भारत और ब्रिटेन के बीच आज से नया मुक्त व्यापार समझौता लागू हुआ है, जिसे व्यापक आर्थिक एवं व्यापारिक समझौता या सीटा कहा जा रहा है. इससे भारत के 99 प्रतिशत निर्यातों पर ब्रिटेन में कोई टैरिफ या शुल्क नहीं लगेगा. बदले में भारत भी ब्रितानी आयातों पर शुल्कों में 90 फीसदी की कटौती करेगा. भारत और ब्रिटेन का वस्तु व्यापार इस समय लगभग 2,510 करोड़ डॉलर है, जो 8.5 प्रतिशत सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा है. दोनों देश इस सीटा व्यापार समझौते की सहायता से वस्तु और सेवा व्यापार को 2030 तक 10 हजार करोड़ डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं.
इस मुक्त व्यापार समझौते से सबसे बड़ा लाभ भारत के कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को होगा. मसाले, दालें, चाय, आम का गूदा, अचार, तैयार भोजन, प्रसंस्कृत खाद्य, ट्यूना और झींगा मछली जैसी चीजों से निर्यात शुल्क अब पूरी तरह हटा दिया गया है. इनमें श्रीधान्य (पांच चमत्कारी मिलेट्स), कटहल और देसी बूटियों जैसी चीजों को भी शामिल कर लिया गया है, जिससे भारत के श्रीधान्य और देसी उपज को बढ़ावा देने का मिशन भी पूरा होगा. कृषि और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का अनुमान यह है कि भारत के कृषि निर्यात में इस समझौते की बदौलत तीन साल के भीतर लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है.
कृषि के अलावा कपड़ा, वस्त्र, जूते, खिलौने, खेल और चमड़े का सामान जैसे श्रमप्रधान उद्योग भी निर्यात शुल्क से छूट मिलने के कारण अब चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों के माल को टक्कर देते हुए ब्रितानी बाजारों में अपनी जगह बना सकेंगे. जबकि इससे पहले भारतीय निर्यातकों को 12.5 प्रतिशत शुल्क देना पड़ता था. चीन को छोड़कर बाकी देशों को इससे छूट थी. इसलिए ब्रिटिश सुपर बाजारों में भारतीय माल दिखाई देना लगभग बंद हो गया था. ब्रिटेन जाने वाले भारतीय निर्यात का सबसे बड़ा भाग दवाओं, बिजली और उद्योगों की मशीनों, वाहनों के पुर्जों और रत्न-आभूषणों का होता है. इनके निर्यात पर अधिक शुल्क तो नहीं था, फिर भी उसके पूरी तरह हट जाने के बाद इन उद्योगों को चीन और यूरोप के निर्माताओं की प्रतिस्पर्धा में टिकने में मदद मिल सकती है.
सच्चाई यह है कि ट्रंप की टैरिफ जंग के कारण अमेरिकी बाजार में माल बेचना कठिन हो गया है और यूरोप के साथ हुआ मुक्त व्यापार समझौता अभी लागू नहीं हुआ है. ऐसे में ब्रितानी समझौता इन उद्योगों के लिए नये अवसर खोलता है. भारत के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सेवा व्यापार को भी बढ़ावा देगा और भारत अब एक सेवाप्रधान अर्थव्यवस्था बन चुका है. भारत और ब्रिटेन एक-दूसरे की कंपनियों के सेवाकर्मियों से पांच साल तक समाज सुरक्षा कर न वसूलने पर भी राजी हुए हैं. ब्रिटेन में काम करने वाले भारतीय कंपनियों के सेवाकर्मियों को दोहरा कराधान कन्वेंशन के तहत पांच साल तक ब्रिटेन का राष्ट्रीय सुरक्षा कर नहीं देना होगा.
यही नियम भारत में काम करने आये ब्रिटिश कंपनियों के सेवाकर्मियों पर भी लागू होगा. ब्रिटेन में जाकर काम करने वाले अधिकांश भारतीय सेवाकर्मी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों के होते हैं, जिन्हें आयकर के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा कर भी देना होता है, जो उनके वेतन का 12.5 प्रतिशत तक होता है. सूचना प्रौद्योगिकी के अलावा स्वास्थ्य, वित्त और शिक्षा के क्षेत्रों में सेवा देने वाली भारतीय कंपनियों के लिए भी ब्रिटिश बाजार में प्रवेश करना अब सुगम बनेगा. दोनों देशों की कंपनियों को एक-दूसरे के यहां सरकारी और निजी क्षेत्र के ठेकों के लिए बोली लगाने का प्रावधान भी रखा गया है, जिससे आपसी निवेश और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा. इसीलिए इस समझौते को व्यापक व्यापार समझौता या सीटा कहा जा रहा है. भारत ने सेवाकर्मियों और छात्रों के आवागमन को और सुगम बनाने के लिए भी दबाव डाला था.
लेकिन समझौते में सेवाकर्मियों की वीजा की संख्या बढ़ाने का प्रावधान नहीं है, जो शायद ब्रिटेन में आप्रवासन विरोधी लहर को देखते हुए संभव नहीं हुआ. भारतीय रसोइयों, योग शिक्षकों और संगीतकारों को जरूर सालाना 1,800 वीजा देने का आश्वासन मिला है. भारत को ब्रिटेन के इस्पात टैरिफ को लेकर भी चिंता थी, जिसे पहली जुलाई से लगाया गया है. भारत 90 करोड़ डॉलर से अधिक का इस्पात निर्यात करता है. इस पर ब्रिटेन ने लचीलापन दिखाया और वह भारत के 85 प्रतिशत इस्पात निर्यात को नये टैरिफ से मुक्त रखने को राजी हो गया. बाकी बचे 15 प्रतिशत निर्यात को भी कोटा में रखकर उसे टैरिफ से छूट दिलायी जायेगी. बदले में भारत स्कॉच व्हिस्की के आयात पर अपना टैरिफ आज से 150 फीसदी से घटाकर 75 फीसदी कर रहा है और अगले 10 वर्षों के भीतर इसे घटाकर 40 प्रतिशत कर देगा.
इससे भारत के शराब निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा जरूर बढ़ेगी, लेकिन उन शराब निर्माताओं को लाभ भी होगा, जो व्हिस्की मिश्रित शराब बनाते हैं. भारत ब्रिटेन से वाहनों, मशीनों और उनके पुर्जों और बिजली के सामान का भी आयात करता है. इनमें से मशीनों और पुर्जों पर कोटे के तहत टैरिफ को 100 फीसदी से घटाकर 10 प्रतिशत किया जा रहा है और प्रसाधन के सामान पर लगने वाले टैरिफ को दस साल के भीतर समाप्त किया जायेगा. ब्रिटिश सरकार इसे सबसे कम समय में लागू होने वाले व्यापार समझौते के रूप में पेश कर रही है और इस पर देशभर में एक रोड शो भी हो रहा है. स्पष्ट रूप से ब्रिटेन को भारत की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था और उसके साथ बड़ा होता बाजार दिखाई दे रहा है, जो ब्रेग्जिट से हुए नुकसान और ट्रंप की टैरिफ नीतियों से बढ़ी अनिश्चितता की भरपाई कर सकता है.
लेकिन देखना यह है कि भारत के निर्यातक कड़ी प्रतिस्पर्धा वाले ब्रिटिश बाजार में टैरिफ की छूट और समझौते से बनी निश्चितता का कितना लाभ उठा पाते हैं. मुक्त व्यापार समझौते बाजार के दरवाजे जरूर खोलते हैं. लेकिन बाजार में पैठ अपने माल की गुणवत्ता, आकर्षक मूल्य और मानकीय नियमों के पालन से ही संभव हो पाती है. ब्रिटेन की बागडोर अब एक ऐसे नेता के हाथों में जा रही है, जिसका रुझान वामपंथी रहा है. उनकी सरकार श्रमिकों के अधिकार, कार्बन उत्सर्जन और मानकीकरण जैसे गैर-टैरिफ मुद्दों की आड़ लेकर रुकावटें खड़ी कर सकती है. ऐसे में, समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय निर्यातक और सरकार उनसे कैसे और कितनी चतुराई से निपटते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
