विश्व कूटनीति में भारत की जगह बनाते मोदी

भारत अब विश्व मंच पर याचक नहीं, बल्कि अपनी राह तय करने वाली शक्ति बन गया है. प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक चालें, खासकर पुतिन और शी के साथ, भारत की बढ़ती प्रभुता का संकेत हैं. जानें यह कैसे संभव हुआ.

किसी राष्ट्र की कूटनीतिक प्रभुता का वास्तविक पैमाना यह नहीं है कि वह कितने प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ सकता है, बल्कि यह है कि उसके अपने फैसले कब और किस हद तक उन नेताओं के विकल्पों को सीमित करने लगते हैं. भारत अब ऐसे ही असहज मोड़ पर पहुंच चुका है. चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और 1.4 अरब की आबादी वाला भारत अब विश्व राजनीति में याचक की भूमिका में नहीं है. वह उन शक्तियों में शामिल है, जो अपने आसपास के शक्ति संतुलन को बदल सकती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सप्ताह शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात और शी जिनपिंग के साथ बैठक, तथा इसके बाद नयी दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शी की संभावित मौजूदगी केवल कूटनीति तक सीमित घटनाएं नहीं हैं.

एक दशक से मोदी ने पुतिन और शी के साथ संबंध मजबूत किये हैं, वहीं वह भारत को वाशिंगटन के और करीब भी ले आये हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने दंडात्मक शुल्क, दबावपूर्ण सौदेबाजी और लेन-देन आधारित कूटनीति के जरिये इस पूरी संरचना को झटका दिया है. अब भारत से केवल मित्र चुनने को नहीं कहा जा रहा. उसकी परीक्षा इस बात पर हो रही है कि क्या वह इनमें से किसी को खोये बिना अपना स्वतंत्र रास्ता चुन सकता है. पुतिन और शी के साथ मोदी की कूटनीति का रिकॉर्ड असाधारण है. पर इसका संतुलन एकतरफा है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वह और पुतिन कम से कम 20 बार मिल चुके हैं. पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिका के साथ भारत की साझेदारी के बावजूद दोनों देशों के संबंध कायम रहे हैं, क्योंकि रक्षा, ऊर्जा और संस्थागत परिचय ने इन्हें मजबूती दी है.

शी के साथ भी मोदी की कई बार मुलाकात हुई. पर एशिया के दो सबसे शक्तिशाली नेता इतनी बार मिलने के बावजूद मित्रवत संबंध क्यों नहीं बना पाये हैं. व्यक्तिगत संबंध दरवाजे खोल सकते हैं, पर वे भूगोल, इतिहास या रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाप्त नहीं कर सकते. इसके बावजूद भारत और चीन ने एक-दूसरे पर भरोसा करना सीखे बिना साथ काम करना सीख लिया. व्यापार बढ़ता गया, जबकि हिमालयी सीमा पर अविश्वास गहराता गया. हाल ही में अजीत डोभाल और वांग यी के बीच सीमा वार्ता के 25वें दौर में आठ सूत्री सहमति बनी और निष्पक्ष, तर्कसंगत तथा दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान के लिए प्रयास जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहरायी गयी. असली सवाल यह है कि क्या बीजिंग ऐसी सशर्त रणनीतिक यथास्थिति बनाने के लिए तैयार है, जिसके बिना भारत के साथ टिकाऊ आर्थिक संबंध विकसित नहीं हो सकते.

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा विवाद उसकी आर्थिक क्षमता और प्राथमिकताओं को निगल न जाये. पुतिन के मामले में समीकरण अलग है. रूस भारत का सबसे भरोसेमंद महाशक्ति साझेदार रहा है, क्योंकि यह संबंध राजनीतिक चलन के बजाय लंबे समय से संचित रणनीतिक हितों पर आधारित है. जब पश्चिमी राजधानियां ऐसा करने में हिचक रही थीं, तब भी मॉस्को नयी दिल्ली के साथ खड़ा रहा. जब वाशिंगटन चाहता था कि भारत रूस से दूरी बनाये, तब भी दिल्ली ने मॉस्को का साथ नहीं छोड़ा. रूसी तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया, जबकि रक्षा सहयोग भारत की सैन्य संरचना का आधार बना रहा. लेकिन रूस तेजी से बीजिंग के करीब गया है. पुतिन वह नेता हो सकते हैं, जिनके साथ मोदी की रणनीतिक समझ सबसे टिकाऊ है. पर वह चीन से भी तेजी से जुड़ रहे हैं, जिसके साथ भारत दशकों से बेहद सावधानी से संबंध संभालता आया है.

इसलिए अमेरिका के मुकाबले भारत, रूस और चीन की त्रिकोणीय धुरी बनना रणनीति से अधिक कल्पना है. चीन एशिया में अपनी प्रधानता चाहता है, भारत एशिया में शक्ति संतुलन चाहता है और रूस एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र बने रहना चाहता है. ट्रंप ने भारत की आर्थिक स्वायत्तता बनाये रखना और कठिन कर दिया है. उनकी अप्रत्याशित दबावपूर्ण कूटनीति ने यह असहज सच्चाई सामने ला दी है कि रणनीतिक साझेदारी रणनीतिक स्वार्थ को समाप्त नहीं करती. शुल्कों को हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया है और व्यापार वार्ताओं ने दबावपूर्ण सौदेबाजी का रूप ले लिया है. भारत को प्रौद्योगिकी, निवेश, रक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए अमेरिका की जरूरत है. लेकिन जैसे-जैसे यह संबंध मजबूत होता है, वैसे-वैसे भारत के लिए अपने असहमति के अधिकार को स्पष्ट करना और भी जरूरी हो जाता है. जो साझेदारी असहमति को सहन नहीं कर सकती, वह बराबरी के देशों के बीच साझेदारी नहीं है. भारत की दुविधा यह है कि हर बड़ा संबंध अलग-अलग कारणों से अनिवार्य है.

अमेरिका प्रौद्योगिकी और पूंजी देता है, रूस रक्षा क्षेत्र में निरंतरता और ऊर्जा उपलब्ध कराता है, जबकि चीन एक साथ भारत की सबसे बड़ी एशियाई सुरक्षा चुनौती, अपरिहार्य पड़ोसी और बड़ी आर्थिक शक्ति है. भारत के लिए विवेकपूर्ण स्वायत्तता का अर्थ है कि वह अपनी शर्तों पर वाशिंगटन के करीब जाये, मॉस्को के साथ निकटता बनाये रखे, लेकिन रूस की बीजिंग पर निर्भरता का बंधक न बने. यहीं मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा होती है. पुतिन ने एक महत्वपूर्ण साझेदारी बनाये रखी है, शी के साथ संवाद ने स्थायी शत्रुता को टाला है और वाशिंगटन ने तकनीक तथा रणनीतिक गहराई उपलब्ध करायी है. लेकिन कूटनीति का मूल्यांकन परिणामों से होना चाहिए. दशकों तक भारत की आलोचना इस बात के लिए होती रही कि वह अपनी क्षमता के अनुरूप प्रभाव नहीं डालता.

अब यह आसान टिप्पणी अप्रासंगिक हो चुकी है. आज हर कोई चाहता है कि भारत उसकी दिशा में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करे. इनमें से किसी भी गणना को भारत की अपनी गणना नहीं बनना चाहिए. मोदी का बड़ा खेल ट्रंप, पुतिन और शी को कूटनीतिक तराजू पर अलग-अलग भार की तरह संतुलित करना नहीं है. उनका लक्ष्य भारत को स्वयं ऐसी भारी शक्ति बनाना है जो शक्ति संतुलन को बदल सके. उनकी विरासत इस बात से तय नहीं होगी कि उन्होंने कितने शिखर सम्मेलनों में हिस्सा लिया, बल्कि इससे होगी कि उन्होंने भारत को महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा की वस्तु से उसे प्रभावित करने में सक्षम देश में कितना बदला. जब ट्रंप अमेरिका के हितों, पुतिन रूस के हितों और शी चीन के हितों की गणना करते हैं, तब क्या नयी दिल्ली केवल यह गणना करती रहेगी कि उन्हें कैसे संतुष्ट किया जाये, या धीरे-धीरे उसे यह गणना करनी पड़ेगी कि नयी दिल्ली क्या कदम उठायेगी? (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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लेखक के बारे में

By प्रभु चावला

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