इथेनॉल उत्पादन में भारत की उपलब्धि, पढ़ें अजीत रानाडे का लेख

Ethanol Production : आयात पर खर्च घटाने तथा कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने के लिए भारत पेट्रोल और डीजल में एथेनॉल ब्लेंडिंग या मिश्रण की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है. इथेनॉल गन्ने या मक्का, चावल आदि अनाज से तैयार किया जाता है.

Ethanol Production : भारत का सतत आर्थिक विकास ऊर्जा के इस्तेमाल में वृद्धि के बगैर संभव नहीं है. अगले दो दशकों तक ऊर्जा इस्तेमाल की वृद्धि दर कमोबेश वही रहेगी, जो हमारी आर्थिक वृद्धि दर की रहेगी. हमें घर-परिवारों, फैक्ट्रियों और कार्यालयों के लिए अधिक बिजली की, तो परिवहन क्षेत्र में अधिक ऊर्जा की जरूरत है. देश में बिजली का तीन-चौथाई उत्पादन कोयले से होता है, जबकि शेष उत्पादन सौर, पवन, जल, परमाणु और बायोमास जैसे नवीकरणीय या अक्षत ऊर्जा स्रोतों से होता है. कुल बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 50 फीसदी के आसपास पहुंच चुकी है. भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोयला भंडार है, इसके बावजूद बिजली उत्पादन के लिए कोयले का आयात करना पड़ता है, जिसके लिए देश को सालाना 20 अरब डॉलर या उससे अधिक खर्च करना पड़ता है.


कच्चे तेल के इस्तेमाल के लिए भी हम आयात पर निर्भर हैं. कुल इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का 90 प्रतिशत आयात किया जाता है. पिछले साल हमारा कच्चा तेल आयात 24.2 करोड़ टन रहा. इसके लिए हमें 125 से 150 अरब डॉलर खर्च करने पड़े. कच्चे तेल के बढ़े हुए दामों के कारण हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी बोझ बढ़ता है. हालांकि अच्छी बात यह है कि देश से पेट्रोल और डीजल का निर्यात कच्चे तेल के आयात की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है. पिछले साल पेट्रोल और डीजल का कुल निर्यात न सिर्फ 6.5 करोड़ टन रहा, बल्कि इसमें मुनाफा भी ज्यादा मिला. अगले कुछ वर्षों में घरेलू स्तर पर कच्चे तेल शोधन की क्षमता 20 फीसदी बढ़कर 31 करोड़ टन हो जायेगी. तेल शोधन की इस क्षमता में विस्तार घरेलू जरूरत में हो रही वृद्धि से तेज है. यानी देश से पेट्रोल, डीजल का ज्यादा निर्यात होगा और आय बढ़ेगी.

ब्राउनफील्ड (पहले से स्थापित उद्योगों) के विस्तार और नयी रिफाइनरियों के निर्माण से कच्चे तेल के शोधन की क्षमता बढ़ी है. चूंकि पश्चिमी दुनिया में रिफाइनरियां बंद हो रही हैं, ऐसे में भारत के लिए इस क्षेत्र में अवसर बढ़ रहे हैं. पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रस्तावित एक नयी रिफाइनरी उत्पादन, रोजगार तथा निर्यात को और गति देगी. उस सुखद भविष्य की कल्पना करें, जब भारत की रिफाइनरी क्षमता का 25 प्रतिशत इस्तेमाल निर्यात के लिए होगा. इससे विदेशी मुद्रा के देश से बाहर जाने में कमी आयेगी. हालांकि यह भी सच है कि दुनिया जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से पीछा छुड़ाने की कोशिश में है.


आयात पर खर्च घटाने तथा कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने के लिए भारत पेट्रोल और डीजल में एथेनॉल ब्लेंडिंग या मिश्रण की महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहा है. इथेनॉल गन्ने या मक्का, चावल आदि अनाज से तैयार किया जाता है. वर्ष 2013 से देश में शुरू हुए इथेनॉल ब्लेंडिंग की योजना में काफी प्रगति हुई है. तब एथेनॉल ब्लेंडिंग की दर 1.5 फीसदी थी, जबकि इस साल 20 प्रतिशत का लक्ष्य पूरा हो चुका है. जहां तक मात्रा का सवाल है, तो यह सालाना 30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है. एथेनॉल उत्पादन की यह दर देश में पेट्रोल और डीजल की खपत में वृद्धि की दर से अधिक है. इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (इबीपी) को सरकारी सब्सिडी का लाभ मिलता है. इथेनॉल उत्पादकों को कच्चा माल खरीदने के लिए सब्सिडी दी जाती है और उन्हें जीएसटी भी कम देना पड़ता है. उनके लिए इंटरेस्ट सबवेंशन जैसी योजना है, जिसके तहत एक निश्चित अवधि तक उन्हें ब्याज नहीं चुकाना पड़ता. उन्हें कर्ज भी कम ब्याज दर पर मुहैया कराये जाते हैं. एथेनॉल उत्पादन तकनीक में भारत दुनिया का सिरमौर बन चुका है. इबीपी टारगेट का मतलब है कि तेल विपणन कंपनियों के लिए एक निश्चित लक्ष्य तक एथेनॉल की खरीद अनिवार्य है. फिलहाल देश में एथेनॉल उत्पादन की स्थापित क्षमता 1,810 करोड़ लीटर है, जिनमें से 858 करोड़ लीटर मकई और चावल से, 816 करोड़ लीटर गन्ने या शीरे से और136 करोड़ लीटर गन्ना और अनाज से तैयार किया जाता है.


इथेनॉल ब्लेडिंग प्रोग्राम (इबीपी) के चार महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं- कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा खर्च करने में कमी लाना, कार्बन उत्सर्जन में कमी करना, और कृषि उत्पादन में वृद्धि करना. एथेनॉल ब्लेंडिंग के 20 फीसदी का लक्ष्य पूरा कर चुकने के बाद इबीपी इन चार लक्ष्यों की पूर्ति में कहां तक पहुंचा है, इसे आंकना भी आवश्यक है. पीआइबी (पत्र सूचना कार्यालय) के मुताबिक, 2024 तक कुल दस साल में कच्चे तेल के आयात में 1.8 करोड़ टन की कमी आयी, जो उस अवधि में कुल कच्चे तेल आयात का 0.8 प्रतिशत है. इस दौरान विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर करीब 10 अरब डॉलर की बचत हुई. हालांकि धनराशि की यह बचत इस दौरान खर्च की कई कुल विदेशी मुद्रा के 0.5 प्रतिशत से भी कम है. विगत 10 साल के दौरान इबीपी ने कार्बन उत्सर्जन में 5.4 करोड़ टन की कमी लाने में सफलता हासिल की, जो इस दौरान हुए कुल कार्बन उत्सर्जन के एक प्रतिशत से भी कम है. ऐसे ही, जहां तक कृषि क्षेत्र का सवाल है, तो एक दशक की अवधि में किसानों ने एक ट्रिलियन या एक लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त कमाया. इसके अलावा डिस्टलरियों ने भी एक लाख करोड़ रुपये अधिक कमाया. हालांकि गन्ना और मक्का उत्पादकों की आय वृद्धि प्रतिशत में मामूली ही रही. इबीपी ने गन्ना उत्पादकों को एक गारंटीशुदा बाजार मुहैया कराया है. यही कारण है कि गन्ना उत्पादन बढ़ता जा रहा है. हाल ही में सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए 50 लाख टन चावल मुहैया कराने का फैसला किया है, जो हमारे वैश्विक निर्यात का नौ प्रतिशत है.


चावल और मकई के एक हिस्से को एथेनॉल उत्पादन के लिए देने से हालांकि पोल्ट्री क्षेत्र के प्रभावित होने की आशंका है, जो उत्पादों की कमी के अलावा इनपुट लागत में वृद्धि की समस्या से भी जूझ रहा है. हालांकि इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि इबीपी के कारण ही कभी मकई का आयातक भारत आज मकई निर्यातक बन गया है. पेट्रोल और डीजल के लिए तेल विपणन कंपनियों पर उत्पाद और दूसरे करों का भार 50 फीसदी से भी अधिक है, जबकि एथेनॉल पर टैक्स का बोझ नगण्य है. मतलब यह कि एथेनॉल ब्लेडिंग के 20 प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुंचने के अलावा भी, जो एक बड़ी उपलब्धि है, इबीपी ने कई महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल किये हैं, जो बड़ी बात है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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