पंजाब-उत्तराखंड में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत कुछ तय करेगा

आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए 2029 लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेंगे। पंजाब में सचिन पायलट की एंट्री, उत्तराखंड में दलित वोट बैंक और उत्तर प्रदेश में महागठबंधन की रणनीति कांग्रेस की राह आसान करेगी या मुश्किल, जानें क्या कहता है विश्लेषण।

अगले दस माह के भीतर पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन राज्यों के नतीजे ही बतायेंगे कि 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस कितनी तैयार है. कांग्रेस इस समय कई मोर्चों पर जूझ रही है. हालांकि, उसके लिए संतोष की बात यह है कि पंजाब की संगठनात्मक सिर-फुटव्वल को फिलहाल हाईकमान ने नियंत्रित कर लिया है. दरअसल, पंजाब में कांग्रेस का एक गुट भूपेश बघेल की कार्यशैली से नाराज था. अब वहां बघेल की जगह सचिन पायलट को लाया गया है, जिससे पार्टी के भीतर अच्छा राजनीतिक संदेश गया है. यह इस बात से भी जाहिर होता है कि पंजाब में अलग-अलग विचार रखने वाले छोटे-बड़े नेताओं, जैसे सुखजिंदर सिंह रंधावा, राजा वडिंग और चरणजीत सिंह चन्नी ने इस फैसले का स्वागत किया है.

सचिन पायलट युवा, समझदार और स्पष्ट सोच के साथ कार्य करने वाले नेता हैं. अजय माकन के साथ भी उनकी अच्छी पटरी बैठती है. गौरतलब है कि माकन ने पंजाब में पार्टी की दशा एवं दिशा पर एक रिपोर्ट तैयार की थी. इसमें उन्होंने बताया है कि कांग्रेस को अपनी स्थिति ठीक करने के लिए क्या करना चाहिए. हालांकि, इसे लागू नहीं किया जा सका था. अब उम्मीद कर सकते हैं कि पायलट के आने से पंजाब में कांग्रेस के लिए हालात बदलेंगे. वैसे भी कांग्रेस के लिए पंजाब ऐसा राज्य है, जहां उत्तर भारत या पश्चिम भारत के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में जीत की संभावना सबसे अधिक है. ऐसे में वह इस राज्य को लेकर किसी भी तरह की शिथिलता नहीं बरत सकती. कांग्रेस के लिए भाजपा शासित उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी राह बनाना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण नजर आता है.

उत्तराखंड वही राज्य है, जहां के हल्द्वानी में हाल ही में मल्लिकार्जुन खरगे के कथित अपमान का मसला सामने आया था. इसे राहुल गांधी ने काफी शिद्दत से उठाया और राजनीतिक विमर्श में लाने में भी कामयाब हुए. उत्तराखंड में दलितों की बड़ी जनसंख्या है, जिसका राजनीतिक समर्थन कांग्रेस को मिल सकता है. पर पार्टी को यह भी ध्यान रखना होगा कि वहां सवर्णों की जनसंख्या भी कोई कम नहीं है. कांग्रेस के पास पहले से ही स्थानीय स्तर पर कोई दमदार चेहरा नहीं है. अगर वहां चुनाव ‘दलित बनाम गैर-दलित' बन गये, तो जमीनी संगठनात्मक ढांचे के बगैर उसके लिए इस समीकरण को साधना कठिन हो जायेगा. उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया था. यदि उसी प्रदर्शन को दोहराना है, तो पार्टी को जल्द से जल्द अखिलेश यादव के साथ तालमेल बिठाकर सीटों का समझौता करना होगा और जमीनी मुद्दों पर आगे बढ़ना होगा.

किंतु वहां कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती केंद्रीय नेतृत्व और प्रादेशिक संगठन के बीच रणनीतिक मतभेदों की है. जहां प्रदेश अध्यक्ष अजय राय पारंपरिक परिपाटी का अनुसरण करते हुए पार्टी को पुनर्जीवित करना चाहते हैं, वहीं राज्य के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ‘मीम-भीम' (मुस्लिम-दलित) समीकरण और ओबीसी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. राजेंद्र पाल को राहुल गांधी का भी समर्थन हासिल है. एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष ने जिला अध्यक्षों के जो नाम सुझाये हैं, वे राहुल गांधी की सामाजिक न्याय की नीति से मेल नहीं खाते हैं. इसलिए इस खींचतान और जमीनी सच्चाइयों की अनदेखी के चलते पार्टी का कैडर दिग्भ्रमित हो रहा है. इन तीनों चुनावों के नतीजे देश की सकल राजनीति के लिहाज से भी अहम हैं. भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार इन्हें अपने काम पर जनमत संग्रह के रूप में पेश करेगी. यदि कांग्रेस पंजाब नहीं जीत पाती, फिर भले ही आम आदमी पार्टी दोबारा सत्ता में आ जाये और उत्तराखंड व यूपी में भाजपा को विजय मिलती है, तो यह 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए ही नहीं, पूरे विपक्ष के लिए झटके से कम नहीं होगा.

ऐसे में भाजपा को यह कहने का मौका मिल जायेगा कि कांग्रेस का कहीं कोई अस्तित्व नहीं बचा है. इसलिए, यदि कांग्रेस को अगले लोकसभा चुनाव में अपनी संभावनाएं प्रबल करनी हैं, तो उसके लिए अपने दम पर कम से कम एक राज्य (पंजाब या उत्तराखंड) में सीधी जीत जरूरी है. साथ ही, उत्तर प्रदेश में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर भाजपा को सत्ता से बाहर करना भी अपरिहार्य होगा. उधर बिहार के बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत के बाद प्रश्न उठ रहा है कि क्या कांग्रेस को अपनी रणनीति में बदलाव कर प्रशांत किशोर की तरफ हाथ आगे बढ़ाना चाहिए? और क्या यह दोस्ती आरजेडी की कीमत पर करनी चाहिए या कांग्रेस को प्रशांत किशोर व आरजेडी दोनों को साधकर पॉलिटिकल मूवमेंट को गति देनी चाहिए? मगर प्रश्न है कि क्या कांग्रेस इस मौके को मजबूत राजनीतिक समीकरण में बदल पायेगी? देश के सात राज्य (उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली) ऐसे हैं, जहां लोकसभा की 253 सीटों पर कांग्रेस का वोट शेयर सिंगल डिजिट में सिमटा हुआ है. जब तक कांग्रेस इन 253 सीटों पर मुकाबले में नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को सीधी चुनौती देने का उसका सपना आधा-अधूरा ही रहेगा. और तब तक उसके लिए दिल्ली दूर ही बनी रहेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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लेखक के बारे में

By रशीद किदवई

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