वैश्विक तबाही की दस्तक है ईरान की आग

Iran:क्या यह ईरानी संकट तीसरे विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है, या पहले से नाजुक वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के पतन को गति दे सकता है? ईरान की आग सिर्फ उसकी अपनी नहीं है. यह दुनिया के लिए चेतावनी है. भारत के लिए इसके दुष्परिणाम तात्कालिक और गंभीर हैं. ईरान के साथ 1.6-1.8 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार लगभग बंद हो गया है और भारतीय निर्यातकों की बड़ी रकम फंसी हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता- जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20 फीसदी प्रवाहित होता है- भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है.

Iran: इतिहास चेतावनी देता है. जब शासक अपने निजी अहंकार को देश की किस्मत समझने लगते हैं, जब महत्वाकांक्षा को महानता मान लिया जाता है, और जब बिना किसी रोक-टोक के सत्ता हासिल की जाती है, तो देश तबाही की ओर धकेल दिये जाते हैं. आज, वही जानी-पहचानी और खतरनाक स्थिति फिर सामने है. इस बार ईरान में. यह घरेलू उथल-पुथल और अंतरराष्ट्रीय टकराव के केंद्र में आ गया है, जिसके नतीजे पूरी दुनिया में महसूस किये जा सकते हैं. संकट के केंद्र में खामेनेई के नेतृत्व वाला शासन खड़ा है, जो वैधता के बजाय दमन के सहारे सत्ता से चिपका है. वैचारिक अहंकार की वेदी पर घरेलू अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ा दी गयी है. इस बीच बाहरी दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाजी और भी कठोर प्रतिबंधों की धमकियों से गूंज रही है. बीजिंग और मॉस्को रणनीतिक अवसर एवं वैचारिक सामंजस्य को भांपते हुए तेहरान के पीछे खड़े हो गये हैं तथा वाशिंगटन के खिलाफ ईरान के प्रतिरोध को मजबूत कर रहे हैं. इन परस्पर विरोधी शक्ति गुटों के बीच भारत खड़ा है- एक अत्यंत पीड़ादायक दुविधा में फंसा हुआ. वह भूगोल, ऊर्जा जरूरतों और क्षेत्रीय हितों के कारण ईरान को छोड़ नहीं सकता, पर अमेरिका और उसके सख्त होते प्रतिबंध तंत्र को चुनौती देने की स्थिति में भी नहीं है.

वाशिंगटन का संदेश स्पष्ट है. जो देश तेहरान के साथ संबंध जारी रखेंगे, उन्हें प्रतिबंधों और अतिरिक्त शुल्कों के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. नयी दिल्ली संकेतों को सावधानी से पढ़ते हुए पहले ही अपनी रणनीति में बदलाव शुरू कर चुकी है. भारतीय नागरिकों को तत्काल ईरान छोड़ने की सलाह दी गयी है. चाबहार बंदरगाह परियोजना को लेकर रणनीतिक उत्साह भी ठंडा पड़ गया है. जैसे-जैसे तनाव बढ़ता जा रहा है, एक सवाल तैर रहा है. क्या यह संकट तीसरे विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है, या पहले से ही नाजुक वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के पतन को गति दे सकता है? यह संकट एक भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात भर नहीं है. यह सामने आ रही एक मानवीय त्रासदी है. तेहरान से मशहद तक, तबरीज से इस्फहान तक, शीराज से कुम तक- सड़कों पर हिंसा और आक्रोश उबल रहा है. विरोध प्रदर्शन भड़कते हैं, कुचले जाते हैं, फिर और तीव्रता के साथ उभर आते हैं. एक आकलन के अनुसार, ईरान में करीब 10,000 भारतीय नागरिक फंसे हुए हैं. इनमें छात्र, धार्मिक तीर्थयात्री, व्यापारी, तकनीकी परियोजनाओं में कार्यरत इंजीनियर और पर्यटक शामिल हैं.

ईरान में मौजूदा आग रातोंरात नहीं लगी. यह उथल-पुथल सदियों के ऐतिहासिक विरोधाभासों, राजनीतिक धोखे, सामाजिक तनाव और गलत वैचारिक प्रयोगों का नतीजा है. ईरान कभी मानवता की सबसे महान सभ्यताओं में से एक था. फारसी संस्कृति ने मानवता को असाधारण गहराई और सुंदरता की कविता, दर्शन, विज्ञान और कला दी. वास्तुकला आसमान छू गयी, संगीत फला-फूला और ज्ञान महाद्वीपों तक फैला. बीसवीं सदी में ईरान फिर परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा था, जब 1925 में रजा शाह पहलवी सत्ता में आये. उन्होंने एक आधुनिक, राष्ट्रवादी राज्य की नींव रखी. आधारभूत संरचना का तीव्र विस्तार हुआ. महिलाओं को ऐसे अधिकार मिले, जो पश्चिम एशिया के अधिकांश हिस्सों में अकल्पनीय थे. शिक्षा का प्रसार हुआ, सामाजिक गतिशीलता बढ़ी और ईरान ने वैश्विक आधुनिकता के साथ स्वयं को जोड़ा. मोहम्मद रजा पहलवी के शासन में ईरानी शहर बहुसांस्कृतिक केंद्रों के रूप में खिल उठे. महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती थीं, कार्य करती थीं और स्वतंत्र रूप से परिधान धारण करती थीं. तेहरान, इस्फहान और शीराज प्रगति और आकांक्षा के प्रतीक बन गये. पर उस चमकदार सतह के नीचे कहीं अधिक अंधेरी धाराएं आकार ले रही थीं.

शाह की गुप्त पुलिस, यातना और निगरानी के जरिये भय का माहौल बना रही थी. सत्ता के सर्वोच्च स्तरों पर व्याप्त भारी भ्रष्टाचार ने आर्थिक असमानता को और गहरा कर दिया. इसी विस्फोटक माहौल में अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी सामने आये- एक निर्वासित धर्मगुरु, जिन्होंने असंतोष को विचारधारा में बदल दिया. फ्रांस से उन्होंने निराश जनसमूह को संगठित किया, आधुनिकता को नैतिक पतन और सत्तावादी शासन को पश्चिमी अधीनता के रूप में पेश किया. वर्ष 1978 के अंत तक ईरान क्रांतिकारी उन्माद से जल उठा था. जनवरी, 1979 में शाह देश छोड़ भाग गये. फिर खुमैनी तेहरान लौटे, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ, और एक नया ईरान- इस्लामी गणराज्य- जन्मा. आज का ईरान उसी परिवर्तन का भारी बोझ ढो रहा है. करीब नौ करोड़ लोग भीषण आर्थिक-राजनीतिक दबाव में हैं. मुद्रास्फीति आसमान छू रही है. बेरोजगारी व्यापक है. प्रतिबंध उद्योग और व्यापार को पंगु बना चुके हैं. करीब 208 अरब बैरल के प्रमाणित तेल भंडार होने के बावजूद, जो वैश्विक तेल भंडार का करीब 12 फीसदी है, ईरान की अर्थव्यवस्था करीब 400 अरब डॉलर की जीडीपी के साथ घिसट रही है. अब हालात निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुके हैं. धार्मिक-नैतिक पुलिसिंग असहनीय हो गयी है. राज्य ने इंटरनेट बंद कर, पत्रकारों और महिला कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर, मीडिया की आवाज दबाकर अपनी पकड़ और कस दी है.

आंतरिक उथल-पुथल एक खतरनाक अंतरराष्ट्रीय टकराव में बदल चुकी है. अमेरिका ने चेतावनियां जारी की हैं और क्षेत्र में फौजी संसाधन तैनात कर दिये हैं. जवाब में रूस-चीन ने साझा रणनीतिक व ऊर्जा हितों का हवाला देते हुए अमेरिकी आक्रामकता की निंदा की है. दो शक्तिशाली गुटों के बीच बड़े संघर्ष की वास्तविक आशंका पैदा हो गयी है. भारत के लिए इसके दुष्परिणाम तात्कालिक और गंभीर हैं. ईरान के साथ 1.6-1.8 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार लगभग बंद हो गया है और भारतीय निर्यातकों की बड़ी रकम फंसी हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता- जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20 फीसदी प्रवाहित होता है- भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है. भारत को अमेरिका के साथ संबंध संतुलित रखते हुए और ईरान में अपने क्षेत्रीय हितों का प्रबंधन करते हुए जोखिम भरी कसरत करनी पड़ रही है. रूस-चीन के साथ रिश्तों को साधना और अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उसकी प्राथमिकता है. ईरान की आग सिर्फ उसकी अपनी नहीं है. यह दुनिया के लिए एक चेतावनी है. यह ग्लोबल तबाही की चिंगारी बनेगी या सामूहिक विवेक का उत्प्रेरक, यह इस पर निर्भर है कि वैश्विक नेतृत्व आगे क्या करता है. भविष्य, जो नाजुक हालत में है, देख रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By प्रभु चावला

प्रभु चावला is a contributor at Prabhat Khabar.

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