पूर्वी भारत की ऊर्जा संभावना

विकास के मानकों में जितना विरोधाभास देश के पूर्वी हिस्से ने दर्ज किया, शायद ही किसी क्षेत्र में देखने को मिला हो. उत्तर प्रदेश को स्पर्श करती भारत-नेपाल सीमा से लेकर ओड़िशा के कटक तक खनिज संसाधनों की प्रचुर मात्रा, पर्यावरणीय व जैविक संपन्नता के साथ सांस्कृतिक चेतना से युक्त परिश्रमी मानव संसाधन की बदौलत देश का पूर्वी हिस्सा भारत का ही नहीं, अपितु दक्षिण एशिया का आर्थिक इंजन हुआ करता था, लेकिन आजादी के बाद धीरे-धीरे यह क्षेत्र पिछड़ता चला गया. कोरोना संकट के दौरान देश के कोने-कोने में रह रहे पूर्वी भारत के प्रवासी श्रमिकों के पलायन की तस्वीरों ने समावेशी विकास के दावों की दुर्बलताओं को उजागर कर दिया है.

अरविंद मिश्रा

ऊर्जा विशेषज्ञ

विकास के मानकों में जितना विरोधाभास देश के पूर्वी हिस्से ने दर्ज किया, शायद ही किसी क्षेत्र में देखने को मिला हो. उत्तर प्रदेश को स्पर्श करती भारत-नेपाल सीमा से लेकर ओड़िशा के कटक तक खनिज संसाधनों की प्रचुर मात्रा, पर्यावरणीय व जैविक संपन्नता के साथ सांस्कृतिक चेतना से युक्त परिश्रमी मानव संसाधन की बदौलत देश का पूर्वी हिस्सा भारत का ही नहीं, अपितु दक्षिण एशिया का आर्थिक इंजन हुआ करता था, लेकिन आजादी के बाद धीरे-धीरे यह क्षेत्र पिछड़ता चला गया. कोरोना संकट के दौरान देश के कोने-कोने में रह रहे पूर्वी भारत के प्रवासी श्रमिकों के पलायन की तस्वीरों ने समावेशी विकास के दावों की दुर्बलताओं को उजागर कर दिया है.

आर्थिक संगठनों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल अकेले 2035 तक तीन खरब डॉलर की क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था बन सकता है. वर्तमान में पूर्वी हिस्से की अर्थव्यवस्था में इस राज्य अकेले 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी है. इस क्षेत्र के खनिज और ऊर्जा ताकत का आकलन इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा और आंध्रप्रदेश के सीमावर्ती जिले लगभग 80 प्रतिशत लौह अयस्क उत्पादित करते हैं, जबकि कोकिंग कोल का 100 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं राज्यों से आता है. क्रोमाइट, बॉक्साइट और डोलामाइट जैसे खनिजों के भंडार से भी यह क्षेत्र संपन्न है.

पूर्वी भारत में पाराद्वीप, हल्दिया, विजाग, कोलकाता समेत देश के प्रमुख बंदरगाह हैं. ऊर्जा, खनिज संसाधन के साथ यह क्षेत्र आसियान देशों के साथ सीधे संपर्क की नैसर्गिक सुविधा उपलब्ध कराता है. इसलिए आर्थिक मोर्चे के अलावा कूटनीतिक रूप से भी पूर्वी छोर की विशेष अहमियत है. आज विभिन्न दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत का कारोबार 80 अरब डॉलर तक पहुंचा है, तो उसके पीछे पूर्वी भारत में खनिज आधारित उद्योगों की संपन्नता प्रमुख है, लेकिन पिछली सरकारों ने पूर्वी भारत के ऊर्जा संसाधनों के विकास को उस रूप में गति नहीं दी, जिसकी संभावना व अवसर यहां उपलब्ध थे.

यदि स्टील उद्योग को ही विकसित किया जाए, तो अकेले 25 लाख नौकरियां सृजित होंगी. यहां का परिश्रमी मानव संसाधन सक्षम आधारभूत संरचना विकसित करने में मददगार साबित हो सकता है, बशर्ते एक्ट इस्ट पॉलिसी (पहले लुक इस्ट पॉलिसी) को सफल बनाया जाए. नीति निर्धारकों को यह समझना होगा कि जो नीति किसी एक राज्य के अनुकूल हो सकती है, आवश्यक नहीं कि वह अन्य राज्यों में भी सफल हो. अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओड़िशा और छत्तीसगढ़ के लिए कोयला, पेट्रोल, शहरी गैस परियोजना और नवीनीकृत ऊर्जा संसाधनों से जुड़ी नीतियों में विविधता लायी जाए. यह इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि इन राज्यों की भौगोलिक संरचना ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता भी अन्य राज्यों से अलग है.

इस साल के शुरू में केंद्र सरकार ने 102 लाख करोड़ रुपये की नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन परियोजना शुरू की है. इसके तहत सड़क और समुद्री मार्ग में पेट्रो-गैस पाइपलाइन का नेटवर्क बढ़ाया जायेगा. मोदी सरकार ने 2016 में ही पूर्वी हिस्से को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ने की योजना मंजूर की थी. इस पाइपलाइन से पांच राज्यों को अभूतपूर्व लाभ होगा. पूर्वी भारत के दो दर्जन बड़े जिले और शहर पहले ही ऊर्जा गंगा परियोजना के जरिये इससे जुड़ चुके हैं. यह गैस पाइपलाइन यदि पूर्वोत्तर प्राकृतिक गैस पाइपलाइन ग्रिड के साथ जुड़ती है, तो पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत तक ऊर्जा पहुंच सकेगी, लेकिन सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस योजना से छोटे शहर भी जुड़ें.

इससे आत्मनिर्भर भारत के लिए आवश्यक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी. आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकना होगा और ग्रामीण भारत तक किफायती दर में स्वच्छ ऊर्जा की आपूर्ति के बिना यह संभव नहीं होगा. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के अनुप्रयोगों के जरिये यहां उद्योग जगत की आवश्यकताओं के अनुरूप उद्यमिता विकास कार्यक्रम संचालित करने होंगे, अन्यथा कोविड-19 के बाद की परिस्थितियों में यह क्षेत्र बेरोजगारी और पलायन की नयी चुनौतियों को जन्म देगा.

पूर्वी भारत को राइस बेल्ट के नाम से भी जाना जाता है. पिछले कुछ वर्षों से किसान चावल के उत्पादन की ओर जिस तेजी से आगे बढ़े हैं, वह खाद्य पारिस्थितिक तंत्र ही नहीं, राजस्व के मोर्चे पर किसान और सरकार के लिए भी अधिक लाभदायक नहीं है. ऐसे में फसल चक्रीकरण एवं मोटे अनाज के उत्पादन की ओर किसानों को प्रेरित करना होगा. बिहार जैसे राज्यों में कृषि उद्योग की दिशा में बहुत कुछ करने की संभावनाएं हैं.

पूर्वी भारत के राज्यों के पिछड़ेपन की एक अहम वजह केंद्र और राज्य के राजनीतिक टकराव से जनित गतिरोध भी है. ओड़िशा ने राज्य के समग्र विकास से जुड़ी केंद्रीय योजनाओं को जिस गति से लागू किया है, वह अन्य राज्यों के लिए रोल मॉडल हो सकता है. कुछ इसी तरह अतिरिक्त धान से बायोफ्यूल बनाने की नीति पर छत्तीसगढ़ सरकार का केंद्र के साथ कदमताल करना स्वागतयोग्य है. इसी राजनीतिक इच्छाशक्ति से पूर्वी भारत के आर्थिक गौरव को पुन: लौटाया जा सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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Published by: संपादकीय

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