भारत-इयू डील से डिफेंस में मिलेगी मदद

India-EU-Deal : यह साझेदारी दोनों पक्षों के लिए बहुत लाभदायक होगी, साथ ही दुनिया के अन्य देशों पर भी इसका काफी असर पड़ेगा. इस समझौते के बाद भारत को अमेरिका के साथ, एशिया के देशों के साथ और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी.

India-EU-Deal : जब दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डाेनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड टैक्स की बात की थी, तो उससे यूरोपीय संघ (इयू) के देश हिल गये थे. दरअसल, ट्रंप ने कहा था कि वह एक फरवरी से यूरोपीय संघ के आठ देशों पर टैरिफ की दर बढ़ा देंगे. हालांकि एक फरवरी से जो अतिरिक्त टैरिफ लगना था, वह अब लागू नहीं हो रहा है. ऐसे में यूरोपीय संघ के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह अपना नया साझेदार बनाये, ताकि एक नियम आधारित या कहें कि खुले व उदार व्यापार मॉडल के जरिये व्यापार हो सके. इस स्थिति में यदि यूरोपीय संघ चीन के साथ जाता, तो कनाडा की तरह उस पर भी ट्रंप 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी देते. इसलिए यूरोपीय संघ ने बहुत सोच-विचार के बाद भारत के साथ समझौता करने का निर्णय लिया. इसी कारण इस समझौते को ऐतिहासिक माना जा रहा है.


हालांकि, पहले यूरोप के भीतर थोड़ा संशय था कि भारत जैसे देश के साथ वह समझौता करे या न करे, क्योंकि भारत के रूस के साथ अच्छे संबंध हैं. पर विश्व के अंदर अभी जिस तरह के हालात बने हुए हैं, उसमें यह बहुत आवश्यक था कि भारत और यूरोपीय संघ आपस में मिलकर दीर्घकालिक संबंध की दिशा में आगे बढ़ें. दोनों पक्षों के बीच जो समझौता हुआ है, उसमें रक्षा और सुरक्षा यानी डिफेंस और सिक्योरिटी के साथ-साथ मोबिलिटी ऑफ पर्सनल, टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन की बात शामिल है.

इसके साथ ही मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौते की भी बात हुई है. इस समझौते को गेम चेंजर माना जाना चाहिए, क्योंकि जब अमेरिका और चीन एक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तब बाकी के देशों के लिए भी यह उपयुक्त समय है कि वे मिलकर अपने संबंधों को आगे बढ़ायें, ताकि वे हर तरीके से अपने हितों की रक्षा कर सकें. आप देखिए कि लगभग 2007 से ही भारत और यूरोपीय संघ के बीच समझौते की बातें चलती रही हैं, लेकिन अभी तक इस पर कोई निर्णय नहीं हो पा रहा था और अब जाकर यह समझौता हुआ है.

यह भारत के लिए बहुत आवश्यक था, क्योंकि अमेरिका ने जिस प्रकार भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है, उससे भारत के निर्यातकों- विशेषकर मरीन प्रोडक्ट्स, जेम्स व ज्वेलरी, टेक्सटाइल, एपरेल क्षेत्र- को बहुत हानि हुई है. अब जब यह समझौता हो गया है, तो इससे हमारे निर्यातकों को यह उम्मीद बंधी है कि तत्काल नहीं, तो कुछ महीनों के बाद ही सही, पर उनके लिए यूरोप का बाजार खुल जायेगा. हालांकि, नये उत्पादों को यूरोप के बाजार से कितना लाभ मिलेगा, इस बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी है, पर जो उत्पाद अमेरिकी बाजारों में जा रहे थे, वे यूरोप के बाजार में स्वीकार किये जा सकते हैं, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए.


यहां इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह समझौता रणनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहा है. व्यक्तिगत स्तर पर तो यूरोप के अलग-अलग देशों के साथ हमारी साझेदारी रही है, पर ऐसा पहली बार होगा कि व्यापार के साथ ही रक्षा, साइबर सुरक्षा और स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में यूरोप के 27 देशों के साथ भारत एक दीर्घकालिक संबंध में बंध रहा है. यह साझेदारी दोनों पक्षों के लिए बहुत लाभदायक होगी, साथ ही दुनिया के अन्य देशों पर भी इसका काफी असर पड़ेगा. इस समझौते के बाद भारत को अमेरिका के साथ, एशिया के देशों के साथ और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी अपने संबंधों को और मजबूत करने में मदद मिलेगी.

यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को बहुत महत्व मिला है, उसका प्रभाव बढ़ा है. क्योंकि अब तक यूरोपीय संघ के देश कहते रहे हैं कि रूस के प्रति भारत को अपना रवैया बदलना होगा और यूरोप ने रूस पर जो प्रतिबंध लगाया है, उसमें भारत को सहयोग करना चाहिए. पर यूरोपीय संघ के देशों ने अचानक से अपना रुख बदलकर यह कहना शुरू कर दिया कि भारत को रूस से संबंध तोड़ने के लिए कहना उसकी संवेदनशीलता को ठेस पहुंचा सकता है, इसलिए इस बारे में ज्यादा बातें न हों.


यहां यह बात भी करना जरूरी है कि पर्यावरण का मसला यूरोप के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है और भारत हमेशा से इसे लेकर कहता रहा है कि यह नॉन-टैरिफ बैरियर है और यह भारत जैसे विकासशील देशों के यहां से जो सामान आता है, उस पर रोक लगाने का एक तरीका है. पर लगता है कि दीर्घावधि में इसे लेकर यूरोप भारत को समझेगा, क्योंकि भारत ने काफी प्रयास किया है पर्यावरण से संबंधित सुधारों को लेकर. हालांकि, अभी तक यूरोप ने ऐसा निर्णय नहीं लिया है कि वह भारत पर किसी तरीके का कोई नॉन-टैरिफ बैरियर लगायेगा.

ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि धीरे-धीरे यह रोक थोड़ी कम होगी. साथ ही, भारत भी अपने उत्पादों को और अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बनायेगा. अब हम उन क्षेत्रों की बात करते हैं, जिन्हें इस समझौते से सर्वाधिक लाभ मिलने की संभावना है. जो भी भारतीय उत्पाद अमेरिका भेजे जा रहे थे और जिन पर ट्रंप ने अत्यधिक टैरिफ लगा दिया था, उन उत्पादों को अब एक अच्छा और सुनिश्चित बाजार मिलने की उम्मीद है. बाकी वस्तुओं और तकनीक के लिए मैं यह कहना चाहूंगा कि भारत को उनकी गुणवत्ता बढ़ानी होगी और उसके लिए हमें जो भी कदम उठाने पड़ें, वे उठाने चाहिए. भारत को एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ जल्द से जल्द आपूर्ति शृंखला भागीदारी बनानी होगी, ताकि हम अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ा सकें और यूरोप के मानक पर खरा उतर सकें.


अब बात अमेरिका की, तो उसे यह समझौता बिल्कुल भी पसंद नहीं आयेगा, क्योंकि दुनिया बहुध्रुवीय दिशा में चल रही है और अमेरिका को ऐसा लगता है कि यह उसके लिए अच्छा नहीं है. उसने बार-बार कहा है कि वह उन देशों पर और अधिक टैरिफ लगायेगा, जो व्यापार के लिए आपस में साझेदारी कर रहे हैं और खासकर जिसमें चीन, रूस या ब्रिक्स देशों की भागीदारी होगी. पर महत्वपूर्ण यह है कि कम से कम यूरोप ने अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी- रूस और चीन- के साथ तो समझौते नहीं किये हैं. यह समझौता उन्होंने भारत के साथ किया है, जिसके बारे में बार-बार अमेरिका ने कहा है कि वह उसका मित्र देश है और वह भारत के साथ व्यापार समझौता करना चाहता है. तो मेरी समझ से बहुत सोच-समझकर यह व्यापार समझौता किया गया है, जिसमें यूरोपीय संघ और भारत दोनों का लाभ है.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By शशांक

शशांक is a contributor at Prabhat Khabar.

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