वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया संकट के बावजूद इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश की आर्थिक विकास दर का 7.8 प्रतिशत होना एक बड़ी उपलब्धि है. भारत के तीन आर्थिक परिदृश्य पूरी दुनिया में रेखांकित हो रहे हैं. एक, बेहतरीन विकास दर के मद्देनजर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. दो, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने भारत की आर्थिक साख बरकरार रखी है. और तीन, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 729. 32 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है. वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए रिजर्व बैंक के सात प्रतिशत विकास दर के अनुमान को पीछे छोड़ दिया है.
इस दौरान उद्योग एवं विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 फीसदी, सेवा क्षेत्र में 10 प्रतिशत तथा कृषि व संबद्ध क्षेत्र में 3.6 फीसदी की विकास दर दर्ज की गयी है. ज्ञातव्य है कि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विकास दर 6.9 प्रतिशत थी. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि 27 अगस्त को क्रेडिट रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने भारत की दीर्घकालिक सॉवरेन रेटिंग को 'बीबीबी' और अल्पकालिक रेटिंग को 'ए-2' पर बरकरार रखा है. ये रेटिंग भारत के आर्थिक परिदृश्य को 'स्थिर' श्रेणी में बनाये रखती हैं. इस रेटिंग का सकारात्मक संकेत यह है कि भारत दीर्घकालिक निवेश के लिए एक सुरक्षित,
भरोसेमंद और स्थिर बाजार बना हुआ है. 'स्थिर' आउटलुक यह दर्शाता है कि आने वाले 24 महीनों में देश की आर्थिक नीतियां और व्यापक आर्थिक स्थिति इस साख को बनाये रखने में सक्षम होंगी. एसएंडपी के अनुसार, भारत की सॉवरेन रेटिंग को सबसे बड़ा समर्थन उसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से मिलता है. वित्त वर्ष 2021-22 से वित्त वर्ष 2025-26 के बीच भारत ने औसतन 7.9 फीसदी की वार्षिक विकास दर दर्ज की है. एसएंडपी के मुताबिक, भारत के स्थिर लोकतांत्रिक संस्थान और इसकी सुदृढ़ आर्थिक नीतियां बाजार के अनिश्चय को कम करती हैं, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार बाहरी झटकों से सुरक्षा कवच प्रदान करता है, तो सरकार का ढांचागत क्षेत्र में किया जा रहा भारी पूंजीगत व्यय दीर्घकालिक विकास को गति दे रहा है.
भारत के ऐसे विकास दृष्टिकोण के बावजूद एसएंडपी ने संकेत दिया है कि वैश्विक ऊर्जा संकट और कृषि क्षेत्र की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण चालू वित्त वर्ष में विकास दर थोड़ी धीमी रह सकती है. हालांकि, इसमें अगले तीन वर्षों में औसतन सात फीसदी की वार्षिक वृद्धि का अनुमान जताया गया है. एजेंसी ने चेतावनी भी दी है कि उच्च राजकोषीय घाटा, सरकारी कर्ज का भारी बोझ, ब्याज भुगतान की ऊंची लागत और प्रति व्यक्ति कम जीडीपी ऐसी कमजोरियां हैं जो भारत की रेटिंग को और ऊपर जाने से रोकती हैं. गौरतलब है कि पिछले ही महीने वैश्विक रेटिंग एजेंसी 'फिच रेटिंग्स' ने भी भारत की सॉवरेन रेटिंग को 'बीबीबी माइनस' पर स्थिर परिदृश्य के साथ यथावत रखा है. फिच ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी हलचलों और तेल बाजार के उतार-चढ़ाव का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई दीर्घकालिक या स्थायी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है.
हाल के दौर में भारत ने कई बड़े वैश्विक झटकों का सफलतापूर्वक सामना किया है और अपनी मजबूत घरेलू बाजार क्षमता के बल पर इसने सकारात्मक आर्थिक वृद्धि बनाये रखी है. फिच द्वारा भारत की रेटिंग तय करते समय नीतिगत विश्वसनीयता, बाहरी वित्तीय ढांचे और ऋण वहन करने की क्षमता का विस्तृत विश्लेषण किया गया है. कई अन्य साख निर्धारण संस्थाओं ने भी भारत की आर्थिक साख को निवेश योग्य श्रेणी में बनाये रखा है. जिस तरह पश्चिम एशिया के जारी तनाव और वैश्विक व्यापारिक गतिरोधों के बावजूद भारत की आर्थिक साख अडिग बनी हुई है, उसी तरह भारत की विकास दर भी सराहनीय स्तर पर बनी हुई है. इस सकारात्मक परिदृश्य के कई ठोस आधार हैं. जैसे कि सशक्त घरेलू बाजार भारत की बड़ी ताकत है. इसी तरह विशाल आबादी और बढ़ता मध्यम वर्ग घरेलू मांग को गति प्रदान करता है, जिससे बाह्य आर्थिक झटकों का प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम रहता है.
एकीकृत भुगतान इंटरफेस और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार ने बैंकिंग प्रणाली तथा व्यापार को सुगम बनाकर वित्तीय समावेशन को बढ़ाया है. राष्ट्रीय विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए लागू की गयी प्रोत्साहन योजनाओं से औद्योगिक क्षेत्र को मजबूती मिली है. इस वित्त वर्ष में अप्रैल से अगस्त तक भारत ने विनिवेश का 78 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया है. राजकोषीय घाटे को सीमा में रखने के प्रयासों से वैश्विक साख मूल्यांकन संस्थाओं के समक्ष देश की वित्तीय साख मजबूत हुई है. विश्व बैंक और आइएमएफ जैसी वैश्विक संस्थाओं ने भारत के नीतिगत ढांचे की सराहना की है. निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना भारत विदेशी पूंजी आकर्षित करने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. इस वर्ष आठ जून से लागू रिजर्व बैंक की नयी रियायती स्वैप सुविधा को वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन मिला है. विगत 21 अगस्त तक देश के बैंकों ने इस योजना के माध्यम से रिकॉर्ड 72 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी मुद्रा जुटा ली है. रिजर्व बैंक की रियायती स्वैप सुविधा का मुख्य उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाना और भुगतान संतुलन को मजबूत करना है. शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की वापसी के संकेत भी देखने को मिल रहे हैं.
इन सबके बावजूद देश के सामने वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति शृंखला में बाधाएं और लगभग 55.6 फीसदी का कर्ज-जीडीपी अनुपात प्रमुख चुनौतियां हैं. ऐसे में भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग सुधारने के लिए रणनीतिक और दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों की जरूरत है. क्रेडिट रेटिंग में सुधार के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर अपना वित्तीय घाटा नियंत्रित करना होगा. राजस्व संग्रह बढ़ाकर और अनावश्यक खर्चों पर अंकुश लगाकर वित्तीय संतुलन बनाना भी जरूरी है. कुल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात में सरकारी कर्ज का बोझ भी घटाना होगा. केवल कुल अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. रोजगार निर्माण, कौशल विकास और समावेशी विकास के माध्यम से आम नागरिकों की औसत आय में वृद्धि करनी होगी. बुनियादी ढांचे के विकास में केवल सरकारी खर्च पर निर्भर रहने के बजाय निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश को प्रोत्साहित करना जरूरी है. भूमि, श्रम और व्यापारिक नियमों को सरल बनाकर उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी. इससे घरेलू उद्योगों को बल मिलेगा और निर्यात में वृद्धि होगी. ये सुदृढ़ उपाय भारत की आर्थिक नींव को सशक्त बनाकर वैश्विक स्तर पर साख बढ़ायेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
