जयंती : विनोबा का भूदान दर्शन आज ज्यादा प्रासंगिक है

Vinoba Bhave : भूदान आंदोलन की शुरुआत विनोबा ने 1951 में हैदराबाद से की थी. तब हैदराबाद राज्य में रजाकारों की गतिविधियों के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी. रजाकार कट्टरपंथी मुस्लिम सैनिक थे, जो लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे तथा राज्य के भारत में विलय के भी विरुद्ध थे.

Vinoba Bhave : विनोबा भावे के भूदान आंदोलन का यह अमृत वर्ष है. विनोबा ने भूमि समस्या का अहिंसक समाधान प्रस्तुत किया था. भूमि समस्या के समाधान के लिए उन्होंने जमींदारों के भीतर त्याग की भावना जगायी और उन्हें अपनी जमीन दान करने के लिए प्रेरित किया. उनके भूदान-ग्रामदान कार्यक्रम ने स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों की प्रक्रिया को एक स्वैच्छिक आयाम प्रदान किया. समाज परिवर्तन की उस प्रक्रिया में उन्होंने गांधी प्रविधि को अपनाया.


भूदान आंदोलन की शुरुआत विनोबा ने 1951 में हैदराबाद से की थी. तब हैदराबाद राज्य में रजाकारों की गतिविधियों के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति बहुत खराब थी. रजाकार कट्टरपंथी मुस्लिम सैनिक थे, जो लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे तथा राज्य के भारत में विलय के भी विरुद्ध थे. वहां के कम्युनिस्टों का गरीब किसानों के बीच बहुत प्रभाव था. उसका लाभ उठाकर कम्युनिस्टों ने धनी भूस्वामियों के विरुद्ध गरीब किसानों को खड़ा किया था. विनोबा ने वहां जाकर क्षेत्र में शांति स्थापित करने की पहल की, जिसमें उन्हें सफलता मिली.

तेलंगाना की पदयात्रा करते हुए विनोबा 18 अप्रैल, 1951 को पोचमपल्ली गांव पहुंचे थे. वहां के स्थानीय हरिजनों ने उनसे कहा कि यदि उनको 80 एकड़ जमीन मिल जाये, तो उसकी जुताई-बुवाई कर वे अपना गुजर-बसर कर लेंगे. वहां मौजूद लोगों से विनोबा ने पूछा कि क्या कोई इस कार्य के लिए अपनी जमीन दान कर सकता है? सीआर रेड्डी नाम के एक व्यक्ति ने सौ एकड़ जमीन दान करने की घोषणा की. उस घोषणा में विनोबा को भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की समस्याओं के समाधान की संभावना दिखी और भूदान के विचार ने जन्म लिया.


भूमिहीनों के लिए दान में भूमि मांगने के लिए विनोबा सागर, झांसी, आगरा और मथुरा गये. उत्तर प्रदेश में उन्हें लगभग तीन लाख एकड़ जमीन दान में मिली. फिर विनोबा बिहार आये और यहां 1954 के अंत तक रुके रहे. बिहार में कुल 22 लाख एकड़ भूमि उन्होंने प्राप्त की. बिहार से पश्चिम बंगाल होते हुए वह उड़ीसा गये और वहां ग्रामदान आंदोलन शुरू किया. ग्रामदान में 80 प्रतिशत अथवा इससे भी अधिक ग्रामीण अपनी जमीन ग्राम समुदाय को समर्पित करते थे, ताकि उसका समान वितरण किया जा सके. वर्ष 1955 में गणतंत्र दिवस के समय विनोबा ने जब उड़ीसा में प्रवेश किया, तब तक दान में प्राप्त गांवों की संख्या 93 हो चुकी थी. लगभग आठ महीने बाद विनोबा ने जब उस राज्य को छोड़ा, तो दान में मिले गांवों की संख्या बढ़कर 812 तक पहुंच चुकी थी.


ग्रामदान के दायरे में आने वाले गांवों में ग्राम सभाएं बना कर स्वायत्त समाज की नींव रखना एक विरल प्रयोग था. बीती सदी के चौथे, पांचवें और छठे दशकों में विनोबा ने समाज परिवर्तन का ऐसा मॉडल पेश किया, जिसमें राज्य के हस्तक्षेप की गुंजाइश न के बराबर थी. हालांकि सरकार ने भूदान-ग्रामदान एक्ट पारित कर सर्वोदय को अपने भूमि सुधार प्रयासों का अनुषंगी बना लिया, पर उसका प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं किया. इसीलिए भूमिहीनों तक गयी जमीन को लेकर जगह-जगह समस्या बनी रही. विनोबा को 45 लाख एकड़ जमीन दान में मिली थी, जिसे उन्होंने भूमिहीनों में बांट दिया, पर कई ऐसे मामले प्रकाश में आये, जहां जमीन के मालिकाना की रजिस्ट्री नहीं हुई या जमींदारों ने दान की गयी जमीन हथिया ली. इसलिए विनोबा के भूदान यज्ञ आंदोलन को पूरी तरह सफलता नहीं मिल सकी.

भोग-विलासिता की सनकी स्पर्धा के इस दौर में विनोबा के भूदान दर्शन का स्मरण अधिक जरूरी है. विनोबा पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत और मध्य भारत की यात्रा करते हुए भूमिदान यज्ञ चलाते रहे और लोगों को समझाते रहे कि सारी जमीन भगवान की है. जैसे-जैसे उनका आंदोलन आगे बढ़ा, उसके व्यापक निहितार्थ लोगों के सामने स्पष्ट होने लगे. साधन दान की शुरुआत उत्तर प्रदेश में हुई. बाद में उसमें विनोबा ने संपत्तिदान, श्रमदान और बुद्धिदान को भी जोड़ा, यानी किसी की नि: शुल्क बौद्धिक सेवा करना. विनोबा के भूदान का मूल विचार यह था कि मनुष्य के पास जो कुछ भी है-धन, प्रतिभा अथवा इसी प्रकार की अन्य सारी चीजें, वे समाज की हैं. यदि कोई इसे अपने पास रखता है, तो वह उसका न्यासी है. इसका अंतिम निहितार्थ था व्यक्तिगत संपत्ति का उन्मूलन कर उसे सामाजिक संपत्ति में बदलना, ताकि उस संपत्ति का लाभ सभी को मिल सके.

विनोबा के यहां भूदान का दान शब्द खैरात के अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, बल्कि इसका आशय समान वितरण था, इस अर्थ में इसका प्रयोग आदि शंकराचार्य ने भी किया था. विनोबा ने प्रयोग कर दिखाया कि एक नये समाज की पुनर्रचना हम कैसे कर सकते हैं. भूदान के पीछे यही उद्देश्य था. भूदान आंदोलन के माध्यम से विनोबा नये मूल्यों की स्थापना करना चाहते थे. नैतिकता को सामाजिक जीवन का निर्देशक सिद्धांत बनाने के लिए अर्थशास्त्र को उसके अधीन करना चाहते थे. विनोबा के मुताबिक, मूल्यों के अहिंसक और शांतिपूर्ण परिवर्तन के लिए भूदान एक उपकरण था.

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