया था और मृत्यु पर्यंत उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्षरत रहीं. उनकी लड़ाई मैक्लुस्कीगंज से आरंभ हुई थी. आदिवासियों की पीड़ा देखतीं तो उनके जंग में शामिल हो जातीं. उन्होंने जिस तरह पलामू में बंधुआ मुक्ति समिति के बैनर तले लड़ाई में भाग लिया, वैसी ही लड़ाई उन्होंने पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में लोधा शबर आदिवासियों और पुरुलिया में खेड़िया शबर आदिवासियों के लिए कल्याण समिति बनाकर लड़ी.
वंचितों-आदिवासियों की कोई समस्या उनकी कई रातों की नींद उड़ा ले जाती थी. एक बार नामवर सिंह समेत हिंदी के कुछ लेखक उनसे मिलने उनके घर आये. उनसे वह बातें कर रही थीं, इसी बीच कुछ आदिवासी अपनी समस्या लेकर आये. महाश्वेता दी हिंदी लेखकों को छोड़कर आदिवासियों की समस्या सुनने चली गयीं. बीसवीं शताब्दी की सांध्य वेला में उन्होंने घुमंतू जनजातियों के मानवाधिकारों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर मुंबई के लक्ष्मण गायकवाड, वड़ोदरा के जीएन देवी और तुलसी बोदा के साथ मिलकर डिनोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब्स राइट एक्शन ग्रुप बनाकर संघर्ष किया. उसी समय पुरुलिया में पुलिस हिरासत में बुधन शबर नामक आदिवासी की मौत हुई थी. महाश्वेता देवी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखा. उस पत्र को अदालत ने याचिका मान लिया और बुधन की हत्या के लिए राज्य सरकार को फटकार लगायी और बुधन के परिजनों को मुआवजा देने का आदेश दिया.
उन्होंने मैगसेसे, ज्ञानपीठ आदि से मिली पुरस्कारों की राशि पुरुलिया के आदिवासियों को दान कर दी थी. उन्हें आदिवासी अपनी मां मानते थे. आदिवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने सड़क पर उतरकर संघर्ष ही नहीं किया, अपने साहित्य में भी सदियों से मुख्यधारा से बाहर धकेली गयी आदिवासी अस्मिता के प्रश्न को शिद्दत से उठाया. उनके उपन्यासों- ‘जंगल के दावेदार’, ‘शालगिरह की पुकार पर’, ‘टेरोडेक्टिल’, ‘चोट्टि मुंडा और उसका तीर’, ‘अग्निगर्भ’ और कहानियों- ‘बाढ़’, ‘बांयेन, ‘शाम सवेरे की मां’, ‘शिकार’, ‘बीज’, ‘मूल अधिकार और भिखाली दुसाध’, ‘बेहुला’ और ‘द्रौपदी’ में आदिवासी समाज की चिंता बांग्ला साहित्य में पहली बार प्रकट हुई. उनकी रचनाएं जब हिंदी व दूसरी भाषाओं में अनूदित हुईं, तो लेखिका की आदिवासी चिंता एक अखिल भारतीय चिंता बन गयी. वे अपनी कथाकृतियों में आदिवासी समाज को शोषण, दोहन और उत्पीड़न से मुक्त कराते संघर्षशील नायकों का संधान करती हैं. अपने उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ (हिंदी में ‘जंगल के दावेदार’) में बताती हैं कि बिरसा भगवान का विद्रोह सिर्फ अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं था, अपितु समकालीन सामंती व्यवस्था के विरुद्ध भी था. वर्ष 1979 में जब इस पुस्तक के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, तो आदिवासियों ने जगह-जगह ढाक बजा-बजाकर गाया था- ‘हमें साहित्य अकादेमी मिला है.’
साहित्य अकादेमी पाने पर उन्हें लगा कि आदिवासियों के बारे में उनका दायित्व और बढ़ गया है. उन्होंने उनके लिए यथासंभव काम करते जाने की कोशिश जारी रखी. जितना बन पड़ता, काम करतीं. आदिवासी इलाकों में जातीं, उनके सुख-दुख में शरीक होतीं. उनका लेखन शोषित, शासित आदिवासी समाज और उत्पीड़ित दलितों पर केंद्रित हो गया. न्यूनतम मजदूरी, मानवीय गरिमा, सड़क, पेयजल, अस्पताल, स्कूल की सुविधा से वंचित भूमिहीन होने को अभिशप्त इन आदिवासियों और दलितों को आजादी के इतने वर्ष बाद भी न्याय नहीं मिला है. यही महाश्वेता की चिंता के कारण बनते हैं. उनके भीतर की वेदना को ‘टेरोडेक्टिल’ उपन्यास की चंद पंक्तियों में देखा जा सकता है, जब एक पात्र कहता है, ‘उनका प्राप्य क्या था, इसे जाने बिना ही आदिवासी अपनी प्रेतछाया से ढकी जिंदगियां लेकर इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर जायेंगे.’ ये एक-एक शब्द महाश्वेता के भीतर खौल रहे हैं, तो इसलिए कि आदिवासियों के जीवन संग्राम को उन्होंने निकट से देखा था. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
