हूल: भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम

बाजार अर्थव्यवस्था में जहां श्रम अर्थव्यवस्था में मात्र एक उत्पादन का कारक रह जाता है. ऐसे समय में कल्याणकारी राज्य की यह जिम्मेवारी हो जाती है कि पीछे छूट रहे सामाजिक समूहों के प्रति सदियों से हुए अन्याय का समाधान किया जाय.

रवींद्रनाथ महतो, स्पीकर, झारखंड विधानसभा

दामिन ए कोह से निकली हुई नगाड़ों की गूंज थी हूल. उत्पीड़न और शोषण के विरुद्ध संथाल आदिवासी द्वारा संग्राम का आह्वान था. 400 से अधिक गांवों के प्रतिनिधि वीर सिदो-कान्हू के नेतृत्व में भोगनाडीह गांव में 30 जून 1855 में संगठित होकर अंग्रेजी हुकूमत और स्थानीय शासन के खिलाफ एक सुर में बिगुल फूंका था. स्वतंत्रता के इतिहास में यह विद्रोह संथाल विद्रोह के नाम से जाना गया. अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा लागू की गयी स्थायी बंदोबस्ती उस दौर में राजस्व व्यवस्था का एक ऐसा तरीका बन गया था, जिसने नवजमींदारों, साहुकारों और गुमास्ता की फौज तैयार कर दी, जो मानभूम, हजारीबाग, बांकुड़ा, सिंहभूम आदि में वास करने वाले सीधे-साधे संथाल आदिवासियों पर जुल्म कर रहे थे.

बढ़े हुए ब्याज को अदा नहीं किये जाने पर आदिवासियों से बेगारी कराई जाती थी. उनकी जमीनें नीलाम करा दी जाती थीं. मवेशी छीन लिये जाते थे. आर्थिक और शारीरिक यातनाएं दी जाती थीं. इस जुल्म के खिलाफ वे इतने उद्वेलित हो उठे कि जंगलों से भरा यह इलाका विद्रोह की आग से धू-धू कर जल उठा था. इस पर काबू पाने के लिए अंग्रेजी सत्ता को पूर्णिया और कलकत्ता से सेना की टुकड़ियां बुलानी पड़ीं. विद्रोहियों ने साहूकारों, जमींदारों के मकानों पर भी हमले बोले. अंग्रेजी शासन की समाप्ति की घोषणा कर दी.

सिदो-कान्हू ने आदिवासियों को संबोधित करते हुए कहा- ठाकुर जी भगवान ने हमें आदेश देते हुए कहा कि ‘“यह देश साहेब का नहीं, आजादी के लिए अब हथियार उठा लो.” 1857 के विद्रोह से महज दो साल पूर्व शुरू हुआ यह विद्रोह कोई मामूली विद्रोह नहीं था. इसने स्थानीय बिचौलियों का नाश कर दिया. डीक शासन व्यवस्था को हिला कर रख दिया था.

अंग्रेजी सेना को निहत्थे चुनौती देने वाले संथाल आदिवासियों की इस स्वर्णिम गाथा को भले ही स्वतंत्रता के इतिहास में बहुत कम जगह मिल पायी हो, परंतु इससे मिली प्रेरणा अद्वितीय थी. इसने स्वतंत्रता आंदोलनों के साथ वर्त्तमान झारखंड निर्माण के लिए हुए व्यापक जनआंदोलनों के आंदोलनकारियों को भी सींचा है. वास्तव में संथाल विद्रोह उपनिवेशवादी ब्रितानी शासकों द्वारा स्थापित बाजार अर्थव्यवस्था से सीधे-साधे आदिवासी जनता के टकराव के कारण उपजा एक विशाल विद्रोह था.

प्रसिद्ध विद्वान एल महापात्र ने सामाजिक आंदोलनों को परिभाषित करते हुए लिखा है कि सामाजिक आंदोलन समाज के एक बड़े समूह द्वारा सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था को परिवर्तित, पुनर्गठित, पुनर्व्याख्यायित, पुनर्स्थापित, सुरक्षित, अनुपूरित एवं निर्मित करने की दिशा में किया गया सामूहिक प्रयास अथवा जीवन के बेहतर अवसरों को प्राप्त करने के उद्देश्य से शक्ति के नियंत्रण के पुनर्विभाजन की दिशा में किया गया प्रयास है.

हूल क्रांति के नायकों के द्वारा जनता को संगठित करने के लिए अमल में लायेे तरीकों को बाद के वर्षों में सफलतापूर्वक अन्य क्रांतिकारियों द्वारा प्रयोग में लाया गया. उदाहरण के लिए, उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण कर अपने आप को संथालों के मध्य उनके नायक के रूप में स्थापित किया. जन मानस को आकर्षित करने के लिए कान्हू के द्वारा दुर्गापूजा पूरे धूमधाम से मनाया गया. इस विद्रोह का दमन अत्यंत ही क्रूरता के साथ किया गया.

आंदोलन के बाद संथालों को बढ़े हुए दर पर लगान का भुगतान करना पड़ा. बहुत सारे ग्रामीण प्रधानों को अपने पद से पदच्युत किया गया और बहुत सी बेलगान जमीन जमीनदारों द्वारा छीन ली गयी. वर्ष 1886 में उपायुक्त, संथालपरगना के न्यायालय द्वारा दासु मांझी के मामले में किया गया निर्णय इस शोषण ओर दमन की एक दुखद कहानी प्रस्तुत करता है. दासु मांझी एक ग्राम प्रधान थे. उनके दादा ने एक जमींदारी स्थापित की थी, जिसमें यह प्रथा थी कि छ: साल का पट्टा हरेक बार 20 रुपये लगान बढ़ा कर की जा सकती थी.

बंदोबस्ती के पांच वर्ष पूर्व दासु ने अपने पिता से प्रधानी प्राप्त की. एक साल की अवधि पूरी होने के पूर्व ही उनकी लगान 535 रुपये बढ़ा दी गई और जमींदार ने अपनी भूमि इजारेदार को दे दी. बंदोबस्ती के आठ साल बाद दासु पर लगान के लिए मुकदमा चलाया गया. मुकदमा 129 रुपये का था. दासु ने समय की मांग की. अदालत ने मांग खारिज कर दी. उनकी निजी जोत की जमीन 100 रुपये में बेच दी गयी, जो राजस्ववाद में किये गये दावे से 29 रुपये कम थी. दासु की जमीन एक उत्तर भारतीय भगत को बेच दी गयी. भगत ने जमीन खरीद ली और इस प्रकार एक पूरे संथाली ग्राम समाज का नियंत्रण परिवर्तित हो गया. राजस्ववाद के बाकी बचे पैसे को चुकाने के लिए दासु ने अपना पद एक हलवाई के हाथों बेच दिया और दासु अपने ही रैयतों के किरायों के श्रमिक हो गये.

संथालपरगना में अनेक ऐसी कहानियां आज हूल दिवस पर अपने लिये न्याय मांगती हैं. यहां के जनता के विरुद्ध अंग्रेजी हुकूमत द्वारा जो अन्याय किया गया, उसका हिसाब यहां के लोग आज तक चुका रहे हैं. बाजार अर्थव्यवस्था में जहां श्रम अर्थव्यवस्था में मात्र एक उत्पादन का कारक रह जाता है. ऐसे समय में कल्याणकारी राज्य की यह जिम्मेवारी हो जाती है कि पीछे छूट रहे सामाजिक समूहों के प्रति सदियों से हुए अन्याय का समाधान किया जाय. आइए इस हूल दिवस पर संथालपरगना में अंतिम पंक्ति पर खड़े हर इंसान से कल्याण का संकल्प लें कि हमारे पूर्वजों ने अपनी लहू से जिस भूमि को सींचा है उस भूमि पर विकास की फसल लहलहाने में सरकार का सहयोग करें.

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Published by: संपादकीय

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