इंदिरा गांधी के निजी संकट के कारण लगा आपातकाल

Indira Gandhi : जेल में जो बूढ़े-बुजुर्ग कैदी थे, वे बेहद डरे हुए थे. लेकिन युवाओं में जोश दिखता था. उनको इसका गर्व था कि वे इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं. जेल में विभिन्न विचारधाराओं के लोग थे. समाजवादी साथियों की एक आदत थी. वे बात-बात में लोहिया का जिक्र कर बैठते थे कि लोहिया जी ने यह कहा है, वह कहा है. मैंने उसकी काट के लिए कहना शुरू किया, बाबा का यह कहना है. जबकि बाबा कोई नहीं थे.

Indira Gandhi : इंदिरा गांधी द्वारा देश पर आपातकाल थोपने के कई कारण बताये जाते हैं. जैसे कि जेपी का आंदोलन, कांग्रेस के अंदर के द्वंद्व, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी को मिली चुनौती और आर्थिक कारण. लेकिन आपातकाल लगाये जाने का एक ही कारण था. वह था इंदिरा गांधी का निजी संकट. अगर इंदिरा गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल जाती, तो आपातकाल नहीं लगाया जाता. विपिन चंद्रा जैसे इतिहासकार गलत कहते हैं कि आपातकाल के लिए जितनी जिम्मेदार इंदिरा गांधी थीं, उतने ही जिम्मेदार जेपी थे. आपातकाल के लिए सिर्फ इंदिरा गांधी जिम्मेदार थीं. सिद्धार्थ शंकर रे तब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे, लेकिन जब-तब उन्हें विचार-विमर्श के लिए दिल्ली बुला लिया जाता था. रे 20 जून, 1975 से ही दिल्ली में थे. उन्होंने ही इंदिरा गांधी को समझाया था कि बिना कैबिनेट की सिफारिश के भी आपातकाल का फैसला लिया जा सकता है. इस तरह इंदिरा गांधी छल-कपट का सहारा लेकर निजी हैसियत से राष्ट्रपति के पास पहुंचीं और 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल लगा.


जिस दिन आपातकाल लगा, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यक्रम में कानपुर देहात में था. अगले दिन सुबह, यानी 26 जून को कानपुर से एक साथी ने आकर मुझे आपातकाल लगाये जाने की खबर दी. यह सुनते ही कानपुर से मैं पटना पहुंचा. उस समय मैं एबीवीपी का राष्ट्रीय सचिव था, और मेरा कार्यक्षेत्र पटना था. पटना में मुझे गोविंदाचार्य और त्रिपुरारीशरण मिले. उन्होंने मुझसे कहा कि पटना में आपका रहना खतरे से खाली नहीं. चूंकि मैं एबीवीपी के ऑफिस में ही सोता था, इसलिए वहां मेरी गिरफ्तारी बहुत आसान थी. इस कारण मैं बनारस निकल गया. तीस जून को दोपहर बाद मैं बनारस पहुंचा. वहां एक मित्र के यहां सामान रखकर मैं कहीं जा रहा था कि मैदागिन के पास कांग्रेस के सांसद सुधाकर पांडेय और उनके कुछ सहयोगियों ने मुझे देख लिया. उन्होंने बगल में ही कोतवाली में जाकर खबर कर दिया. उन्होंने क्या कहा था, यह तो मुझे मालूम नहीं, लेकिन थोड़ी ही दूर पहुंचा था कि पुलिस ने मुझे घेर लिया. मुझे चौकाघाट जेल में ले जाया गया. वहां लालमणि चौबे और मजूमदार मेरे साथी थे. वहां से एक दिन हमें शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल भेज दिया गया. हम साथी लोग जेल जीवन को आनंदमय बनाने की कोशिश किया करते थे. त्योहारों का मेन्यू बनाते थे. इसी क्रम में जेल की लाइब्रेरी तक हमारी पहुंच हो गयी. मैंने जेलर से कहकर अपराधी बंदियों को पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. उसी दौरान दीनदयाल उपाध्याय के दो हत्यारों- रामअवध और भरत से परिचय हुआ. उन दोनों से लंबी बातचीत से पता चला कि वे तो दीनदयाल उपाध्याय को जानते तक नहीं थी. केजीबी के एजेंटों ने उन दोनों का इस्तेमाल किया था. वे दोनों मुझसे पछताते हुए कहते, हमसे बड़ा अपराध हो गया.


जेल में जो बूढ़े-बुजुर्ग कैदी थे, वे बेहद डरे हुए थे. लेकिन युवाओं में जोश दिखता था. उनको इसका गर्व था कि वे इंदिरा गांधी की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं. जेल में विभिन्न विचारधाराओं के लोग थे. समाजवादी साथियों की एक आदत थी. वे बात-बात में लोहिया का जिक्र कर बैठते थे कि लोहिया जी ने यह कहा है, वह कहा है. मैंने उसकी काट के लिए कहना शुरू किया, बाबा का यह कहना है. जबकि बाबा कोई नहीं थे. जेल के अंदर भी दहशत का माहौल था और जेल के बाहर भी. लेकिन आपातकाल लगाये जाने के पांच-छह महीने के बाद स्थिति बदलने लगी थी. लोग प्रतिरोध करने लगे थे. जेल से छूटने के बाद मैंने दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात थी. तब उनके स्लिप डिस्क का ऑपरेशन हुआ था, लेकिन उन्होंने बातचीत की. बनारस में जेपी से मुलाकात हुई, तो उन्होंने इंदिरा गांधी से मुकाबला करने के लिए एक विपक्षी पार्टी के गठन की जरूरत बतायी. जेपी में सब कुछ दांव पर लगाकर लड़ने का माद्दा था.


आपातकाल के दौरान ही इंदिरा गांधी ने चुनाव की घोषणा कर दी. विपक्षी नेता इस घोषणा से हतप्रभ थे. उनमें से कोई भी चुनाव लड़ना नहीं चाहता था. राजनारायण जी जेल में थे. उनसे पूछने पर पता चला कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में हेमवतीनंदन बहुगुणा पर डाक टिकट जारी करते समय कहा था कि उन्हें जॉर्ज फर्नांडीज को चुनाव लड़ने के लिए कहने के लिए भेजा गया था. लेकिन फर्नांडीस ने उनसे कहा, मैं तो इस चुनाव के बहिष्कार के बारे में सोच रहा हूं. इंदिरा गांधी को लगता था कि आपातकाल में ही चुनाव होंगे, तो विपक्ष चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं होगा. वह चुनाव जीत जायेंगी, फिर आसानी से प्रचारित कर देंगी कि आपातकाल को देश की जनता का समर्थन है. लेकिन बाबू जगजीवन राम, हेमवतीनंदन बहुगुणा, नंदिनी सत्पथी आदि के कांग्रेस से अलग होते ही विपक्ष में एकाएक जान आ गयी. इस बीच आपातकाल हटा लिया गया, चुनाव हुए और जनता पार्टी ने चुनावी जीत हासिल की. अगर जनता पार्टी के नेतागण आपस में नहीं लड़ते, तो इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने के उनके फैसले के लिए न्यूरेम्बर्ग जैसे ट्रायल से गुजरना पड़ता. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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