भारतीय खेलप्रेमियों को इस बार ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) के समापन समारोह का विशेष कारण से इंतजार था. समारोह का मुख्य आकर्षण भारत-स्कॉटलैंड की जुगलबंदी रही. दोनों देशों के संगीतकारों और नर्तकों ने समारोह में समा बांध दिया और फिर 2030 राष्ट्रमंडल खेल के लिए अहमदाबाद को बैटन पास कर दिया गया.
कॉमनवेल्थ स्पोर्ट के अध्यक्ष डोनाल्ड रुकरे ने काॅमनवेल्थ का ध्वज भारतीय ओलिंपिक एसोसिएशन की अध्यक्ष पीटी उषा, एथलीट नीरज चोपड़ा और गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी को सौंप दिया. बीते लगभग दो वर्षों से अहमदाबाद राष्ट्रमंडल खेल 2030 और ओलिंपिक्स 2036 की तैयारियों में जुटा हुआ है. इस बीच महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत खेल स्पर्धाओं में विश्व के शीर्ष देशों में स्थान बनाने के लिए कितना तैयार है. इस लिहाज से ग्लासगो 2026 के परिणाम पर गौर करना जरूरी है.
ग्लासगो गेम्स 2026 में भारत ने 122 एथलीटों की टीम भेजी. इनमें से 38 सदस्य पदक जीतकर आये, जिसमें गुलवीर सिंह ने दो पदक जीते. इस तरह भारत 39 पदक जीतकर पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा. यदि 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स से तुलना की जाये, तो इस बार भारत ने कम पदक जीते. पर कई बार सांख्यिकी का एक पहलू पूरी तस्वीर बयान नहीं करता है. बर्मिंघम 2022 गेम्स में भारत ने 210 एथलीट भेजे थे और 61 मेडल जीते थे, जबकि इस बार 122 एथलीट ही भेजे थे. इस तरह देखें, तो बर्मिंघम में सफलता का स्ट्राइक रेट 29 प्रतिशत था, जो ग्लासगो में बढ़कर 31 प्रतिशत हो गया. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पारंपरिक तौर पर कई ऐसे खेल, जिनमें भारत मजबूत रहा है, ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे. ऐसे में खेल दर खेल आकलन तस्वीर को और स्पष्ट कर देगा.
इसकी शुरुआत भारोत्तोलन से करते हैं. इसमें मीराबाई चानू ने स्वर्ण पदक जीता. इस जीत के साथ चानू आधुनिक भारत की सबसे दमदार भारोत्तोलक में शुमार हो चुकी हैं. ऋषिकांत सिंह, अजय बाबू और लवप्रीत सिंह ने न केवल रजत पदक जीते, बल्कि रिकॉर्ड भी बनाये. भारोत्तोलन में भारत ने आठ पदक जीते. पर डोपिंग का डंक भारत के लिए परेशानी का सबब बना रहा. बर्मिंघम गेम्स में सफल 15 में से 10 भारोत्तोलक ग्लासगो गेम्स से बाहर हो गये. डोपिंग के कारण स्थिति इतनी बुरी रही कि बीते गेम्स की तुलना में भारोत्तोलन में 16 की जगह इस बार मात्र 11 स्लॉट्स ही भारत को मिले. यदि ग्लासगो से अहमदाबाद की यात्रा को और दमदार बनाना है, तो व्यवस्था को डोपिंग के मामले में पहले की तुलना में अधिक चुस्त होना होगा.
भारतीय कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो में भारत ने पहली बार स्वर्ण पदक जीता. अस्मिता डे का स्वर्ण पदक आने वाले समय में युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनने वाला है. अस्मिता के अतिरिक्त हर्ष सिंह ने भी स्वर्ण पदक जीता. यामिनी मौर्या ने रजत और उन्नति शर्मा ने कांस्य पदक जीते. यदि जूडो में भारत के पदक विजेताओं की विश्व रैंकिंग देखी जाये, तो वे 50 से 100 के बीच आते हैं. ऐसे में कॉमनवेल्थ गेम्स में तुलनात्मक रूप से आसानी से पदक जीते जा सकते हैं. पर इस खेल में भी डोपिंग बड़ी समस्या बनी हुई है. जूडो के 14 सदस्यीय भारतीय दल में से अरुण कुमार और तूलिका मान को डोपिंग की वजह से बाहर होना पड़ा.
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ग्लासगो में भारत के सुपरस्टार मुक्केबाज ही रहे. जैस्मिन लंबोरिया ने विश्व विजेता की अपनी ख्याति स्वर्ण पदक के साथ बनाये रखी. साक्षी चौधरी के स्वर्ण ने साबित कर दिया कि भारतीय महिला मुक्केबाजी का भविष्य सुरक्षित हाथों में है. इनके अतिरिक्त प्रीति पवार, अंकुश, सचिन सिवाच, अरुंधति चौधरी और प्रिया घनघस ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया. वहीं लवलीना बोरगोहेन, जदुमणि सिंह और नरेंदर बेरवाल ने रजत पदक जीते. इस तरह भारतीय मुक्केबाजों ने सात स्वर्ण और तीन रजत के साथ 10 पदक जीत 71 प्रतिशत सफलता की स्ट्राइक रेट बनाये रखी.
एथलेटिक्स की बात करें, तो 32 सदस्यीय भारतीय दल ने पांच रजत और पांच कांस्य के साथ 10 पदक जीते. भारत ने बर्मिंघम में 37 एथलीट भेजे थे, जिसमें से आठ ने पदक जीते थे. भारतीय एथलीटों में नीरज चोपड़ा एक बार फिर सुपरहीरो रहे, जिन्होंने रजत पदक जीता. व्यक्तिगत स्तर पर नीरज को स्वर्ण पदक नहीं जीत पाने का जरूर मलाल होगा, पर उन्हें यशवीर सिंह के पदक जीतने की प्रसन्नता होगी, क्योंकि जैवलिन में उन्होंने अगली पीढ़ी को प्रेरणा दी है. गुलवीर सिंह ने दौड़ में रजत और स्वर्ण, दोनों पदक अपने नाम किये. तेजस्विन शंकर ने डेकैथलॉन में पदक जीता. हालांकि जिमनास्टिक्स में भारत के पदक की झोली खाली रही. भारत के आठ में से तीन एथलीट ने फाइनल दौर तक का सफर तय किया, पर वे पोडियम तक नहीं पहुंच सके.
बॉलिंग में बर्मिंघम गेम्स में भारत का प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा था, जबकि ग्लासगो में भारतीय दल को खाली हाथ लौटना पड़ा. इसी तरह स्विमिंग और ट्रैक साइकिलिंग टीम को भी निराशा हाथ लगी. भले ही ग्लासगो गेम्स ने अहमदाबाद गेम्स के लिए नयी उम्मीदें जगायी हैं, पर भारत को 2036 तक विश्व की शीर्ष 10 टीम और 2050 तक शीर्ष पांच टीम बनने के लिए अभी लंबा फासला तय करना है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
