मोदी के नेतृत्व में बढ़ती भारत की वैश्विक स्वीकार्यता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बना रहा है. 'मेक इन इंडिया' से 'मेक फॉर द वर्ल्ड' तक की यात्रा और ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की भूमिका को समझें. पढ़ें, रक्षा राज्य मंत्री, 
भारत सरकार संजय सेठ का आलेख.

आज 17 सितंबर केवल एक तिथि नहीं है. यह सेवा, संकल्प और राष्ट्र-निर्माण की भावना को पुनः स्मरण करने का अवसर है. यह दिन हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिवस का भी है – एक ऐसा अवसर, जिसे देश सेवा और जनकल्याण के संकल्प के रूप में देख रहा है. पिछले बारह वर्षों में देश ने केवल नीतियां नहीं बदलीं; उसने अपनी सोच, क्षमता और वैश्विक भूमिका को भी नये सिरे से परिभाषित किया है. हाल ही में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने भारत की इस बढ़ती भूमिका को वैश्विक मंच पर रेखांकित किया.\

ब्रिक्स जैसे विविधतापूर्ण समूह में, जहां सदस्य देशों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामरिक प्राथमिकताएं और क्षेत्रीय हित अलग-अलग हैं, साझा चिंताओं पर सहमति बनाना और साथ ही प्रत्येक सदस्य के दृष्टिकोण के प्रति संवेदनशीलता बनाये रखना स्वाभाविक रूप से एक जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया थी. ऐसे समय में, जब विश्व अनेक संघर्षों, ध्रुवीकरण और बदलते शक्ति-समीकरणों के दौर से गुजर रहा है, नयी दिल्ली में संवाद और सहयोग के लिए एक साझा मंच का निर्माण भारत की बढ़ती कूटनीतिक क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता का महत्वपूर्ण प्रमाण बना. ब्रिक्स देशों के शीर्ष नेतृत्व और प्रतिनिधियों का एक मंच पर आना इस बात का संकेत था कि भारत आज केवल वैश्विक शक्ति-संतुलन का दर्शक नहीं, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच संवाद, समझ और सहयोग का सेतु बनने की क्षमता रखने वाला राष्ट्र है.

वर्ष 2014 में, प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने लाल किले की प्राचीर से ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान किया. यह केवल एक औद्योगिक अभियान का विचार नहीं था; यह भारत की उत्पादन क्षमता, उद्यमशीलता और युवा शक्ति पर विश्वास व्यक्त करने वाला एक राष्ट्रीय संकल्प था—भारत को केवल एक बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि विश्व के लिए निर्माण करने वाली एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति के रूप में स्थापित करने का संकल्प. इसके बाद ‘आत्मनिर्भर भारत’ ने इस सोच को और व्यापक बनाया. आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं को इतना मजबूत करना है कि भारत दुनिया के साथ साझेदारी भी करे और दुनिया के लिए निर्माण भी करे.

अगला लक्ष्य है – डिजाइन, अभियंत्रण, अनुसंधान, बौद्धिक संपदा और उच्च-मूल्य विनिर्माण में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाना. यही ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की अगली यात्रा है. भारत की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी जनसंख्या नहीं, बल्कि उसकी युवा प्रतिभा और उसकी समस्या-समाधान क्षमता है. आज भारत में 2.2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप हैं और 140 से अधिक यूनिकॉर्न उभर चुके हैं. स्टार्ट-अप संस्कृति अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रही; छोटे शहरों और दूसरे तथा तीसरे स्तर के शहरों से भी नये उद्यम सामने आ रहे हैं. हमें इस ऊर्जा को केवल रोजगार खोजने की दिशा में नहीं, बल्कि समाधान बनाने की दिशा में आगे बढ़ाना होगा. “युवा को समस्या दीजिए, वह समाधान बनायेगा.” यह भावना भारत की अगली औद्योगिक छलांग की आधारशिला बन सकती है.

एक युवा की यात्रा केवल विचार तक नहीं रुकनी चाहिए. रक्षा विनिर्माण में भारत की यात्रा इस परिवर्तन का सबसे रणनीतिक उदाहरण है. 2014-15 में लगभग 46,429 करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर लगभग 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया. रक्षा निर्यात भी 2013-14 के लगभग 686 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और भारतीय रक्षा उत्पाद 100 से अधिक देशों तक पहुंचे हैं. आज लगभग 65 प्रतिशत रक्षा उपकरणों का उत्पादन देश में हो रहा है और 15,700 से अधिक रक्षा वस्तुओं के स्वदेशीकरण की दिशा में काम हुआ है. लेकिन रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आयात को कम करना नहीं है. इसका अर्थ है— अपनी तकनीक बनाना. अपनी डिजाइन क्षमता विकसित करना. अपनी उत्पादन क्षमता खड़ी करना. और फिर उस क्षमता को विश्व के साथ साझा करना. रक्षा अनुसंधान एवं विकास में भी उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों के लिए अवसर बढ़ाये गये हैं. 2022–23 से रक्षा शोध व विकास बजट का 25 प्रतिशत निजी उद्योग, स्टार्ट-अप और अकादमिक संस्थानों के लिए निर्धारित किया गया. यही वह परिवर्तन है जहां रक्षा आवश्यकता, तकनीकी नवाचार और औद्योगिक क्षमता एक-दूसरे से जुड़ते हैं. भारत की औद्योगिक शक्ति का वास्तविक आधार हमारे एमएसएमइ हैं.

वे केवल बड़े उद्योगों के आपूर्तिकर्ता नहीं हैं. वे तकनीकी साझेदार, नवाचार के केंद्र और वैश्विक आपूर्ति शृंखला के महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार एमएसएमइ विनिर्माण में लगभग 35.4 प्रतिशत, निर्यात में 48.58 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 31.1 प्रतिशत योगदान है. भारत की अगली औद्योगिक छलांग में एमएसएमइ को केवल वित्तीय सहायता की आवश्यकता नहीं है. उन्हें चाहिए — तकनीक, डिजाइन, परीक्षण सुविधाएं, गुणवत्ता प्रमाणन, बाजार तक पहुंच, डिजिटल क्षमता और वैश्विक आपूर्ति शृंखला से जुड़ने का अवसर. बड़ी कंपनियां केवल अपने लिए उत्पादन न करें; वे पूरे औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करें. भारत के भविष्य की तस्वीर केवल कारखानों से नहीं बनेगी.

माननीय प्रधानमंत्री जी ने सप्तधारा के माध्यम से विकास की सात महत्वपूर्ण धाराओं पर बल दिया है — मैन्युफैक्चरिंग पावर, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, टेक्नोलॉजी एवं इनोवेशन, गतिशक्ति, रक्षा शक्ति, हरित एवं नीली अर्थव्यवस्था तथा सॉफ्ट पावर. इन सात धाराओं की अपनी अलग भूमिका है, लेकिन इनकी वास्तविक शक्ति इनके परस्पर जुड़ाव में है. आज 17 सितंबर को हमें एक ऐसा भारत बनाने का संकल्प लेना है— जहां हर कारखाना केवल उत्पादन का केंद्र नहीं, इनोवेशन का केंद्र हो. जहां हर एमएसएमइ केवल आपूर्तिकर्ता नहीं, तकनीकी साझेदार हो. जहां हर स्टार्ट-अप केवल मूल्यांकन नहीं, वास्तविक समाधान पैदा करे. जहां हर वैज्ञानिक की प्रयोगशाला उद्योग से जुड़ी हो. जहां हर उद्यमी भारत के साथ-साथ विश्व के बाजार को अपना बाजार माने. और जहां भारत का युवा केवल नौकरी पाने की नहीं, समाधान बनाने और अवसर पैदा करने की आकांक्षा रखे.

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