ईरान की आग

ईरान पर इस्राइल-अमेरिका के हमले की आग अब ईरान समेत पूरे पश्चिम एशिया में जिस तरह फैलती जा रही है, वह बेहद चिंताजनक है. हमलों और जवाबी हमलों से नहीं, वार्ता और संवाद से ही इसका हल निकलेगा.

इस्राइल के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को खत्म तो कर दिया, लेकिन उनकी सत्ता के खिलाफ जिस किस्म के विरोध की उम्मीद ट्रंप कर रहे थे, वैसा फिलहाल नहीं दिख रहा. खामेनेई 1981 में ईरान के राष्ट्रपति बने थे, और 1989 में खुमैनी की मौत के बाद वह देश के सर्वोच्च नेता बने. सर्वोच्च नेता के रूप में खामेनेई ने ईरान को एक सख्त धार्मिक शासन वाला देश बनाया और उसे अमेरिका और इस्राइल का खुला विरोधी बना दिया. उनके शासन के दौरान ईरान पहले से ज्यादा ताकतवर हो गया. देश ने अपनी स्वदेशी तकनीक विकसित की और इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) को एक मजबूत सैन्य शक्ति बनाया.

देश के अंदर भी खामेनेई ने हर तरह के विरोध को सख्ती से दबाया. विगत दिसंबर-जनवरी में हुए बड़े प्रदर्शनों के दौरान भी हजारों लोग मारे गये थे. चूंकि खामेनेई के अलावा ईरानी शासन के वरिष्ठ सदस्यों की भी हत्या कर दी गयी है, ऐसे में, ईरान के राजनीतिक भविष्य पर सवाल हैं. इस बीच ईरान बनाम इस्राइल-अमेरिका की लड़ाई की आग लेबनान तक फैल गयी है. सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको की रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ है, तो कुवैत में ईरान के मिसाइल हमले में अमेरिका के कुछ फाइटर जेट क्रैश हुए हैं और कुछ अमेरिकी सैनिक मारे गये हैं.

कुवैत में अमेरिकी दूतावास पर भी ईरान ने हमला किया है. ऐसे में, फौरी तौर पर ट्रंप की ईरान नीति लक्ष्य से दूर दिखाई देती है. एक तरफ उन्होंने ईरानी जनता से देश वापस लेने की अपील की, दूसरी तरफ ईरान के साथ वार्ता का रास्ता फिर से खोलने की भी बात कही. लेकिन ईरान के शीर्ष अधिकारियों ने अमेरिका से किसी भी तरह की बातचीत की संभावना को खारिज कर दिया है. चूंकि ईरान में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में खामेनेई को निशाना बनाया गया है, जिसका लक्ष्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना रहा है, ऐसे में, अमेरिका वहां अपने समर्थक को सत्ता में देखना चाहेगा. लेकिन ईरान का विपक्ष अभी मजबूत नहीं हुआ है.

इसके अलावा ईरान की सेना (आइआरजीसी) के अधिकारी अब भी अपनी सरकार के लिए वफादार बने हुए हैं. जनवरी में हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी ईरान की सेना में बगावत देखने को नहीं मिली थी. ऐसे में, निकट भविष्य में ईरान में शांति और स्थिरता की उम्मीद तो दूर, पूरे पश्चिम एशिया के पटरी पर लौटने में समय लगेगा.

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Author: संपादकीय

Published by: Pritish Sahay

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