संकट को अवसर में बदल सकता है भारत, पढ़ें अभिजीत मुखोपाध्याय का आलेख

India Growth: वर्तमान संकट को भारत की क्षमता की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि इसे अनुशासन के साथ संभाला गया, तो यह स्थिति तेज ऊर्जा परिवर्तन, बेहतर लॉजिस्टिक्स और अधिक सुरक्षित सप्लाई चेन को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना सकती है. भारत पहले भी बाहरी झटकों का सामना कर चुका है और वर्तमान नीतिगत ढांचा पहले की तुलना में अधिक सक्षम है, जो अस्थिरता को संभालते हुए परिवारों और व्यवसायों की रक्षा कर सकता है. भारत की नीतिगत चुनौती विकास को स्थिर बनाए रखते हुए कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है.

India Growth: होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिरोध का भारी असर वैश्विक अर्थव्यवस्था झेल रही है. इसका असर सबसे अधिक तेल और ऊर्जा क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कम ईंधन उपयोग करने, कम सोना खरीदने, विदेशी यात्राएं टालने और संभव हो, तो घर से काम करने जैसी सलाह दी थी. मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ये सुझाव विवेकपूर्ण हैं. हालांकि इन सुझावों ने अनिश्चितता का वातावरण भी पैदा कर दिया. भारत इस परिस्थिति को संभाल सकता है और अच्छी बात यह है कि उसके पास पहले से कई नीतिगत साधन मौजूद हैं, जो विकास की गति बनाये रखते हुए इस झटके को कम कर सकते हैं.

सही तरीका घबराना नहीं, बल्कि ऊर्जा प्रबंधन, लक्षित राहत, सप्लाई-साइड उपायों और विश्वसनीय व्यापक आर्थिक संकेतों का संतुलित मिश्रण अपनाना है. भारत पहले भी बाहरी झटकों का सामना कर चुका है और वर्तमान नीतिगत ढांचा पहले की तुलना में अधिक सक्षम है, जो अस्थिरता को संभालते हुए परिवारों और व्यवसायों की रक्षा कर सकता है. तत्काल समस्या एक पारंपरिक आयातित लागत झटका है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कठिन शिपिंग परिस्थितियां और घरेलू ईंधन मूल्यों में वृद्धि परिवहन, लॉजिस्टिक्स और अंततः खुदरा महंगाई पर असर डालती हैं.

सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत कमजोर आर्थिक आधार पर खड़ा नहीं है. हाल की सरकारी परियोजनाओं और नीतिगत बयानों में मजबूत विकास, राजकोषीय संतुलन और सप्लाई-साइड परिस्थितियों में सुधार पर जोर दिया गया है, जबकि रिजर्व बैंक ने बदलती परिस्थितियों के अनुसार हाल ही में महंगाई और विकास के अनुमानों में संशोधन किया है यानी प्राथमिक नीतिगत लक्ष्य संकट को नियंत्रित करना है, बचाव अभियान चलाना नहीं. पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि अस्थायी लागत झटका व्यापक महंगाई के चक्र में न बदल जाए. सरकार यह काम ईंधन मूल्य समायोजन को व्यवस्थित रखते हुए, अचानक मूल्य वृद्धि से बचते हुए तथा यथासंभव तेल विपणन प्रणाली का उपयोग कर अस्थिरता को नियंत्रित करके कर सकती है.

दूसरा कदम सबसे कमजोर परिवारों की सुरक्षा का होना चाहिए, न कि कीमतों को अंधाधुंध नियंत्रित करने का प्रयास. मध्यम अवधि में महंगाई को नियंत्रित करने का सबसे मजबूत उपाय सप्लाई-साइड विस्तार है. सरकार संवेदनशील और आवश्यक खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति और खरीद प्रबंधन को तेज कर सकती है, बफर स्टॉक संचालन में सुधार कर सकती है और आंतरिक लॉजिस्टिक्स को सुचारु रख सकती है, ताकि खाद्य महंगाई ईंधन झटके को और न बढ़ाए. परिवहन और वितरण में रुकावटों को कम करना भी जरूरी है. यदि माल ढुलाई लागत तेजी से बढ़ती है, तो इसका असर जल्द ही ईंधन से खाद्य पदार्थों, विनिर्मित वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच जाता है. बेहतर लॉजिस्टिक्स समन्वय, राजमार्गों पर सुचारु आवागमन और आवश्यक वस्तुओं की समय पर आपूर्ति इस प्रभाव को कम कर सकती है. ऊर्जा सुरक्षा ही इस समस्या का मूल रणनीतिक समाधान है.

भारत पहले ही कच्चे तेल की खरीद में विविधता ला चुका है. इस विविधता को और बढ़ाया जाना चाहिए. रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी महत्वपूर्ण हैं. भारत ने भंडारण क्षमता विकसित की है और इसके विस्तार की संभावनाओं का आकलन जारी रखा है. साथ ही, मांग प्रबंधन को ऊर्जा नीति का स्पष्ट हिस्सा बनाया जाना चाहिए. ऊर्जा दक्षता मानक, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, औद्योगिक ऊर्जा ऑडिट और मांग-पक्ष प्रबंधन आयातित तेल झटकों के प्रति अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता को कम कर सकते हैं. यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह संकट केवल कीमतों से जुड़ा नहीं है, लचीलापन भी इसका हिस्सा है. अर्थव्यवस्था जितनी कम तेल-निर्भर होगी, बाहरी झटकों का प्रभाव उतना ही कम होगा. वृहद आर्थिक स्तर पर, रिजर्व बैंक और सरकार को सतर्क रहना चाहिए. यदि संकट मुख्य रूप से सप्लाई-साइड आधारित रहता है, तो मौद्रिक नीति को अनावश्यक रूप से विकास को बाधित करने से बचना चाहिए.

साथ ही महंगाई की अपेक्षाओं को भी नियंत्रित रखना चाहिए. रिजर्व बैंक की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि महंगाई का मूल परिदृश्य संभालने योग्य है, पर वैश्विक तेल कीमतों व भू-राजनीतिक जोखिमों पर निगरानी जरूरी है. राजकोषीय नीति को अनुशासित, पर लचीला बनाए रखना चाहिए. सरकार लगातार राजकोषीय संतुलन की दिशा में आगे बढ़ रही है, और यह विश्वसनीयता कठिन समय में एक महत्वपूर्ण संपत्ति है. सही राजकोषीय दृष्टिकोण यह होगा कि लक्षित हस्तक्षेपों के लिए पर्याप्त गुंजाइश बची रहे. इसका अर्थ है पूंजीगत व्यय की रक्षा करना, क्योंकि यह रोजगार और उत्पादकता को बढ़ावा देता है, जबकि आवश्यकता पड़ने पर सावधानीपूर्वक तैयार अस्थायी उपायों का उपयोग किया जाये.

भारत को इस समय को व्यापार और सप्लाई चेन विविधीकरण को तेज करने के अवसर के रूप में भी देखना चाहिए. निर्यात की मजबूती तब बढ़ती है, जब कंपनियां सीमित मार्गों पर निर्भर न रहकर विभिन्न बाजारों और उत्पादन नेटवर्क से जुड़ती हैं. वैकल्पिक व्यापार मार्गों को मजबूत करना, साझेदारियां गहरी करना और मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित करना किसी एक भू-राजनीतिक बाधा पर निर्भरता को कम कर सकता है. यह तेल-निर्भर क्षेत्रों जैसे उर्वरक, रसायन और परिवहन उपकरणों में घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने का भी अच्छा समय है. व्यापक उद्देश्य यह होना चाहिए कि समय के साथ भारत आयातित महंगाई के प्रति कम संवेदनशील बने.

नीति-निर्माताओं के लिए सबसे रचनात्मक संदेश यह है कि भारत के पास विकल्प मौजूद हैं, ऊर्जा विविधीकरण, राजकोषीय अनुशासन, सप्लाई-साइड प्रबंधन और लक्षित कल्याणकारी सहायता मिलकर काम कर सकते हैं. ऐसा रोडमैप नीतिगत परिपक्वता दर्शाएगा. इसलिए वर्तमान संकट को भारत की क्षमता की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि उसके भविष्य पर तत्काल निर्णय के रूप में. यदि इसे अनुशासन के साथ संभाला गया, तो यह स्थिति तेज ऊर्जा परिवर्तन, बेहतर लॉजिस्टिक्स और अधिक सुरक्षित सप्लाई चेन को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना सकती है. भारत की नीतिगत चुनौती विकास को स्थिर बनाए रखते हुए कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है, और इस दिशा में उपलब्ध साधन व्यापक तथा व्यावहारिक हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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