प्राचीन भारत में नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला ने दर्शन, खगोल विज्ञान, गणित और चिकित्सा के क्षेत्र में ज्ञान का प्रसार किया. भास्करचार्य की पुत्री लीलावती ने बीजगणित की नींव रखी, जबकि ब्रह्मगुप्त ने ऋणात्मक संख्याओं के नियम का प्रतिपादन किया. 'सुश्रुत संहिता' शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक शल्य चिकित्सा और मोतियाबिंद शल्य चिकित्सा पर प्रथम चिकित्सा ग्रंथ है, जबकि 'चरक संहिता' आंतरिक विकारों का एक विश्वकोश है. नागार्जुन द्वारा रचित 'रसायन शास्त्र' औषधियों के निर्माण की विधि सिखाता है. वराहमिहिर की 'पंचसिद्धांतिका' में पांच खगोलीय प्रणालियों का संश्लेषण किया गया है.
इक्कीसवीं सदी में चैटजीपीटी और जेनरेटिव एआइ, निजी अंतरिक्ष उड़ानें, एआर और वीआर जैसी इमर्सिव तकनीक, स्मार्ट फोन, 5जी, सोशल मीडिया, ड्रोन, ह्यूमनॉइड रोबोट, गेमिंग, मशीन लर्निंग, 3-डी प्रिंटिंग ने मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है. वहीं यह सदी पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और नैतिक मूल्यों के अभाव से जूझ रही है. यह स्थिति हमें प्राचीन भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर पुन: विचार करने को प्रेरित करती है. जैसे, आयुर्वेद, भारतीय चिकित्सा विज्ञान की पारंपरिक प्रणाली है, जिसमें मन और शरीर से संबंधित ज्ञान सम्मिलित है. इसकी प्रासंगिकता 21वीं सदी में भी उतनी ही है. प्राचीन भारत में आहार भी विज्ञान पर आधारित था. यह दोषों को संतुलित करने के लिए षड् रस के उचित सेवन की शिक्षा देता है. आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य का भी वर्णन है.
आज लाखों लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोग जैसी जीवन शैली संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं, जो देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर दबाव डाल रही हैं. भारत में मधुमेह से पीड़ित वयस्कों का स्थान वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे अधिक है. ऐसे में, आयुर्वेद सिद्धांतों की शिक्षा, स्वस्थ जीवन शैली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. आयुर्वेद में जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों का समाधान दोष संतुलन द्वारा दिनचर्या, ऋतुचर्या और त्रयोपस्तंभ के जरिये किया जाता है. आयुर्वेद को आज राष्ट्रीय व वैश्विक मान्यता प्राप्त है. भारत में डब्ल्यूएचओ के ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन का गठन समकालीन महामारियों में आयुर्वेद के योगदान का प्रमाण है. वर्ष 2017 से एम्स, ऋषिकेश जैसे संस्थानों के आयुष विभाग त्रिदोष सिद्धांतों पर आधारित आयुर्वेद के साथ समकालीन चिकित्सा को सम्मिलित कर जीवनशैली संबंधी विकारों का उपचार कर रहे हैं.
उसी वर्ष से नयी दिल्ली स्थित अखिल एम्स मॉडल के अनुरूप शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए पूरी तरह से कार्यरत है. आजकल बच्चे कई प्रकार के तनाव से गुजर रहे हैं. इनमें परीक्षाओं और सोशल मीडिया का दबाव मुख्य हैं. महर्षि पतंजलि के द्वितीय सूत्र, 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:' के अनुसार चित्त का निरोध ही योग है. योग शिक्षा शारीरिक रूप से लचीलापन और शक्ति बढ़ाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत कर तथा श्वसन एवं पाचन तंत्र में सुधार कर स्वास्थ्य में वृद्धि करती है. मानसिक स्तर पर यह तनाव और चिंता कम करती है, एकाग्रता, स्मृति, भावनात्मक संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ाती है. संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को 177 देशों का समर्थन मिलना योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी में असीम सफलता के बावजूद आज हम पर्यावरण संकट और जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं.
प्राचीन भारत में पर्यावरण को सजीव और चेतन के रूप में देखा जाता था. अत: पृथ्वी की सुरक्षा हमारा आध्यात्मिक और नैतिक कर्तव्य है. प्राचीन भारत में कृषि, मिश्रित खेती, जैविक खाद आदि के आधार पर जाती थी, जबकि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों के दुष्प्रभाव आज चुनौती बन गये हैं. जलवायु परिवर्तन और जल, वायु तथा भूमि प्रदूषण वैश्विक संकट हैं. ऐसे में, हमारे वैदिक, पौराणिक तथा लोक-परंपरागत मान्यताओं को शिक्षा में पुन: शामिल करने की जरूरत है. यह कदम पर्यावरण संरक्षण की ओर ले जायेगा. इसरो की उपलब्धियां, जैसे-मंगलयान, चंद्रयान-1, चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 पारंपरिक भारतीय गणित और खगोल विज्ञान के प्रेरक प्रभाव के जीवंत उदाहरण हैं. शिक्षा पाठ्यक्रम में प्राचीन खगोलशास्त्र के साथ आधुनिक खगोल विज्ञान का समावेश-जैसे, 12 राशियों की खगोलीय गति का पारंपरिक सिद्धांत एवं आधुनिक केप्लर नियम छात्रों में जहां गणितीय-खगोलीय चेतना जागृत करेगा, वहीं यह भविष्य में इसरो जैसे राष्ट्रीय संस्थानों का हिस्सा बनने के लिए भी प्रेरित करेगा.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुरूप स्टेम शिक्षा के साथ भारत की वैदिक-शास्त्रीय वैज्ञानिक विरासत को एकीकृत कर पुनर्स्थापित किया जायेगा, जो अगली पीढ़ी को स्वदेशी गौरव और वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा देने के लिए भी प्रेरित करेगा. प्राचीन वास्तुशास्त्र भवन निर्माण के वैज्ञानिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन है. यह सूर्य की गति, हवा की दिशा, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और पंच तत्वों के संतुलन के आधार पर प्राकृतिक प्रकाश, वायु-संचालन, ऊर्जा प्रवाह और पर्यावरणीय सामंजस्य सुनिश्चित करता है. आधुनिक वास्तुकला में इसका उपयोग ग्रीन बिल्डिंग, ऊर्जा-कुशल निर्माण, प्राकृतिक प्रकाश, एयर कंडीशनिंग, वर्षा जल संग्रहण और सौर ऊर्जा में किया जाता है. आइआइटी, खड़गपुर और अन्य संस्थानों में किये गये अध्ययनों के अनुसार, वास्तुशास्त्र की खुली आंगन प्रणाली ने सामयिक निष्क्रिय शीतलन की तुलना में 40 फीसदी ऊर्जा बचत प्रदर्शित की है.
स्थानीय संसाधनों के उपयोग से कार्बन फुटप्रिंट में कमी आयी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 वास्तुकला पाठ्यक्रम में वास्तुशास्त्र को शामिल करने का समर्थन करती है. हरित प्रमाणन, सौर प्रणाली विश्लेषण और मंदिर/हवेली केस स्टडी छात्रों में सतत डिजाइन के प्रति जागरूकता बढ़ायेगी, जिससे शून्य-ऊर्जा और जलवायु-लचीली संरचनाओं के लिए वैज्ञानिक विरासत को पुनर्जीवित कर वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी. स्कूली पाठ्यक्रम में छात्रों को सूर्यगणना सॉफ्टवेयर विश्लेषण एवं हरित प्रमाणन का अध्ययन कराया जाना चाहिए. यह जलवायु अनुकूलन एवं शून्य ऊर्जा भवनों हेतु प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को पुनर्स्थापित कर वैश्विक स्थिरता लाने में मदद करेगा. प्राचीन भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी अतीत का एक अध्याय नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक है. भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए अब इस विरासत को बुनियादी पाठ्यक्रम में शामिल करने की जरूरत है. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
