स्वास्थ्य सेवाएं सबकी पहुंच में हों

संभ्रांत वर्ग और आम जनता के बीच एक विभाजन की स्थिति है. पूरा तंत्र आदतन भ्रष्ट बन चुका है, जो केवल पैसा, जुगाड़ और पहुंच की बात करता है न कि इलाज और देखभाल की.

जगदीश रत्नानी, वरिष्ठ पत्रकार एवं फैकल्टी सदस्य, एसपीजेआइएमआर

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भारत के बड़े शहरों और छोटे कस्बों में आम जनता के दिमाग में निजी अस्पतालों को लेकर एक ऐसी छवि बन गयी है कि वे मारने के लिए तैयार बैठे हैं. इसका संकेत सभी जगह दिख रहा है और लगभग पतन की स्थिति बन चुकी है. आधुनिक दौर की भव्य इमारतों में सजे अस्पताल, जिन्हें बड़े मधुरता के साथ स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल कहते हैं, वे बिस्तरों के लिए मोलभाव करने से नहीं हिचकते और मरीजों को लौटाने एवं स्वास्थ्य संकट के बीच मानवता के शर्मनाक चेहरे को पेश करते हैं. यह सच है कि सभी इस खेल में शामिल नहीं है, लेकिन कुछ लोगों ने देश में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र को पूर्ण रूप से बदनाम कर दिया है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने साफ शब्दों में कहा- पहले वे कहते हैं कि बेड नहीं हैं. फिर उन्होंने कहा कि हमें एक बेड के लिए दो लाख, पांच लाख और आठ लाख रुपये दो. आखिर यह क्या है, क्या यह बेड की कालाबाजारी नहीं है? माफिया के इस संजाल को तोड़ने में कुछ समय लगेगा. मुंबई महामारी से त्रस्त है. बेतहाशा धन उगाही के मामले सामने आने के बाद पिछले महीने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने निजी अस्पतालों की फीस की सीमा तय कर दी.

शहर के सभी प्रमुख अस्पताल निजी तौर पर समृद्ध और बड़े नेटवर्क वाले लोगों द्वारा चलाये जाते हैं. इन लोगों ने एक बैठक कर संदेश भेजा कि शुल्कों के निर्धारण सीमा पर पुनर्विचार किया जाये. मुख्यमंत्री ने निजी अस्पतालों से कहा है कि वे 80 प्रतिशत बेड कोविड मरीजों के लिए आरक्षित रखें और इसके लिए राज्य के अधिकारियों को निगरानी के लिए कहा गया था.

देश के दो बड़े शहरों में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आनेवाले नेताओं द्वारा चरम स्थिति में पहुंची महामारी के खिलाफ लड़ाई से स्पष्ट है कि भारत का स्वास्थ्य तंत्र किस दशा में पहुंच चुका है. भुगतान कर पाने में सक्षम लोग निजी अस्पतालों की तरफदारी कर रहे हैं. सभी प्रकार की उच्च प्रणाली और प्रक्रियाओं से युक्त होने से भारत को दुनिया के कुछ उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देशों के समकक्ष खड़ा होने का एहसास देते हैं.

यही वजह है कि मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा मिल रहा है और बड़ी संख्या में विदेशी, विकसित देशों के मुकाबले कम खर्च में भारत में इलाज कराने के लिए आकर्षित होते हैं. अस्पतालों को विशेष रियायतें देकर इस व्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसमें मेडिकल सेवाओं के लिए वीजा और अन्य सहूलियतें होती हैं, जो स्पष्ट तौर पर सब्सिडी और भारत के गरीबों पर भार हैं.

दूसरी तरफ, सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को पर्याप्त धन और समर्थन नहीं मिलता है. इन पर बड़ी संख्या में मरीजों के देखभाल का जिम्मा होता है. वे आधारभूत सुविधाओं से महरूम हैं और वहां अधिकांश उपकरण खराब हो चुके हैं. इस अंतर को बहुत आसान शब्दों में समझा जा सकता है. सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल में मरीज को अच्छे दृश्य के साथ बेड, हरवक्त हाजिर रहनेवाले सहायक और होटल जैसी सुविधाएं मिलती हैं. वहीं सरकारी अस्पतालों में मरीजों और परिजनों को हर काम के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है, चाहे फार्म लेना हो, अप्वाइंटमेंट, भर्ती या दवाई लेनी हो.

हां, यह सामान्य दिनों की स्थिति थी. यह हालात महामारी की वजह से नहीं था. महामारी ने केवल एक नयी समस्या जोड़ी है, अब सरकारों के लिए यह संभव नहीं है कि वे उन उल्लंघनों को नजरअंदाज कर दें, जिन्होंने इनमें से कई अस्पतालों को बनाने की अनुमति दी है और सार्वजनिक जमीन को बहुत कम दर पर उपलब्ध करायी है. वे इस संपत्ति के इस्तेमाल से एक तंत्र बनाये, जो बहुत ही खर्चीला है और इन अस्पतालों में इलाज का इंतजार कर रहे बड़ी संख्या में लोगों को बाहर कर दिया गया है. निश्चित ही यह निजी विशेषाधिकार बनानेवाला सार्वजनिक धन है.

साल 2017 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के शुरुआती पैराग्राफ में कहा गया है कि बढ़ते इलाज खर्च की वजह से लोगों का व्यय बढ़ रहा है. वर्तमान में गरीबी बढ़ाने का यह एक अहम कारण है. कोविड के मामले में यह अलग नहीं है. एक साथ कई मामले सामने आ रहे हैं, इनसे बदहाल स्वास्थ्यतंत्र की बदसूरत तस्वीर उभरती है.

यह बहुत ही सामान्य बात है और भारत को लोगों को इसके साथ जीने की आदत बन चुकी है. संभ्रांत वर्ग और आम जनता के बीच एक विभाजन की स्थिति है. पूरा तंत्र आदतन भ्रष्ट बन चुका है, जो केवल पैसा, जुगाड़ और पहुंच की बात करता है न कि इलाज और देखभाल की. दिल्ली में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर चुके एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है- सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत करके निजी क्षेत्र के फैलाव को रोका जा सकता है. मैं निजी क्षेत्र के लोगों को डाकू नहीं कह सकता. वे अपना किराया वसूलते हैं. यह क्षेत्र उन्हें सौंपा गया है और वे अपने मुताबिक शुल्क वसूल रहे हैं. हालांकि, ट्रस्ट के तौर काम करनेवाले अस्पतालों का मामला अलग है.

यह दीर्घकालिक समस्या है, जिसे शांति के समय में ठीक करने की आवश्यकता होगी. कई प्रकार के समाधान सुझाये गये हैं, जिसमें से सबसे अहम भारत सरकार के स्वास्थ्य खर्च को वर्तमान में जीडीपी के 1.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 2025 तक 2.5 प्रतिशत तक किया जाये. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में इसका जिक्र किया गया था. हमें स्वास्थ्य को आवश्यक सेवा के तौर पर परिभाषित करने की आवश्यकता है.

कड़े कदमों की आवश्यकता से बचने की गुंजाइश नहीं है. आगे की चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को मजबूत फैसले लेने होंगे. जहां नियमों का उल्लंघन हो रहा है, उनका तत्काल अधिग्रहण हो, उनके खातें बंद हों और कार्रवाई से लोगों को संदेश दिया जाये कि स्वास्थ्य देखभाल में कोताही बरतने पर बख्शा नहीं जायेगा. ऐसा नहीं करने पर इससे बड़ी समस्या इंतजार कर रही है. मौत के व्यावसायियों को तत्काल रोकने की आवश्यकता है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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