Budget 2026 : भारत की मौजूदा आर्थिक पृष्ठभूमि आश्वस्त करने वाली है. तिमाही वृद्धि दर प्रभावी है, मुद्रास्फीति कम है, कम एनपीए के साथ बैंक मजबूत मुनाफा दर्ज कर रहे हैं और वर्षों बाद कॉरपोरेट बैलेंस शीट स्वस्थ लग रही हैं. इसके बावजूद बजट को उत्सव से ज्यादा परीक्षा के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि इस कथित सुखद आर्थिकी की चमक सशर्त है.
वृद्धि की गति बड़े पैमाने पर केंद्र सरकार के सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पर जोर देने पर टिकी है. इसी तरह, कम मुद्रास्फीति को खाद्य कीमतों में गिरावट से सहारा मिला है, जो स्थायी नहीं है. बजट से पहले के संकेतक बताते हैं कि अप्रैल-दिसंबर के दौरान आठ प्रमुख उद्योगों का उत्पादन साल-दर-साल केवल 2.6 फीसदी बढ़ा.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना रिकॉर्ड नौवां बजट ‘सतर्क व्यावहारिकता’ की थीम के साथ पेश किया- इसमें राजकोषीय संतुलन के पथ पर चलते हुए अर्थव्यवस्था को क्षमता निर्माण और वृद्धि-वर्धन की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास है. पर पहले बजट के आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है. कुल व्यय को 53.5 लाख करोड़ रुपये पर रखा गया है, जो संशोधित अनुमान से 7.7 फीसदी अधिक है, जबकि उधारी को छोड़ राजस्व 36.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो 7.2 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है.
राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 फीसदी होने का अनुमान है, जो 4.5 फीसदी से नीचे रहने के वादे के अनुरूप है. यह संयम विश्वसनीयता के लिए अहम है- खासकर ऐसे वैश्विक परिदृश्य में, जहां बाहरी वित्तपोषण स्थितियां अचानक सख्त हो सकती हैं. लेकिन वित्तपोषण का माहौल कैसा है? केंद्र सरकार की 17.2 लाख करोड़ रुपये की सकल उधारी और राज्यों की अतिरिक्त 12.6 लाख करोड़ रुपये की उधारी के बीच बाॅन्ड बाजार पर निर्गम का भारी दबाव है.
आश्चर्य नहीं कि रिजर्व बैंक द्वारा पर्याप्त ढील दिये जाने के बावजूद दीर्घकालिक बाॅन्ड ब्याज सात फीसदी पर अटके हैं. यह निजी पूंजीगत निवेश के लिए प्रतिकूल है. राजस्व की सुस्ती भी चिंता का कारण है. केंद्र का सकल कर राजस्व अप्रैल-नवंबर में केवल 3.3 फीसदी बढ़ा, जो पूरे वर्ष के लिए आंके गये 10.8 फीसदी की वृद्धि से काफी कम है.
यदि इस वर्ष नॉमिनल जीडीपी केवल आठ फीसदी रहती है या उपभोग कमजोर बना रहता है, तो उसी कैपेक्स में कटौती का दबाव बनेगा, जो वृद्धि को सहारा दे रहा है. प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) में किया गया मामूली संशोधन डेरिवेटिव बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी को सीमित करने के लिए था. पर बाजारों में उथल-पुथल हुई, हालांकि उम्मीद है कि वे शीघ्र संभलेंगे.
बजट में कैपेक्स पर जोर जारी है. ढांचागत क्षेत्र में पूंजीगत व्यय को नौ फीसदी बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये करने का प्रावधान है. जब तक यह निजी निवेश को बाहर नहीं करता, तब तक यह स्वीकार्य है. बजट वैश्विक सेवा क्षेत्र में 10 फीसदी हिस्सेदारी का बड़ा लक्ष्य निर्धारित करता है. भारत को बढ़ती हुई व्यापार योग्य सेवाओं में तुलनात्मक बढ़त प्राप्त है. ऐसे में, लक्ष्य प्राप्ति के लिए कौशल आधारित उत्पादकता में छलांग जरूरी होगी.
बजट शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता तक की शृंखला पर जोर देता है और एक प्रस्तावित स्थायी समिति के माध्यम से इस पाइपलाइन को मजबूत करने का संकेत देता है. यह क्लस्टर आधारित औद्योगिक दृष्टिकोण की ओर भी इशारा करता है, जहां प्रशिक्षण संस्थानों को वस्त्र और चमड़ा जैसे क्षेत्रीय क्लस्टरों से जोड़ा जायेगा और 200 से अधिक पारंपरिक औद्योगिक क्लस्टरों को पुनर्जीवित किया जायेगा. बजट में एमएसएमइ क्षेत्र पर फोकस स्वागतयोग्य है.
भुगतान में देरी और कार्यशील पूंजी की कमी छोटे उद्यमों के लिए बाधक हैं. ऐसे में, टीआरइडीएस के जरिये बिल डिस्काउंटिंग को मजबूत करने जैसे कदम वैसे सुधार हैं, जो औपचारिकीकरण के साथ छोटे उद्यमों के बने रहने में मददगार होंगे. यदि कैपेक्स में वृद्धि केंद्र का दृश्यमान इंजन है, तो निजी निवेश अब भी गायब सिलेंडर बना हुआ है. और यहीं बजट एक सरल, पर प्रभावी सुधार से चूक गया. वह है, जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट, जो खासकर पूंजीगत वस्तुओं की समस्या का हल है.
मशीनरी, संयंत्र, उपकरण और निर्माण इनपुट पर मिलने वाले टैक्स क्रेडिट वर्षों तक फंसे रहते हैं, जिससे क्षमता विस्तार हतोत्साहित होता है. कंपनियों के पास ऐसे क्रेडिट्स (जमाओं) के ढेर लग जाते हैं, जिनका वे उपयोग नहीं कर पातीं. स्पष्ट समाधान यह है कि जीएसटी के तहत पूंजीगत वस्तुओं पर पूरा टैक्स क्रेडिट दिया जाये और उस हिस्से पर आयकर अवमूल्यन की अनुमति न हो. इस सुधार पर ध्यान नहीं गया, जबकि यह उच्च प्रभाव, कम राजनीतिक लागत तथा पूंजीगत खर्च की लागत घटाने वाला सुधार साबित होता.
बजट क्या और अधिक पुनर्वितरणकारी हो सकता था? वित्त मंत्री को एक असहज सच्चाई स्वीकार करनी होगी. वह यह है कि समग्र वृद्धि और आर्थिक स्थिरता, बढ़ती असमानता वस्तुत: संपत्ति के केंद्रीकरण और रोजगार सृजन में कमी के कारण आबादी के बड़े हिस्से के ठहरे हुए जीवन स्तर के साथ बनी रह सकती है. यह बजट भाषा के स्तर पर तो भारी है, जिसमें ‘क्षमता’ और ‘विकसित भारत’ जैसे शब्द हैं, पर मजदूरी वृद्धि और रोजगार की गुणवत्ता जैसे वितरण के मोर्चे पर हल्का है.
रोजगार का विरोधाभास अब भी बना हुआ है- अनेक श्रमिक अब भी कृषि पर निर्भर हैं, जबकि उत्पादन में उनकी हिस्सेदारी कम है. यह एक संरचनात्मक असंतुलन है, जो स्थिर मजदूरी और कमजोर जन उपभोग से जुड़ा है. यदि इसका सीधे तौर पर मुकाबला नहीं किया गया, तो राजनीतिक अर्थशास्त्र का जोखिम तय है. कुल बचत में घरेलू बचत की हिस्सेदारी अगर बमुश्किल 30 फीसदी है, तो इसका कारण यही है. जाहिर है, दीर्घकालिक घरेलू पूंजी को मजबूत करना जरूरी है.
वित्त मंत्री ने कहा है कि एक उच्चस्तरीय समिति व्यापक वित्तीय क्षेत्र सुधारों पर विचार करेगी. कुल मिलाकर, यह एक समझदार बजट है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की मजबूती के बावजूद उत्साह में बहने से इनकार करता है. यह राजकोषीय गणित में संयम बरतता है, कैपेक्स को जारी रखता है, और नीति को कौशल तथा सेवा-निर्यात प्रभुत्व की ओर मोड़ने का प्रयास करता है. लेकिन यदि भारत का विकास मॉडल राज्य प्रेरित से निजी निवेश-नेतृत्व वाला बनना है, तो देश को अनाकर्षक लेकिन ऐसे जरूरी सुधारों की जरूरत है, जो निवेश की रुकावटें दूर करें और भागीदारी को व्यापक बनायें. इसके लिए निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देते हुए असमानता दूर करने तथा रोजगार की गुणवत्ता पर अधिक स्पष्ट संवाद की जरूरत है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
