प्रजनन दरें बदल रही हैं दुनिया के सत्ता समीकरण को, पढ़ें प्रवीण कौशल का आलेख

Fertility Rates: वर्ष 2100 की दुनिया आज की तुलना में बिल्कुल अलग दिखेगी, जो किसी युद्ध या तकनीकी सफलता से नहीं, जन्मदरों के शांत अंकगणित से संचालित होगी.

Fertility Rates: आज प्रजनन क्षमता (प्रजनन दर), एक ऐसी ताकत बन चुकी है, जो चुपचाप राष्ट्रों के भाग्य को आकार दे रही है. इसे समझने के लिए, एक सरल अंकगणितीय सच्चाई पर विचार करें. यदि दो लोगों की जगह दो लोगों को लाना है, तो प्रति महिला लगभग 2.1 बच्चे का जन्म होना चाहिए. दो से ऊपर का यह मामूली समायोजन बाल मृत्यु दर, उन महिलाओं के लिए जो बच्चे न पैदा करने का विकल्प चुनती हैं, और जन्म के समय प्राकृतिक लिंग अनुपात (जो लड़कों की तरफ थोड़ा झुका होता है) को ध्यान में रखकर किया गया है. इस संख्या को ‘प्रतिस्थापन प्रजनन दर’ कहा जाता है. इससे नीचे गिरते ही किसी देश की जनसंख्या, अंततः, घटने लगती है. यूएन वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2024 के अनुसार, 237 देशों और क्षेत्रों में से 131 देशों की प्रजनन दर अब 2.1 से नीचे है. वैश्विक औसत लगभग 2.25 है, जो प्रतिस्थापन दर से बमुश्किल ऊपर है और अभी भी गिर रही है.

दक्षिण कोरिया की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) लगभग 0.8 है, जो किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए दर्ज की गयी अब तक की सबसे कम दर है. जापान 1.3, इटली और स्पेन 1.2, ताइवान और सिंगापुर 1.1 तथा जर्मनी 1.5 पर हैं. ये केवल आंकड़े नहीं हैं, राष्ट्रीय भविष्य के पूर्वावलोकन हैं. एक पीढ़ी तक 0.8 की टीएफआर बनाये रखने से देश केवल छोटा नहीं होता, यह पूरी तरह से एक बदले हुए देश का निर्माण करता है, जिसमें सिकुड़ती सेनाएं, चरमराते पेंशन सिस्टम, घटता टैक्स बेस और श्रम की कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं, जिन्हें कोई भी सरकारी कार्यक्रम अभी तक हल नहीं कर पाया है. दूसरे छोर पर उप-सहारा अफ्रीका के कई देशों में टीएफआर 4.0 से काफी ऊपर बना हुआ है. यह जनसांख्यिकीय लाभांश तभी साकार होता है, जब युवा जनसंख्या शिक्षित, नियोजित और उत्पादक हो. इन परिस्थितियों के बिना उच्च प्रजनन दर राष्ट्रीय शक्ति के बजाय युवा बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न करती है.

यहां चीन का रास्ता पूरी विकासशील दुनिया के लिए एक चेतावनी है. तीन दशकों से अधिक समय तक लागू रही ‘एक बच्चा नीति’ ने देश की प्रजनन क्षमता को उस स्तर तक गिरा दिया, जिससे वह अब तक उबर नहीं पाया है. चीन की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं तेजी से एक ऐसे जनसांख्यिकीय अंकगणित से सीमित हो रही हैं, जिसे उसका नेतृत्व दोबारा नहीं लिख सकता. उधर भारत के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय द्वारा जारी ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024’ ने पुष्टि की है कि देश का राष्ट्रीय टीएफआर गिरकर 1.9 हो गया है. विदित है कि भारत की प्रतिस्थापन दर वैश्विक बेंचमार्क 2.1 के बजाय 2.15 पर है, क्योंकि कई राज्यों में अभी भी कन्या भ्रूण हत्या प्रचलित है. देश की क्षेत्रीय तस्वीर भी चौंकाने वाली है. केरल का टीएफआर 1.3 है. दिल्ली में यह 1.2 और पश्चिम बंगाल में 1.5 है.

बिहार का टीएफआर अभी भी 2.9 और उत्तर प्रदेश का 2.35 है. शहरी भारत का टीएफआर 1.5 है, जबकि ग्रामीण भारत का 2.1 तथा शहरीकरण बढ़ने के साथ ग्रामीण आंकड़ा और नीचे गिरेगा. वर्ष 2031 तक भारत का राष्ट्रीय टीएफआर लगभग 1.57 तक पहुंचने का अनुमान है. इस गिरावट के कारण सार्वभौमिक हैं : महिला शिक्षा का विस्तार, बाल मृत्यु दर में भारी कमी, शहरीकरण और स्कूली शिक्षा तथा स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागत. ये नीतिगत विफलताएं नहीं हैं, बल्कि विकास के अनुमानित और काफी हद तक अपरिवर्तनीय परिणाम हैं. भारत की जनसंख्या अभी भी इसलिए बढ़ रही है क्योंकि बड़ी मौजूदा पीढ़ियां लंबी उम्र जी रही हैं, जिससे जनसंख्या को एक गति मिल रही है और इसके 2060 के दशक में लगभग 1.6 से 1.7 अरब के बीच चरम पर पहुंचने और फिर घटने की संभावना है.

कई भारतीय राज्य अब परिवारों को तीसरा या चौथा बच्चा जन्म देने के लिए प्रोत्साहन देने पर चर्चा कर रहे हैं, जो इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भविष्य की वास्तविक चुनौती अधिक जनसंख्या नहीं, बल्कि एक बूढ़ा और सिकुड़ता हुआ उत्पादक आधार है. भारत के वृद्ध निर्भरता अनुपात के, जो वर्तमान में कार्यशील आयु के प्रति 100 व्यक्तियों पर 16 बुजुर्ग निर्भर व्यक्ति है, 2050 तक 30 तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों को 2030 के दशक तक गंभीर श्रम की कमी का सामना करना पड़ेगा और उन्हें बिहार और उत्तर प्रदेश के श्रमिकों पर निर्भर रहना होगा.

कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वैश्विक शक्ति का चल रहा पुनर्गठन न केवल व्यापार गुटों और सैन्य गठबंधनों द्वारा आकार ले रहा है, बल्कि दुनिया के प्रमुख खिलाड़ियों के अलग-अलग जनसांख्यिकीय रास्तों द्वारा भी तय हो रहा है. चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अधिकांश यूरोप तेजी से बूढ़े हो रहे हैं, जिससे उनका वित्तीय लचीलापन, सैन्य भर्ती और नवाचार क्षमता सीमित हो रही है. जबकि भारत अपनी प्रजनन दर में गिरावट के बावजूद, हर दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की तुलना में संरचनात्मक रूप से युवा बना हुआ है, एक ऐसा सापेक्ष लाभ जो उसके प्रतिस्पर्धियों के बूढ़े होने के साथ-साथ बढ़ता जायेगा. वर्ष 2100 की दुनिया आज की तुलना में बिल्कुल अलग दिखेगी, जो किसी युद्ध या तकनीकी सफलता से नहीं, जन्मदरों के शांत अंकगणित से संचालित होगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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