बच्चों को 'क्यों' पूछने के लिए प्रेरित करें

प्रो. मधुलिका गुप्ता बताती हैं कि आज की पीढ़ी को महान वैज्ञानिक बनने के लिए जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और धैर्य की आवश्यकता है. शिक्षा व्यवस्था में बदलाव और 'क्यों' पूछने की संस्कृति ही भविष्य का निर्माण करेगी.

प्रो मधुलिका गुप्ता

(असिस्टेंट प्रोफेसर केमिस्ट्री एंड केमिकल बायोलॉजी विभाग आइआइटी(आइएसएम), धनबाद)

हर युग को उन प्रश्नों के लिए याद किया जाता है, जिन्हें पूछने का साहस उस पीढ़ी ने किया. कभी मनुष्य ने सोचा था कि वह पक्षियों की तरह उड़ सकता है? एक समय यह भी प्रश्न था कि क्या घातक बीमारियों का इलाज संभव है? वैज्ञानिकों ने आकाश की ओर देखा और पूछा कि क्या मनुष्य चंद्रमा तक पहुंच सकता है? आज की युवा पीढ़ी के सामने इससे भी बड़े प्रश्न हैं. क्या भविष्य में मंगल या चंद्रमा पर स्थायी मानव बस्तियां बसेंगी? क्या वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को उपयोगी ईंधन में बदला जा सकेगा? क्या बीमारियों का पता उनके लक्षण दिखाई देने से पहले लगाया जा सकेगा?

क्या स्वच्छ ऊर्जा हर व्यक्ति तक पहुंचेगी? क्या क्वांटम तकनीक कंप्यूटिंग की दुनिया को पूरी तरह बदल देगी? इन प्रश्नों के उत्तर केवल पुस्तकों में नहीं मिलेंगे. इनके उत्तर जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, साहस, धैर्य और निरंतर प्रयास से मिलेंगे. आज की 30 वर्ष से कम आयु की पीढ़ी मानव इतिहास के सबसे रोमांचक दौर में जी रही है. पहले कभी किसी पीढ़ी के पास इतना विशाल वैज्ञानिक ज्ञान, इतनी शक्तिशाली कंप्यूटिंग क्षमता, आधुनिक प्रयोगशालाएं, एआइ के उपकरण और वैश्विक सहयोग का अवसर नहीं था.

आज एक साधारण छात्र भी लैपटॉप और इंटरनेट की सहायता से वही वैज्ञानिक शोधपत्र पढ़ सकता है, जिन तक कभी केवल दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं की पहुंच होती थी. यदि जिज्ञासा और सीखने की इच्छा हो, तो ज्ञान पूरी दुनिया के लिए खुला है. पर केवल तकनीक महान वैज्ञानिक नहीं बनाती. हर बड़ी खोज की शुरुआत जिज्ञासा से होती है. आने वाला समय उन्हीं लोगों का होगा जो दुनिया को ध्यान से देखेंगे, स्थापित धारणाओं पर सवाल उठायेंगे, नये विचारों को परखेंगे, असफलताओं से सीखेंगे और स्वयं को लगातार बेहतर बनाते रहेंगे. इक्कीसवीं सदी में सबसे बड़ी क्षमता होगी आलोचनात्मक सोच और रचनात्मक ढंग से समस्याओं का समाधान करने की योग्यता.

आज विज्ञान की दुनिया तेजी से बदल रही है. अब कोई भी खोज केवल एक विषय की सीमा में रहकर संभव नहीं है. भविष्य की दवाइयां केवल चिकित्सक नहीं बनायेंगे, बल्कि रसायनविद, जीवविज्ञानी, कंप्यूटर वैज्ञानिक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेषज्ञ मिलकर विकसित करेंगे. पर्यावरण अनुकूल विमान ईंधन तैयार करने के लिए रसायन विज्ञान, रासायनिक इंजीनियरिंग, पर्यावरण विज्ञान और उद्योग जगत को साथ आना होगा. जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का समाधान पृथ्वी विज्ञान, डाटा विश्लेषण, अर्थशास्त्र, सार्वजनिक नीति और आधुनिक प्रौद्योगिकी के सामूहिक प्रयास से ही संभव है. आज नवाचार किसी एक विषय की उपलब्धि नहीं, बल्कि अनेक विषयों के साझा प्रयास का परिणाम है. इसी बदलती दुनिया को देखते हुए शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी इसी दिशा में बहु-विषयक शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार पर बल देती है. विश्वविद्यालयों को केवल पढ़ाई कराने वाले संस्थानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें खोज, अनुसंधान और नवाचार का जीवंत केंद्र बनना होगा. कक्षाओं में रटने के बजाय प्रश्न पूछने, तर्क करने और प्रयोग करने की संस्कृति विकसित करनी होगी. आधुनिक कंप्यूटेशनल सुविधाएं विद्यार्थियों को अणुओं का मॉडल तैयार करने, नयी सामग्री विकसित करने, विशाल आंकड़ों का विश्लेषण करने तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित एल्गोरिदम विकसित करने में सक्षम बनायेंगी.

विकसित भारत-2047 का सपना तभी साकार होगा, जब विश्वविद्यालय ज्ञान के साथ नवाचार व उद्यमिता के भी केंद्र बनेंगे. इस दिशा में केवल विश्वविद्यालयों की ही नहीं, परिवार और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. किसी भी बच्चे के पहले शिक्षक उसके माता-पिता होते हैं. यदि वे बच्चों को केवल उत्तर बताने के बजाय 'क्यों' पूछने के लिए प्रेरित करें, तो उनमें जीवनभर सीखने की जिज्ञासा बनी रहती है. सफलता का आकलन केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि जिज्ञासा, ईमानदारी, रचनात्मकता, संवेदनशीलता और कठिन परिस्थितियों में डटे रहने की क्षमता से होना चाहिए. शिक्षकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

सबसे प्रभावशाली शिक्षक वे होते हैं, जो केवल पाठ नहीं पढ़ाते, बल्कि विद्यार्थियों की सोच बदल देते हैं. कक्षा में हुई एक प्रेरणादायी चर्चा, किसी संकोची विद्यार्थी का उत्साहवर्धन या अनुसंधान में भाग लेने का एक अवसर उसके पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है. शिक्षा का उद्देश्य ऐसे स्वतंत्र विचारक तैयार करना होना चाहिए, जिनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नैतिक जिम्मेदारी भी हो. वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी भी प्रयोगशाला की चारदीवारी तक सीमित नहीं है. विज्ञान तभी सार्थक है, जब वह नयी पीढ़ी को प्रेरित करे. मानवता के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं और अवसर भी. आने वाले सौ वर्षों की सबसे बड़ी खोजें अभी बाकी हैं. भविष्य की दुनिया को बदलने वाली तकनीकों का आविष्कार अभी होना है और उन्हें विकसित करने वाले वैज्ञानिक, इंजीनियर, शिक्षक, उद्यमी और नवोन्मेषक आज हमारे विद्यालयों, महाविद्यालयों, प्रयोगशालाओं और घरों में बैठे हैं. भविष्य हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा, बल्कि हमारी खोज का इंतजार कर रहा है. (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)


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