परिवारवाद की परिधि में अब भी कांग्रेस

खरगे ने अहम पदों पर गांधी परिवार को चुनौती देने वाले लोगों को नहीं रखा है. संचालन के लिए बने 47 सदस्यों के पैनल में थरूर को जगह नहीं मिली है. सच यह है कि शशि थरूर एक बाहरी हैं.

शाही परिवार दूसरों की अधिक चमक को पसंद नहीं करते. एक बार फ्रांस के शासक लुई अष्टम, जिन्होंने वर्साई को बसाया था, अपने वित्त मंत्री निकोलस फूके के आलीशान आवास पर गये. वे यह देख कर चिढ़ गये कि उनके दरबारी का महल राजा के महल से अधिक भव्य है. फूके की बहुत अधिक लोकप्रियता से भी सम्राट को नाराजगी थी. लुई ने निष्कर्ष निकाला कि मंत्री ने राजकोष से धन चुराया है और उसकी सारी संपत्ति जब्त कर उसे जेल भेज दिया गया.

इस कहानी में कांग्रेस के सांसद शशि थरूर के लिए एक सीख है, जिन्होंने एक तरह से पार्टी के कोष पर हाथ डाला है, जिसका एकमात्र धन गांधी परिवार की राजनीतिक मुद्रा है. आनुवांशिकता और नेतृत्व भरोसेमंद सहयात्री नहीं होते. कांग्रेस के इस मिथक ने, कि वंश इसका नेता बनाने में सहायक भूमिका निभाता है, कई क्षमतावान नेताओं को ध्वस्त किया है. भ्रम यह है कि कोई गांधी ही पार्टी के क्षीण भाग्य को अच्छे दिन में बदल सकता है. इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसा कोई कांग्रेस नेता उभर नहीं पाया, जो दूसरों को भी जीता सके.

गांधी परिवार की जीत की क्षमता के खत्म होते जाने के साथ उनके अनुचर किसी भी ऐसे व्यक्ति को चुप कराने में लगे हैं, जो उनके प्रतीक के ढलते करिश्मे को चुनौती दे सके. कुछ सप्ताह से प्रबुद्ध थरूर कांग्रेस के क्रोध के निशाने पर हैं. खरगे के खिलाफ चुनाव लड़ने के कारण उनका बहिष्कार किया जा रहा है. गांधी परिवार की निगाह में थरूर का अक्षम्य अपराध यह है कि उन्होंने नौ हजार से अधिक वोटों में से एक हजार से अधिक वोट पाया, जो कांग्रेस के इतिहास में कोई भी विद्रोही उम्मीदवार नहीं पा सका था.

थरूर प्रबुद्ध हैं, इतिहासकार और कूटनीतिज्ञ हैं. उन्होंने दो दर्जन से अधिक किताबें लिखी हैं तथा वे अपने विचार एवं कर्म से ठोस नेहरूवादी हैं. वे राहुल खेमे के किसी भी व्यक्ति की तुलना में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के राजनीतिक पक्ष को बेहतर ढंग से स्पष्ट कर सकते हैं. इंग्लैंड में एक उच्च-वर्गीय नायर परिवार में जन्मे थरूर मलयालम से भी अच्छी अंग्रेजी बोल सकते हैं.

व्यक्तिगत विवादों के बावजूद वे युवाओं में लोकप्रिय हैं तथा तिरुवनंतपुरम से तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं. वे मनमोहन सरकार में मंत्री भी रहे, लेकिन पार्टी चुनाव में उतरने के साथ उनके दल के लोगों ने उनके सभी कार्यक्रमों का बहिष्कार किया. शायद सोनिया गांधी ने उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी थी, पर केरल में ही नेताओं ने उनसे दूरी बना कर रखी.

उनका उम्मीदवार बनना एक वैचारिक कार्रवाई थी. यह दिखाने के लिए कि कांग्रेस अपने संस्थापकों के लोकतांत्रिक परंपराओं पर कायम है, लेकिन उनके साथ जो हुआ है, उससे इंगित होता है कि नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी अपनी खोयी विरासत को नहीं खोजना चाहती. उसकी दिलचस्पी केवल राहुल की यात्रा में है.

कांग्रेस में गांधी परिवार के किसी सदस्य की स्थिति को एक निर्देशित लोकतांत्रिक प्रक्रिया के परिणाम से नहीं बदला जा सकता है. पार्टी प्रमुख का चुनाव कई अर्थों में अहम था. पहली बात यह है कि बीते दो दशकों से चुनाव नहीं कराने की आलोचना से छुटकारा. दूसरी बात यह कि कोई गांधी मुकाबले में नहीं था. आजादी तक कांग्रेस का संचालन ताकतवर राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय नेताओं द्वारा होता था.

सामूहिक नेतृत्व ने इसकी चुनावी जीतों को सुनिश्चित किया था. निस्संदेह नेहरू इसके सार्वजनिक चेहरे थे, पर वे एक वंशानुगत उत्तराधिकार के पिता बन गये, जब उन्होंने चालीस वर्षीया इंदिरा गांधी को 1959 में पार्टी अध्यक्ष बनवा दिया. आज चुनाव करा कर परिवार ने भले ही अस्थायी भरोसा कमाया हो, पर वह आज भी मोतीलाल नेहरू के रास्ते पर चल रही है, जिन्होंने अपने पुत्र जवाहरलाल को कांग्रेस नेतृत्व के लिए तैयार किया था और फिर वह परंपरा बन गयी.

प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के रूप में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के क्षत्रपों को खत्म कर दिया. पहले संजय गांधी की चलती थी और फिर उनकी हत्या के बाद राजीव गांधी भी उसी राह पर चलते रहे. राजीव की मृत्यु के बाद सोनिया ने राजनीति में आने से मना कर दिया, पर बाद में उन्होंने अपने करीबियों के साथ पीवी नरसिम्हाराव और सीताराम केसरी को किनारे कर दिया. उनके पार्टी प्रमुख बनने के बाद अगले 19 वर्षों तक कोई पार्टी चुनाव नहीं हुआ. साल 2004 में उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया, पर पार्टी पर उनकी मजबूत पकड़ बनी रही.

परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पुत्र राहुल को पहले महासचिव, फिर उपाध्यक्ष और 2017 में अध्यक्ष बनवाया. जब 2019 की हार के बाद राहुल ने पद छोड़ दिया, तो सोनिया फिर अध्यक्ष बन गयीं. इस बार राहुल के अध्यक्ष बनने से मना करने पर सोनिया ने खरगे का समर्थन किया, जो राहुल के लिए कुर्सी तैयार रखेंगे. खरगे ने संसदीय बोर्ड नहीं गठित किया है और कार्यसमिति के चुनाव को स्थगित कर दिया है.

उन्होंने अहम पदों पर गांधी परिवार को चुनौती देने वाले लोगों को नहीं रखा है. संचालन के लिए बने 47 सदस्यों के पैनल में थरूर को जगह नहीं मिली है. सच यह है कि शशि थरूर एक बाहरी हैं. उनके पीछे कोई परिवार या मजबूत नेता नहीं रहा है. उनके बच्चे राजनीति में नहीं हैं. शायद वे अकेले ऐसे कांग्रेस नेता हैं, जिनकी स्वतंत्र लोकप्रियता है. उनसे खरगे ऐसे डरे हुए हैं कि उन्हें विधानसभा चुनावों में स्टार प्रचारक भी नहीं बनाया गया. गांधी परिवार के नेतृत्व पार्टी केंद्र और अधिकतर राज्यों में हार चुकी है. वे सत्ता खो चुके हैं, पार्टी उनके हाथ में है. चलते-फिरते शब्दकोश थरूर चर्च एवं राज्य में अलगाव के पैरोकार हैं, जो लोकतंत्र का बुनियादी सूत्र है.

लुई अष्टम की तरह गांधी परिवार भी चापलूस दरबारी चाहता है, करिश्माई बाहरी नहीं. थरूर अपनी ही स्वतंत्रता के पीड़ित बन गये हैं. इतिहास की उपमाएं भी संबद्ध होती हैं. लुई अष्टम के वंशज लुई सोलहवें को उनकी पत्नी समेत गद्दी से उतार कर क्रांतिकारियों ने मार डाला था. क्या थरूर का चुनाव लड़ना कांग्रेस में क्रांति की शुरुआत है? क्या गांधी परिवार लोक नकार के प्रतीकात्मक गीलोटीन का इंतजार कर रहा है? क्या कांग्रेस द्वारा बहुप्रचारित राहुल की यात्रा सोनिया गांधी की उम्र होते जाने के साथ इस वंश को नयी ऊर्जा दे सकेगी? इसका उत्तर 2024 में मिलेगा, जब मोदी का सामना राहुल करेंगे. शायद कभी दरबार नहीं रहे थरूर को तब संतोष मिल सकता है.

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