जयंती : ओज और उत्साह के सशक्त कवि थे रामधारी सिंह 'दिनकर', पढ़ें विनय कुमार सिंह का लेख

Ramdhari Singh Dinkar : दिनकर की कृतियां राष्ट्रीय चेतना, देश प्रेम, स्वाभिमान, सौंदर्य एवं सामाजिक समता-समरसता की प्रतीक हैं. वे ओज और उत्साह के कवि हैं. वे छायावादोत्तर हिंदी काव्य जगत में वैसे प्रथम कवि हुए जिन्होंने कविता को 'छायावाद' की रुमानी कुहेलिका से बाहर निकाल, उसे आम जन के व्यापक संदर्भों एवं सरोकारों से जोड़ा.

Ramdhari Singh Dinkar : काव्य के क्षेत्र में राष्ट्रकवि दिनकर की लेखनी की उपमा महान धनुर्धर अर्जुन के ‘गांडीव की टंकार’ से दी जा सकती है. दिनकर का तेजोदीप्त आभामंडल उनकी ही एक कविता में यथार्थत: अभिव्यक्त है- ‘सुनूं क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा/स्वयं युगधर्म का हुंकार हूं मैं/कठिन निर्घोष हूं भीषण अशनि का/प्रलय गांडीव की टंकार हूं मैं.’ हर प्रकार के शोषण-दमन, अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष में दिनकर का काव्य गांडीव की टंकार की तरह प्रलयंकर है. स्वाधीनता संघर्ष के कालखंड में वे विदेशी शासन के खिलाफ प्रचंड विद्रोह की आवाज बनकर उभरे और स्वाधीन भारत में राष्ट्र की आत्मा के सशक्त, सुंदर स्वर बनकर जन-मन में ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए.


गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार ‘लोकमंगल’ ही काव्य का धर्म है. तुलसी का लोकमंगल आधुनिक युग में दिनकर के काव्य में मुखरित हुआ है. इसलिए दिनकर तुलसी की ही भांति ‘लोक कवि’ हैं, जिनकी रचनाएं लोकजीवन के गंभीर प्रश्नों के समाधान का सही मार्ग बताती हैं. दिनकर की कृतियां राष्ट्रीय चेतना, देश प्रेम, स्वाभिमान, सौंदर्य एवं सामाजिक समता-समरसता की प्रतीक हैं. वे ओज और उत्साह के कवि हैं. वे छायावादोत्तर हिंदी काव्य जगत में वैसे प्रथम कवि हुए जिन्होंने कविता को ‘छायावाद’ की रुमानी कुहेलिका से बाहर निकाल, उसे आम जन के व्यापक संदर्भों एवं सरोकारों से जोड़ा.

पराधीन भारत में धूम मचा देनेवाली काव्य कृति ‘हुंकार’ (वर्ष 1938) में रुमानी कल्पनाओं के जाल बुननेवाले कवियों के समक्ष दिनकर का आत्मनिवेदन अर्थपूर्ण है- ‘अमृत गीत तुम रचो कलानिधि! बुनो कल्पना की जाली/तिमिर ज्योति की समरभूमि का/मैं चारण, मैं बैताली.’ परकीय शासन के विरुद्ध अंतर्मन की ज्वाला जगाने का आह्वान करते हुए उन्होंने लिखा- ‘हो कहां, अग्निधर्मा नवीन ऋषियों? जागो/कुछ नयी आग, नूतन ज्वाला की सृष्टि करो.’ उस दौर में दिनकर की ‘हिमालय’ कविता- ‘रे, रोक युधिष्ठिर को न यहां/ जाने दो उनको स्वर्ग धीर/पर, फिरा हमें गांडीव-गदा/लौटा दे अर्जुन-भीम वीर’- स्वतंत्रता सेनानियों का कंठहार बन गयी थी.


दिनकर ‘युग चारण’ थे, जिन्होंने अपने युग के गौरवपूर्ण प्रसंगों के अभिनंदन में ‘बैताली’ की तरह ताल दे-देकर गीत गाते हुए जनता को जगाया. स्वाधीनता के ‘अरुणोदय’ पर 15 अगस्त, 1947 को इस बैताली ने तान छेड़ा- ‘मंगल मुहूर्त रवि! उगो, हमारे क्षण ये बड़े निराले हैं/हम बहुत दिनों के बाद विजय का शंख फूंकनेवाले हैं.’ छब्बीस जनवरी, 1950 को, भारत के गणतंत्र घोषित होने के उल्लास में दिनकर ने ‘जनतंत्र का जन्म’, में लिखा- ‘सदियों से ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी/मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है/दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है.’ लेकिन कुछ ही काल के बाद भारत गणराज्य के शासकों के रवैये को ‘लोक मंगल’ के विरुद्ध देख-समझकर उन्होंने सत्ताधीशों को चेतावनी देते हुए कहा- ‘जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में/या आग सुलगती रही प्रजा के मन में/रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा/अपने ही घर में स्वदेश पुन: हारेगा.’

दूसरी ओर स्वाधीनता को ‘स्वच्छंदता मान परस्पर छीन-झपट को आतुर जनता को झिड़कते हुए वे लोकशिक्षण करते हैं- ‘आजादी तो मिल गयी, मगर यह गौरव कहां जुगायेगा?/मरभुखे! इसे घबराहट में बेच तो न खा जायेगा?/आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पायेगा?/है बड़ी बात आजादी का पाना नहीं, जुगाना भी/बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी.’ राष्ट्रकवि की इन पंक्तियों के संदेश आज के दौर में भी उतने ही प्रासंगिक हैं- आज, जबकि जातीय, क्षेत्रीय और भाषाई क्षुद्रताएं राष्ट्रीय चेतना पर प्रहार करने में लगी हैं. दिनकर ने इन खतरों को बहुत पहले ही पहचान लिया था. ‘रश्मिरथी’ में जातिवादी मानसिकता, पर चोट करते हुए लिखा- ‘जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड’. ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में राजनीतिक चापलूसों को प्रश्रय देनेवालों की खबर लेते हुए दिनकर ने क्या खूब लिखा है- ‘चोरों के हैं हितू, ठगों के बल हैं/जिनके प्रपंच से पलते पाप सकल हैं/जो छल-प्रपंच सबको प्रश्रय देते हैं/या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं/यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है/भारत अपने ही घर में हार गया है.’

माज के शोषितों-वंचितों के हक की आवाज दिनकर ने अत्यंत सशक्त ढंग से उठाया है- ‘उठो व्योम के मेघ, पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं/दूध, दूध ओ वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं.’ ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘रश्मिरथी’ में शोषण एवं अन्याय के विरुद्ध उनकी बुलंद आवाज है. ‘रसवंती’, ‘सामधेनी’, ‘नील-कुसुम’, ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ आदि दिनकर के अनुपम कीर्ति स्तंभ हैं.


अनुपम गद्य कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें 1959 में ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार तथा अद्भुत काव्य कृति ‘उर्वशी’ के लिए 1972 में ‘ज्ञानपीठ’ सम्मान मिला. हरिवंशराय बच्चन ने कहा था- ‘दिनकर को एक नहीं, गद्य, पद्य, भाषा एवं हिंदी सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिए.’ डॉ नामवर सिंह के अनुसार, ‘दिनकर अपने समय के सूर्य थे’. महान साहित्यसेवी पं बनारसीदास चतुर्वेदी के अनुसार- ‘दिनकर पांच शताब्दियों से अधिक समय तक याद किये जायेंगे.’ जयंती पर राष्ट्रकवि को शत-शत नमन.

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