पश्चिम एशिया संकट ने वैश्विक व्यापार, समुद्री परिवहन और कीमतों के संतुलन को प्रभावित किया है. फिर भी भारत दुनिया की सबसे मजबूत प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि इस झटके का असर धीरे-धीरे कम हो रहा है, बाहरी परिस्थितियां पहले की तुलना में कम प्रतिकूल हो रही हैं और भारत की आर्थिक वृद्धि को आगे बढ़ाने वाले आधार मजबूत बने हुए हैं. हालांकि जुलाई में आइएमएफ के नवीनतम वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक ने 2026 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.4 फीसदी कर दिया है.
पश्चिम एशिया संघर्ष का तात्कालिक और सीधा असर ऊर्जा, समुद्री माल ढुलाई, बीमा और आपूर्ति की समय-सीमा पर भी पड़ा, पर युद्धविराम से समुद्री परिवहन और ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ा दबाव कम होने लगा है. विश्लेषकों के मुताबिक, यदि पश्चिम एशिया में युद्ध के हालात नहीं बनते, तो भारतीय कंपनियों के मुनाफे पर पड़ने वाला प्रभाव शुरुआती आशंकाओं की तुलना में आधा रह सकता है. यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है तथा तेल की कीमतों में थोड़ी भी वृद्धि महंगाई, चालू खाते के संतुलन और उद्योगों की लागत पर व्यापक असर डाल सकती है. अच्छी बात यह है कि पश्चिम एशिया का झटका फिलहाल नियंत्रित किया जा सकने वाला लग रहा है.
जनवरी के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 723.8 अरब डॉलर था. भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, यह भंडार एक वर्ष से अधिक अवधि का आयात पूरा करने के लिए पर्याप्त है. मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार नीति-निर्माताओं को यह क्षमता देता है कि वे अस्थिरता का सामना करते हुए भी आर्थिक विकास की गति बनाये रख सकें. विश्व बैंक ने कहा है कि ऊर्जा की ऊंची कीमत और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के बावजूद भारत 2026-27 में 6.6 फीसदी की अनुमानित वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में बना रहेगा.
घरेलू आर्थिक गतिविधियां अब भी विकास का मुख्य आधार बनी हुई हैं. वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी 7.7 प्रतिशत बढ़ी, जबकि चौथी तिमाही की वृद्धि दर 7.8 फीसदी रही. जून में भारत का संयुक्त पीएमआइ 57.4 पर रहा, जो 50 से काफी ऊपर है यानी निजी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों के विस्तार की पर्याप्त संभावना अब भी मौजूद है. इससे सेवा और विनिर्माण क्षेत्र की लगातार मजबूत गतिविधियां बाहरी झटकों के असर को कम कर सकती हैं. चूंकि महंगाई आर्थिक चक्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बन गयी है, ऐसे में नीति-निर्माताओं को कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव पर विशेष ध्यान देना होगा. खुदरा महंगाई अप्रैल के 3.48 फीसदी से बढ़कर मई में 3.93 फीसदी हो गयी, जबकि थोक महंगाई 9.68 फीसदी तक पहुंच गयी.
यह ऊर्जा संकट और उत्पादन लागत बढ़ने का परिणाम है. बेशक ये आंकड़े अत्यधिक चिंताजनक नहीं हैं, पर बताते हैं कि वैश्विक आपूर्ति संबंधी झटके घरेलू कीमतों को तेजी से प्रभावित कर सकते हैं. अच्छी बात यह है कि पिछले संकटों की तुलना में फिलहाल महंगाई काफी नियंत्रित है. इससे रिजर्व बैंक और सरकार को जल्दबाजी में कठोर कदम उठाने की जरूरत नहीं होगी. यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य स्थिति बहाल होती है, तो समुद्री परिवहन संबंधी अनिश्चितता कम होगी, बीमा प्रीमियम घटेंगे, माल ढुलाई की लागत कम होगी और ऊर्जा, रसायन, उर्वरक तथा अन्य औद्योगिक कच्चे माल का आयात करने वाली कंपनियों के लिए आपूर्ति की योजना बनाना अधिक आसान हो जायेगा.
आंकड़े ये भी दर्शाते हैं कि जनवरी से मार्च की तिमाही में भारत का चालू खाता अप्रत्याशित रूप से अधिशेष में पहुंच गया. इसका मुख्य कारण सेवा क्षेत्र से हुई मजबूत आय और विदेशों से आने वाला धन (रेमिटेंस) था. यह भारत की बाहरी आर्थिक मजबूती को दर्शाता है. हालांकि यह स्थिति आने वाली तिमाहियों में बनी रहेगी, इसकी संभावना कम है. ऐसे में, पहले से तैयार रहना होगा. यह विशेष रूप से इसलिए उपयोगी है, क्योंकि औद्योगिक उत्पादन अब भी मजबूत बना हुआ है. अप्रैल में औद्योगिक उत्पादन 4.9 फीसदी बढ़ा, जबकि इससे पहले ऊर्जा लागत और आपूर्ति संबंधी समस्याएं बढ़ चुकी थीं.
निर्यातकों और विनिर्माण कंपनियों के लिए पश्चिम एशिया में सामान्य स्थिति लौटने से माल प्रबंधन बेहतर होगा, आपूर्ति में लगने वाला समय कम होगा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उनकी स्थिति मजबूत होगी. मौजूदा आर्थिक तस्वीर का सबसे चुनौतीपूर्ण पहलू रोजगार है. जून के पीएमआइ सर्वेक्षण के अनुसार, निजी क्षेत्र में रोजगार वृद्धि बहुत सीमित रही. पिछले छह महीनों के विस्तार काल में नयी नियुक्तियों की गति सबसे कम रही, जबकि कंपनियां अपना उत्पादन लगातार बढ़ाती रहीं. इससे स्पष्ट है कि आर्थिक वृद्धि वास्तविक है, पर उत्पादन बढ़ने का लाभ व्यापक स्तर पर रोजगार सृजन में अभी पूरी तरह परिवर्तित नहीं हो पा रहा है. यदि भारत को आने वाले वर्षों में लगातार उच्च विकास दर बनाये रखनी है, तो रोजगार सृजन में सुधार जरूरी होगा.
फिर भी यह निराश होने का कारण नहीं है. भारत के आर्थिक अनुभव से यह बार-बार सिद्ध हुआ है कि जब महंगाई कम होती है, ऊर्जा लागत सामान्य होती है और निजी क्षेत्र का विश्वास बढ़ता है, तो कुछ समय बाद रोजगार भी तेजी से बढ़ने लगता है. इस समय सबसे महत्वपूर्ण कार्य है घरेलू मांग स्थिर बनाये रखना, लागत का दबाव कम करना और नीतिगत स्थिरता बनाये रखना, ताकि उद्योग बेहतर परिस्थितियों को अधिक निवेश और अधिक रोजगार में बदल सकें. पश्चिम एशिया में स्थिति सुधरती है, तो भारत को महंगाई और समुद्री परिवहन के साथ रुपये पर कम दबाव का लाभ मिलेगा.
जब इसे भारत के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, स्थिर घरेलू मांग और सेवा क्षेत्र से होने वाली आय के साथ जोड़ा जाये, तो यह आर्थिक विकास के अगले चरण के लिए अनुकूल आधार तैयार करता है. संभावना यह है कि विकास दर में अचानक तेज उछाल नहीं आयेगा, बल्कि जैसे-जैसे बाहरी चुनौतियां कम होंगी, अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे गति पकड़ती जायेगी. भारत ने एक बड़े वैश्विक झटके का सफलतापूर्वक सामना किया है और उसके व्यापक आर्थिक आधार मजबूत बने हुए हैं. विकास दर पहले के अत्यधिक आशावादी अनुमानों से कुछ कम हो सकती है, पर अर्थव्यवस्था स्वस्थ गति से आगे बढ़ रही है. महंगाई नियंत्रण में है और भुगतान संतुलन मजबूत बना हुआ है. फिर भी होर्मुज और पूरे पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित होना भारत की आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए अत्यंत जरूरी है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
