राष्ट्रमंडल सम्मेलन से लोकतंत्र मजबूत

Commonwealth Conference: भारतीय संसद ने 14 से 16 जनवरी तक नयी दिल्ली में राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों (सीएसपीओसी) के 28वें सम्मेलन का सफल आयोजन किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित राष्ट्रमंडल देशों की संसद के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का यह सम्मेलन लोकतांत्रिक संस्थाओं को और जन केंद्रित बनाने की प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हो गया. सीएसपीओसी के इस 28 वें सम्मेलन के जरिये लोकतांत्रिक परंपराओं को और मजबूती मिलेगी.

Commonwealth Conference: भारतीय संसद ने 14 से 16 जनवरी तक नयी दिल्ली में राष्ट्रमंडल के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों (सीएसपीओसी) के 28वें सम्मेलन का सफल आयोजन किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटित राष्ट्रमंडल देशों की संसद के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का यह सम्मेलन (सीएसपीओसी) लोकतांत्रिक संस्थाओं को और जन केंद्रित बनाने की प्रतिबद्धता के साथ संपन्न हो गया. तमाम विदेशी मेहमानों का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि जब भारत को आजादी मिली थी, तब अनेक लोगों को इस बारे में संदेह था कि देश में व्याप्त इतनी ज्यादा विविधता के बीच हमारा लोकतंत्र टिक पायेगा या नहीं, लेकिन यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की ताकत बन गयी. एक और बड़ी चिंता यह थी कि अगर किसी तरह भारत में लोकतंत्र कायम रह जाये, तो विकास संभव नहीं होगा, लेकिन भारत ने इसे गलत साबित कर दिया. ऐसे ही, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि नयी टेक्नोलॉजी ने काम करने की क्षमता तो बढ़ायी है, लेकिन उसके गलत इस्तेमाल से गलत जानकारी, साइबर अपराध और इससे होने वाली सामाजिक गड़बड़ियां जैसी चुनौतियां भी सामने आयी हैं. इस सम्मेलन में 53 राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के अलावा 14 स्वायत्त संसदों के अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों ने भाग लिया. भारत इससे पहले 1971, 1986 और 2010 में सीएसपीओसी की मेजबानी कर चुका है.

सीएसपीओसी एक ऐसी अद्भुत संस्था के रूप में हमारे सामने है, जो संसदीय स्वतंत्रता और निष्पक्षता का दायित्व निभाता है, बावजूद इसके कि इसने बहुत कुछ वेस्टमिंस्टर प्रणाली और परंपरा से हासिल किया है, और यह संसदीय प्रमुखों की निष्पक्षता तथा इनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. इस सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों ने सरकार चलाने की बेहतर परंपराओं, विशेषाधिकार आदि के बारे में अपने विचार साझा किये. इसके अतिरिक्त यह मंच पारदर्शिता, जिम्मेदारी और कानून के शासन को प्रोत्साहित करते हुए नये लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा संसदों को समर्थन देनेका भी काम करता है. विश्लेषक सीएसपीओसी को अक्सर ऐसे दुर्लभ वैश्विक मंच के तौर पर बताते हैं, जो संवादों के जरिये संसदों की गरिमा, स्वतंत्रता और प्रभावशीलता बढ़ाता है. इस मंच ने एक लोकतंत्र में सहमति पर आधारित फैसलों, शक्ति के पृथक्करण, संसदीय विशेषाधिकार, चुने हुए जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्चता तथा अध्यक्ष की निष्पक्ष भूमिका को लगातार मजबूत किया है. सम्मेलन के दौरान हुए विचार-विमर्श में व्यक्त संकल्पों ने यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की मजबूती आज की वैश्विक आवश्यकता है तथा इसमें विधायिकाओं की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है.

सीएसपीओसी के 28 वें सम्मेलन में भाग लेने विदेशी प्रतिनिधियों को भारत की समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं से परिचित कराया गया. इस सम्मेलन में लोकतंत्र तथा संसदीय प्रणाली से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विमर्श हुआ. ये मुद्दे थे- सदनों की लोकतांत्रिक गरिमा बनाये रखने में अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों की भूमिका, संसद में एआइ, सोशल मीडिया तथा सांसदों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव, मतदान के अतिरिक्त संसद के बारे में आम आदमी की जानकारी तथा नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने के बारे में नवाचार भरी रणनीति और सांसदों व संसदीय कर्मचारियों के स्वास्थ्य और उनकी बेहतरी आदि. संसद किसी भी लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ होता है. चूंकि भारत दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र है, इस कारण हमारी संसद ज्यादा जीवंत है. अन्य विधायी कार्यों के अलावा भारत की संसद विदेश नीति के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

विदेश मामलों पर गठित संसदीय समिति की, जिसमें विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सांसदों की इस मामले में बड़ी भूमिका होती है, इसमें बड़ी भूमिका होती है. उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका संसद में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर होने वाली बहस भी निभाती है. विख्यात लेखक केवी प्रसाद ने अपनी किताब, ‘इंडियन पार्लियामेंट शेपिंग फॉरेन पॉलिसी’ में कहा है कि संविधान के अंतर्गत संसद को पूरे देश के लिए या देश के किसी हिस्से के लिए किसी भी देश या देशों के साथ समझौता करने के लिए कानून बनाने का अधिकार है. एक और क्षेत्र, जिसके जरिये संसद को अपने विदेशी समकक्षों से संवाद करने का अवसर मिलता है, वह है संस्थागत संपर्क तथा कुछ खास या ज्यादा महत्वपूर्ण देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों का मंच. जी-20, ब्रिक्स तथा राष्ट्रमंडल जैसे विविध अंतरराष्ट्रीय बहुपक्षीय संगठनों में सांसदों का संवाद आपसी लाभ का संबंध गढ़ते हैं, जिससे आपसी सहयोग का एक और स्तंभ निर्मित होता है. इससे पहले जी-20 की अध्यक्षता के दौर में भारत ने अक्तूबर, 2023 में नौवें जी-20 संसदीय अध्यक्षों के शिखर सम्मेलन (पी 20) की मेजबानी की थी.

जहां तक राष्ट्रमंडल देशों की संसद के अध्यक्षों के सम्मेलन की बात है, तो यह इस तरह का सबसे बड़ा सम्मेलन तो है ही, बेहद महत्वपूर्ण भी है. वर्ष 1969 में कनाडा के हाउस ऑफ कॉमन्स के अध्यक्ष ने द कॉन्फ्रेंस ऑफ स्पीकर्स एंड प्रिजाइडिंग ऑफिसर्स ऑफ कॉमनवेल्थ (सीएसपीओसी) के गठन में मदद की थी और उन्होंने इसके सचिवालय की मेजबानी भी की थी. सीएसपीओसी के 27 वें सम्मेलन का आयोजन 2024 में युगांडा के कंपाला में हुआ था, और वहीं अगले सम्मेलन की मेजबानी भारत को सौंपने की औपचारिक घोषणा हुई थी, हालांकि यह फैसला कनाडा में सीएसपीओसी के 25 वें सम्मेलन में ही ले लिया गया था. चूंकि दुनिया में तेजी से तकनीकी बदलाव हो रहे हैं, ऐसे में, संसद भी इससे अछूती नहीं है. सीएसपीओसी के इस सम्मेलन में भी सोशल मीडिया तथा एआइ के सांसदों पर पड़ने वाले असर पर कार्यशालाएं हुईं.

सीएसपीओसी के इस 28 वें सम्मेलन के जरिये लोकतांत्रिक परंपराओं को और मजबूती मिलेगी. भारत इस पर जोर देता रहेगा कि बहुपक्षवाद निश्चित ही उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए, विकास सबके लिए समान होना चाहिए, टेक्नोलॉजी का उद्देश्य सावर्जनिक भलाई होना चाहिए, और वैश्विक नेतृत्व को मानवीय, तथा समावेशन और नवाचार के जरिये होने वाले आर्थिक विकास को मानव केंद्रित होना चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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By अनिल त्रिगुणायत

अनिल त्रिगुणायत is a contributor at Prabhat Khabar.

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