शहादत दिवस : भारत माता को स्वाधीन करानेवाले साधक थे चंद्रशेखर आजाद

Chandra Shekhar Azad : स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी भागीदारी महात्मा गांधी के आह्वान पर कांग्रेस द्वारा 1920 में शुरू किये गये अहिंसक असहयोग आंदोलन से शुरू हुई थी. वर्ष 1921 में जब वे 15 वर्ष के ही थे, असहयोग करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गये और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये गये तो अपना नाम ‘आजाद’ बताया, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर ‘जेल.’

Chandra Shekhar Azad : भारत को स्वतंत्र कराने के सशस्त्र संग्राम में अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले क्रांतिकारियों में 1931 में 27 फरवरी को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए चंद्रशेखर आजाद को क्रांति कर्म में उनकी बहुमुखी भूमिका के लिए अलग से रेखांकित किया जाता है. किया भी क्यों न जाए, अक्तूबर 1924 में उन्होंने कानपुर में रामप्रसाद बिस्मिल, योगेशचंद्र चटर्जी व शचींद्रनाथ सान्याल आदि के साथ क्रांतिकारियों की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बनायी, तो जरूरत के अनुसार कभी उसके प्रशिक्षक बने, कभी सेनापति. बुरा दौर आया तो उसके पुनर्गठन का दायित्व भी निभाया.

गोरों की सत्ता को हिलाकर रख देने वाले काकोरी ट्रेन एक्शन, सांडर्स वध और असेंबली बम विस्फोट जैसे बड़े क्रांतिकारी एक्शन उन्हीं के नेतृत्व में हुए. बाद में यह आर्मी कमजोर पड़ गयी, तब शुभचिंतकों ने सुझाया कि अपनी सुरक्षा के लिए उन्हें सोवियत संघ चले जाना चाहिए, तो भी उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को पीठ दिखाना गवारा नहीं किया और अपने ‘आजाद’ नाम को सार्थक करते हुए आखिरी सांस तक लड़े, जीते जी अंग्रेजों के हाथ न आने की प्रतिज्ञा पूरी की.


स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी भागीदारी महात्मा गांधी के आह्वान पर कांग्रेस द्वारा 1920 में शुरू किये गये अहिंसक असहयोग आंदोलन से शुरू हुई थी. वर्ष 1921 में जब वे 15 वर्ष के ही थे, असहयोग करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गये और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये गये तो अपना नाम ‘आजाद’ बताया, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर ‘जेल.’ झुंझलाये पारसी मजिस्ट्रेट ने पूछा कि करते क्या हो, तो जवाब दिया- ‘भारतमाता को स्वाधीन कराने की साधना.’ इस पर और चिढ़ गये मजिस्ट्रेट ने उन्हें 15 बेंत लगाने की सजा सुनायी, तो हर बेंत पर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाये. छूटते वक्त जेलर ने तीन आने पैसे दिये तो उन्हें उसके मुंह पर दे मारा और दावा कर आये कि अब उन्हें जीते जी कोई पकड़ नहीं पायेगा. फिर घोषणा सी कर दी- दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे. इसके बाद वे ‘आजाद’ नाम से ही जाने जाने लगे. आजादी के अहिंसक संघर्षों से मोहभंग के बाद क्रांतिकारी बने.

क्रांतिकारी बनने से पहले उन्होंने ओरछा के जंगलों में अपने लक्ष्य पर निशाना लगाने का भरपूर अभ्यास किया था, जिससे उनका निशाना कभी चूकता नहीं था. इसलिए वे दूसरे क्रांतिकारियों को अचूक निशाना लगाने का प्रशिक्षण भी दिया करते थे. लाहौर में पुलिस लाठीचार्ज से हुई लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के एक्शन में भगत सिंह व राजगुरु ने 17 दिसंबर, 1928 को गोरी पुलिस के सहायक पुलिस अधीक्षक जान पी सांडर्स का वध कर दिया और बचने के लिए भागे तो आजाद ने उनका पीछा कर रहे हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह पर पचास गज की दूरी से अचूक फायर कर तब उसे गिरा दिया था, जब वह भगत सिंह को पकड़ने ही वाला था. इससे पहले उन्होंने उसको तीन बार चेताया था कि वह भगत सिंह को भाग जाने दे, लेकिन वह नहीं माना.


गोरी पुलिस को छकाने के लिए वेश बदलने में भी उनका कोई सानी नहीं था. वे धोती-कमीज व बंडी पहनते, तो पुलिस उन्हें उत्तर भारत का कोई अमीर व्यापारी समझ लेती और कुली बनते, तो सिर पर लाल कपड़ा बांध ऐसे गंदे व फटे-पुराने कपड़े पहन लेते कि उसको उनके कुली होने में कोई शक नहीं होता. कभी कलफ लगी कमीज, शॉर्ट्स, फेल्ट हैट और बूट पहनते तो पुलिस वाले उन्हें पुलिस अफसर समझकर सैल्यूट करने लगते और कभी केसरिया बाना धारण कर माथे पर भभूत लगा लेते, तो संन्यासी बन जाते थे. कम ही लोग जानते हैं कि क्रांतिकारियों ने आठ अप्रैल, 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने की योजना बनायी, तो आजाद इसकी जिम्मेदारी खुद उठाना चाहते थे और भगत सिंह के बम फेंकने असेंबली जाने के विरुद्ध थे. लेकिन बाद में सेंट्रल कमेटी की बैठक में भगत सिंह के पक्ष में निर्णय हुआ.

इलाहाबाद में अल्फ्रेड (अब अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद) पार्क में एक विश्वासघाती के विश्वासघात के कारण उन्होंने शहादत पायी, तो उन्हें घेरने वाली गोरी पुलिस के अधिकारी नॉट बावर ने ऐसा भय व आतंक का वातावरण बना रखा था कि कोई उनके पास भी न फटक सके. परंतु यह वातावरण भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों को अपने चहेते क्रांतिकारी के पास जाने से नहीं रोक सका था. हालांकि बेदर्द पुलिस ने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन की यह मांग ठुकरा दी थी कि आजाद का पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए उनको दे दिया जाए. उसने आजाद के निकट संबंधियों के वाराणसी से आने से पहले ही रसूलाबाद घाट पर पुलिसिया तरीके से उनकी चिता जला दी थी. संबंधी आये तो जैसे-तैसे मुखाग्नि देने की औपचारिकता पूरी की. बाद में आजाद की अस्थियों का जुलूस निकाला गया और इलाहाबाद के लोगों ने जगह-जगह उस पर फूल बरसाये.

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