India-Japan relations : सोलहवें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए जापान की प्रधानमंत्री सना तकाइची की भारत यात्रा द्विपक्षीय संबंधों के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हुई. वैसे तो यह वार्षिक शिखर सम्मेलन संस्थागत रूप ले चुके हैं, लेकिन इस बैठक के आसपास का रणनीतिक वातावरण पहले की तुलना में काफी अलग था, क्योंकि चीन ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक दबाव और समुद्री गतिविधियों का दायरा बढ़ा दिया है.
अमेरिका की क्षेत्रीय भूमिका को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, आपूर्ति शृंखलाएं भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील हैं, जिससे भारत और जापान, दोनों पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वे अपनी रणनीतिक समानता को वास्तविक क्षमताओं में बदलें. इसलिए सना तकाइची की भारत यात्रा नयी रणनीतिक दृष्टि की घोषणा से अधिक इस बात का परीक्षण थी कि क्या यह साझेदारी भू-राजनीतिक जोखिमों को संभालने का व्यावहारिक साधन बन सकती है.
पिछले एक दशक में भारत और जापान ने स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत की साझा दृष्टि को व्यक्त करने में काफी कूटनीतिक प्रयास किये. लेकिन हालिया शिखर सम्मेलन ने यह स्वीकार किया कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब भू-आर्थिक साधनों के माध्यम से लड़ी जा रही है. इसलिए दोनों सरकारों ने केवल राजनीतिक समानता को मजबूत करने के बजाय अपनी रणनीतिक साझेदारी को ऐसे तंत्रों में बदलने की कोशिश की, जो पारस्परिक कमजोरियों को कम कर सकें. यानी, भारत-जापान विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी एक नये चरण में प्रवेश कर रही है, जहां लचीलापन और क्षमता निर्माण व्यापक घोषणाओं की जगह ले रहे हैं.
शिखर सम्मेलन का मुख्य केंद्र आर्थिक सुरक्षा पर द्विपक्षीय ढांचे की शुरुआत था. यह संबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव है, क्योंकि अब आर्थिक सहयोग को केवल व्यापार या निवेश के नजरिये से नहीं देखा जा रहा है. दोनों देश औद्योगिक लचीलेपन को राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा मान रहे हैं. यह ढांचा विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने तथा सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज, उन्नत विनिर्माण और रणनीतिक तकनीकों में सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित है. इसका उद्देश्य आर्थिक दबाव के प्रभाव को कम करना भी है. भारत और जापान केंद्रीकृत आपूर्ति शृंखलाओं और परस्पर आर्थिक निर्भरता को हथियार बनाने के रणनीतिक जोखिमों को लेकर सजग हैं.
भारत का विश्वसनीय विनिर्माण साझेदारों पर जोर जापान के आपूर्ति विविधीकरण प्रयासों से मेल खाता है. इस प्रकार दोनों देश रणनीतिक परस्पर निर्भरता का नया मॉडल बनाने की कोशिश कर रहे हैं. निवेश लक्ष्य, विस्तृत आर्थिक साझेदारी समीक्षा, बिजनेस वीक, एआइ ढांचा और सेमीकंडक्टर सहयोग आर्थिक सुरक्षा को संस्थागत रूप देने की दिशा में संकेत करते हैं. बैठक में दोनों देशों ने एआइ पर एक विशेष द्विपक्षीय ढांचा अपनाया, जो भारत के सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम को जापान की उन्नत विनिर्माण, रोबोटिक्स और औद्योगिक स्वचालन क्षमताओं के साथ जोड़ता है.
यह पहल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि औद्योगिक उपयोग, मानक निर्धारण और कार्यबल विकास को भी बढ़ावा देती है. यह इस समझ को दर्शाता है कि भविष्य में तकनीकी प्रतिस्पर्धा केवल नवाचार पर नहीं, बल्कि डिजिटल तकनीकों को उद्योग, लॉजिस्टिक्स और सार्वजनिक ढांचे में लागू करने की क्षमता पर निर्भर करेगी. ऊर्जा सुरक्षा भी साझा चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रही. दोनों देशों ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, समुद्री ऊर्जा परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जतायी. साथ ही, हाइड्रोजन और नयी पीढ़ी की ऊर्जा प्रणालियों में साझेदारी की संभावनाएं भी तलाशने का निर्णय लिया. स्पष्ट है कि ऊर्जा सहयोग अब केवल नवीकरणीय ऊर्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक ऊर्जा सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बन गया है.
सबसे महत्वपूर्ण निर्णय भारत-जापान रक्षा सह-विकास परियोजना की शुरुआत का रहा. वैसे तो पिछले एक दशक में भारत-जापान रक्षा सहयोग अभ्यासों, लॉजिस्टिक्स समझौतों और समुद्री समन्वय के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ा है, पर औद्योगिक सहयोग तुलनात्मक रूप से सीमित रहा है. यह समझौता दर्शाता है कि अब दोनों देश रक्षा साझेदारी को औद्योगिक विकास से जोड़कर देख रहे हैं, जिससे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तकनीकों का साझा विकास और उत्पादन संभव हो सके. यह पहल सफल होती है, तो भारत-जापान संबंधों का सबसे परिवर्तनकारी पहलू बन सकती है. इस शिखर सम्मेलन ने आर्थिक और रणनीतिक नीतियों के बीच बढ़ती समानता को उजागर किया.
भारत और जापान अब व्यापार, निवेश और सुरक्षा को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करने वाले तत्वों के रूप में देख रहे हैं. इसी दृष्टिकोण से सीइपीए की समीक्षा और आधुनिकीकरण का निर्णय लिया गया, ताकि इसे डिजिटल व्यापार, महत्वपूर्ण तकनीकों और लचीले विनिर्माण जैसे आधुनिक क्षेत्रों के अनुरूप बनाया जा सके. सना तकाइची की भारत यात्रा का निवेश पक्ष भी महत्वपूर्ण रहा. इस दौरान जापान ने भारत में निवेश बढ़ाने की अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता दोहरायी. जापान की प्रधानमंत्री के साथ आये व्यावसायिक प्रतिनिधियों ने विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, मोबिलिटी और स्वच्छ ऊर्जा में नये सहयोगों की घोषणा की.
ये घोषणाएं एक नयी प्रवृत्ति के बारे में बताती हैं. वह यह कि जापान द्वारा किया जाने वाला निवेश अब सिर्फ साझा व्यावसायिक उद्देश्यों से संचालित नहीं है, बल्कि यह निवेश उन खास-खास क्षेत्रों में हो रहा है, जिन्हें दोनों देश जरूरी और महत्वपूर्ण मानते हैं. जापान की प्रधानमंत्री की इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भारत-जापान संबंधों में आर्थिक सुरक्षा को केंद्र में स्थापित कर दिया. यह साझेदारी अब रणनीतिक क्षमता निर्माण पर आधारित होती जा रही है.
दोनों देश ऐसे आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक आधार तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो उन्हें बदलते वैश्विक परिदृश्य में आत्मनिर्भर बनाये रखें. यह साझा दृष्टि कूटनीतिक समन्वय ला सकती है, लेकिन स्थायी रणनीतिक साझेदारी संस्थानों, औद्योगिक तंत्र और तकनीकी सहयोग से ही बनती है, जो लंबे समय तक के लिए खतरों से उबरने की क्षमता प्रदान करते हैं. सोलहवें शिखर सम्मेलन के परिणाम बताते हैं कि भारत और जापान इस वास्तविकता को समझने लगे हैं. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जहां खुला संघर्ष कम और निरंतर प्रतिस्पर्धा अधिक है, वहां क्षमता निर्माण ही भविष्य के संबंधों की दिशा तय करेगा. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
