कोरोना के संग ही अब जीना

वर्ष 2020 की शुरुआत पूरे विश्व के लिए अच्छी नहीं रही. पिछले वर्ष केअंतिम दिनों से ही कोरोना वायरस जनित रोग कोविड-19 के मनहूस साये नेधीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया

विजय कुमार चौधरीअध्यक्ष, बिहार विधानसभा

vkumarchy@gmail.com

वर्ष 2020 की शुरुआत पूरे विश्व के लिए अच्छी नहीं रही. पिछले वर्ष केअंतिम दिनों से ही कोरोना वायरस जनित रोग कोविड-19 के मनहूस साये नेधीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपने चपेट में ले लिया. भारत में इसकी धमक तोफरवरी महीने में सुनी गयी. परंतु, मार्च आते ही इस महामारी ने भारत कोशिकंजे में लेना शुरू कर दिया. मार्च महीना होने के नाते संसद, विभिन्नविधानसभाओं का बजट-सत्र चालू था. इस कारण आर्थिक गतिविधियां भी चरम परहोती हैं. ऐसे समय में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए भारत सहित पूरीदुनिया ‘लॉकडाउन’ में थम गयी.कोरोना वायरस की उत्पत्ति, इसकी घातक क्षमता और निदान सभी कुछ अनिर्णीतएवं अनिश्चित है. लेकिन, इसके संक्रमण के तेजी से फैलने की प्रकृति पूरीदुनिया में निर्विवादित एवं सर्वमान्य है. इससे और स्पष्ट हो जाता है किइस बीमारी के विभिन्न चरणों का निर्धारण भी इसके फैलाव की प्रकृति एवंगति के आधार पर ही किया गया है.

किसी निश्चित उपचार के अभाव में‘लॉकडाउन’ एवं ‘सोशल-डिस्टेंसिंग’ से ही इसके विस्तार को रोकने की रायविश्वभर के विशेषज्ञों ने दी.कोविड-19 के उत्पत्ति स्थल के संबंध में कोई संशय नहीं है. चीन ने खुदस्वीकार किया कि ‘वुहान’ से इसकी शुरुआत हुई है. यह रोग पशु-पक्षी मेंउत्पन्न होकर मनुष्य में फैलता है. संभावित स्रोत के बारे में समुद्रीजीव-जंतु, चमगादड़, सूअर एवं पेंगोलिन आदि के संबंध में चर्चा हुई, परंतुकोई निश्चित धारणा अभी तक नहीं बन पायी है. दुनिया जानती है कि वुहान मेंविषाणु विज्ञान से संबंधित अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक प्रमुख शोध संस्थानहै. चीन द्वारा गोपनीय तरीके से जैविक हथियार से संबंधित अनुसंधान केदौरान कोरोना की उत्पत्ति एवं विस्तार की बात भी जोर-शोर से आयी. चीनहमेशा से ही अंतरराष्ट्रीय मामलों में नकारात्मक बातों को छिपाने एवंसकारात्मक प्रगति की शेखी बघारने एवं दुनिया पर धौंस जमाने की नीतिअपनाता रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि इस मामले में चीन काव्यवहार गैर जिम्मेदाराना ही नहीं, बल्कि आपराधिक लापरवाही का रहा.

चीनके इस कृत्य से दुनिया कैसे निबटेगी, यह तो भविष्य बतायेगा. परंतु, भारतके परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट है कि यहां प्रारंभ से ही इस महामारी केप्रति चौकस होने के साथ-साथ भय का माहौल भी बन गया. कोविड-19 से ग्रस्तहोने की सोच ही लोगों के मन में हीन भावना उत्पन्न कर देती है. नतीजतन,लोग इसकी जांच से ही घबराने लगे.बिहार सहित पूरे देश के लोग सामान्य वायरस के संक्रमण से अपरिचित नहींहैं. बुखार, बदन-दर्द, हल्की सर्दी इत्यादि इसके लक्षण के रूप में पहचानेजाते रहे हैं. एक बार संक्रमित हो जाने पर इसके तीन से पांच दिन की अवधिमें इससे छुटकारा पाने की बात भी सब जानते हैं. ग्रामीण इलाके में भी‘वायरल फीवर’ के प्रति जागरूकता रही है. संपर्क-संक्रमण की बात भी सब लोगसमझते हैं. इन बीमारियों से संक्रमित लोगों के संपर्क में आने से परहेजएवं दूरी बनाकर रखना हमारी पुरानी मान्यता है.

गौरतलब है कि इसी काआधुनिक रेखांकित एवं परिमार्जित रूप सोशल डिस्टेंसिंग की अवधरणा है.जिनके शरीर का इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, उनके लिए जोखिम अधिक होताहै. दूसरी तरफ, संक्रमित लोगों के कुछ दिन ‘आइसोलेशन’ में रहने से इससेप्रायः छुटकारा मिल जाता है. इसकी कोई खास दवा निश्चित नहीं है और बिनादवा के भी लोग संक्रमण से मुक्त हो जाते हैं. बिहार में कोरोना से हुईचार मौतों के मामले में यह देखा गया है कि मृत्यु के समय ये लोग कोरोनासे प्रभावित जरूर थे, परंतु किडनी या हृदय रोग के साथ कैंसर जैसे असाध्यरोग से ये पीड़ित थे. किसी अन्य गंभीर रोग से ग्रसित होने की स्थिति मेंइस बीमारी के घातक होने की स्पष्ट संभावना बनी रहती है. अपने शरीर कीप्रतिरोधक क्षमता के बारे में हम इत्मीनान नहीं हो सकते. अतः अपने कोस्वस्थ्य एवं सुरक्षित समझने की असावधानी महंगी पड़ सकती है.अब इस चुनौतीपूर्ण स्थिति को आध्यात्मिक एवं कुदरती व्यवस्था के नजरियेसे देखा जाय, तो कुछ चीजें उभरकर सामने आती हैं.

एक तरफ, मानव-जातिविज्ञान के क्षेत्र में नये-नये अनुसंधानों और उपलब्धियों के बल पर पूरेब्रह्मांड में अपनी पहुंच बना रहा है. वहीं दूसरी तरफ, प्रकृति के एकसूक्ष्म सृजन, जिसे हम आंखों से देख भी नहीं सकते, उसने पूरी दुनिया कोघरों में कैद कर दिया. आज मनुष्य के साथ विज्ञान भी विवश है. सारी दुनियाइसकी रोग निरोधी वैक्सीन के आविष्कार के इंतजार में है.दूसरे, प्राकृतिक संसाधनों के असीमित शोषण से उत्पन्न जलवायु संकट कीचर्चा दुनिया में है. प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के अत्यधिक दोहन सेउत्पन्न पर्यावरणीय संकट से निपटने एवं इसके निराकरण के उपायों की चर्चाभी विश्वभर में चल रही है. कई दृष्टिकोण से जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणसंरक्षण के मुद्दे पर बार-बार मंथन के बावजूद कोई प्रभावी निदान नहीं होपा रहा है. दुनिया कोई सकारात्मक पहल नहीं कर पायी, तो आज कोरोनाजन्यनिषेधात्मक परिस्थितियां हमें भविष्य के लिए रोशनी दिखा रही हैं. आजलॉकडाउन एवं सामाजिक दूरी से प्रकृति पुनर्जीवित हो रही है.

पर्यावरणीयआंकड़े बता रहे हैं कि हवा-पानी के साथ संपूर्ण पर्यावरण की शुद्धता मेंअंकनीय इजाफा हो रहा है. इसे प्राकृतिक चेतावनी के रूप में भी देखा जासकता है. कोरोना ने हमें एहसास कराया है कि भविष्य में हम किस प्रकारकुदरती संसाधनों का पुनर्भरण और प्रकृति को पुनर्जीवन दे सकते हैं. अंतमें इस कोरोना संकट के बाद की दुनिया की सोच एवं गतिविधियों में परिवर्तनअपेक्षित एवं लाजिमी है. कोरोना के खौफ का अंत होना तय है, क्योंकिकोरोना के फैलाव की शृंखला को हम पूरी तरह से तोड़ देंगे, यह महामारी भीअपनी स्वभाविक मौत मर जायेगी. लेकिन, इसके विषाणु अवशेष तो किसी-न-किसीरूप में पृथ्वी पर मनुष्य के साथ विद्यमान रहेंगे. आज तक किसी वायरस काउन्मूलन पूर्ण रूप से नहीं हो पाया है. इसका अानुवंशिक रूपांतरण भी होताही रहता है. अतः हमें अभी के परीक्षित उपायों एवं अनुभव के आधार परभविष्य का रास्ता बनाना है.(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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